दस्तक-विशेषस्तम्भ

मोक्षदा काशी: सत्य सनातन चिन्तन

डॉ विमला व्यास

“काश्यते प्रकाश्यते या सा काशी”

स्कंदपुराण के इस श्लोक में काशी की महिमा का वर्णन किया गया है। जिसका अर्थ है- “वह स्थान,जो स्वयं प्रकाशमान है, और अपनी दिव्यता से सब ओर उजियारा फैलाता है, वह काशी है।”

अलौकिक ज्ञान से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित करने वाली काशी, साक्षात् भगवान् शिव के विग्रह स्वरूप में विराजमान, संसार की प्राचीनतम नगरी काशी, जिसे भगवान शिव ने स्वयं इसे आनन्दकानन तदनन्तर अविमुक्त और अविनाशी कहा है!

पतित पावनी मां गंगा के तट पर वरुणा और असि नदियों के संगमों के मध्य स्थित होने के कारण इसे सारा विश्व ‘वाराणसी’ के नाम से जानता है।

विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंय ‘ऋग्वेद’ में काशी का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थल है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी, जहाँ श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरने से बिंदुसरोवर बन गया और प्रभु यहाँ बिंदुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए।

मत्स्यपुराण में वर्णन आता है,कि काशी ब्रह्मा जी का परम स्थान, ब्रह्मा द्वारा अध्यासित, सदासेवित और रक्षित है। स्कन्दपुराण में काशी को भूमि का खण्ड न कहकर ब्रह्म रसायन कहा गया है। साक्षात् भगवान् विश्वेश्वर ने काशी को त्रिलोक में सबसे प्रिय परम सौख्य की भूमि कहा है। स्कन्दपुराण में ही वर्णन आता है कि यह काशीपरी त्रैलोक्य से न्यारी एवं सनातन सत्य स्वरूपा है। काशी भगवान शंकर के त्रिशूल पर विराजित है। ऋग्वेद, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण में “काशि” शब्द तथा बृहदारण्यकोपनिषद्, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, अष्टाध्यायी सहित सभी ग्रन्थों में काशी की महत्ता से सम्बन्धित उध्दरण मिलते हैं।

महर्षि व्यास ने काशी को त्रैलोक्य की नाभि बताते हुए कहा है कि सम्पूर्ण धरित्री की नाभिभूता शुभोदया,इस काशी का प्रलयकाल में भी अंत नहीं होता है। लिंगपुराण के अनुसार काशी का वैशिष्ट प्रतिपादित करते हुए, साक्षात् महादेव का कथन है,कि वाराणसी मेरा गूढ़तम क्षेत्र है और सर्वदा प्राणियों के मोक्ष का कारण है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और काशी

भारतीय संस्कृति,साहित्य और कला की राजधानी काशी प्राचीनकाल से ही ज्ञानपिपासुओं और मुमुक्षुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। विश्व सदैव नए विमर्श के लिए काशी की ओर देखता रहा है।

काशी सदैव अध्यात्म, संस्कृति और शिक्षा का केंद्र रहा है। भगवान बुद्ध ज्ञान तो बोध गया में प्राप्त करते हैं पर ‘धम्म चक्र प्रवर्तन’ के लिए काशी के पास ऋषिपत्तन (सारनाथ) आते हैं। वेदांत के सबसे बडे प्रवक्ता आदिगुरु शंकराचार्य केरल प्रदेश के कालड़ी नामक स्थान से काशी आते हैं। महान संत नानक और दाराशिकोह राजकुमार काशी आते हैं। काशी में कबीर के स्वर में निर्गुंण की गूँज होती है, तो तुलसी राम कथा के माध्यम से सगुण और निर्गुण के बीच समन्वय स्थापित करने का काम करते हैं। जिसे काशी ने स्वीकार किया, उसे संसार ने स्वीकार किया।

भारत रत्न पंडित महामना मदन मोहन मालवीय ने भी प्रयाग से आकर वाराणसी में ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्व में ब्रह्मोदय (संवाद) का सबसे प्रतिष्ठित केंद्र रहा है, काशी। यहाँ संस्कृत पाठशालाओं में शास्त्रार्थ की वह प्राचीन स्थापित परम्परा आज भी जीवंत है।

काशी शाश्वत है, ऋषियों की तपःस्थली है। भारतीय सनातन चिन्तन परम्परा में चिन्मय प्रकाशिका काशी को तीनों लोकों से न्यारी कहा गया है। यह महज संयोग नहीं है,कि काशी के पास सारनाथ को ऋषि पतन कहते थे।

हिंदू पांथिक परम्परा और काशी

काशी हिन्दू सनातन परम्परा के साथ-साथ अन्य हिन्दू पांथिक परम्पराओं, मान्यताओं को भी अपने आप में आत्मसात किये हुए है! काशी के पंचगंगा घाट से ही भारतीय ऋषि परम्परा के रामानंदाचार्य के विचारों में भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं के सुधारात्मक स्वरूप का दर्शन होता है! इसी भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन परम्परा को पूज्य संत तुलसी,रविदास,कबीर आदि लोक शिक्षण के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं! संत तुलसीदास अपनी लेखनी से समाजिक जागरण की परम्परा को स्थापित करते हैं। इसलिए काशी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में चिरकाल से गौरवशाली विरासत की संवाहिका रही है।

काशी यूं ही सम्पूर्ण नगरी नही है। भगवान शिव की नगरी काशी सर्वधर्मसमभाव का जीवंत उदाहरण है! इसीलिए यह सर्वधर्मावलंबियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रही है। काशी की इस पावन धरा ने समय-समय पर ऐसे अनेक संत महापुरूषों को उत्पन्न किया है! जिन्होंने मानव जीवन को निष्कंटक बनाते हुए, जीवन पथ को सरल, संयमित एवं उच्च आदर्शों से युक्त बनाया है। ऐसे संतों में कबीर दास का नाम अग्रिम पंक्ति में आता है।

युग प्रवर्तक तुलसीदासजी का भी काशी से अत्यधिक लगाव रहा है। अयोध्या एवं चित्रकूट के अतिरिक्त जीवन के मूल्यवान क्षण उन्होंने काशी में ही व्यतीत किये! तथा उनके द्वारा श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग को साक्षी मानकर,अपने रामचरित मानस ग्रंंथ को काशी विद्वत् मण्डली के समक्ष प्रस्तुत किये जाने का प्रसंग भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। मुगलों के शासनकाल में जब धर्म परिवर्तन कर सभी को इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाने लगा, तब निर्भीकतापूर्वक रामचरितमानस पाठ एवं रामलीला के मंचन के माध्यम से, इसी काशी से, तुलसीदास ने ‘राजा रामचन्द्रजी की जय हो” का उद्घोष गांव-गांव तक पहुँचाया था!

संत शिरोमणि रविदास जी का भी काशी के साथ अटूट रिश्ता है! यह पुण्य धरा उनकी जन्मस्थली है! 1376 ई० सन् के माघ मास की पूर्णिमा तिथि को इनका जन्म, इसी काशी के गोवर्धनपुर गांव में हुआ था। अतः प्रत्येक वर्ष की माघी पूर्णिमा को इनका जन्मोत्सव पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

काशी और बौद्ध धर्म

बौद्ध परम्परा के अनुसार अंगुत्तर निकाय में भारत के सोलह महाजनपदों में काशी का उल्लेख है। जातक कथाओं में बोधिसत्व के सोलह वर्ष की आयु में काशी जाकर विद्या ग्रहण करने का उल्लेख है। चीनी यात्री फायन (चौथी शती ईस्वी) और युवांनच्वांग भी भारत यात्रा के क्रम में काशी आये थे। जगत गुरु शंकराचार्य ने काशी में शास्त्रार्थ किया था। काशी के सारनाथ में भगवान बुद्ध ने सर्वप्रथम अपने धर्म का प्रवर्तन किया था।

काशी में जैन धर्म और तीर्थंकर

यहां 7वें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ ने भद्रवनी ( भदैनी), 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ ने चंद्रपुरी (चंद्रावती ), 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ ने सिंहपुर (सारनाथ) और 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ने भेलूपुर में जन्म लेकर काशी क्षेत्र की भूमि को कृतकृत्य किया है। 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ऐतिहासिक महापुरुष हैं, इनका जन्म ईसा पूर्व नवमी शताब्दी में काशी के महाराजा अश्वसेन और महारानी वामादेवी से हुआ था।

काशी और सिख धर्म

भगवान शिव की नगरी काशी सर्वधर्म समभाव का जीवंत उदाहरण है! इसीलिए यह सभी धर्मावलंबियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रही है। काशी नगरी, जहाँ जैन एवं भगवान बुद्ध सहित बौद्ध धर्मावलंबियों को लुभाती रही है, वहीं काशी सिख धर्म की ध्वजावाहक भी बनी। वस्तुतः सिख धर्म की स्थापना मुगलों से सनातन धर्म की रक्षा हेतु पंजाब में की गई थी, परंतु सनातन धर्म की आध्यात्मिक राजधानी होने के कारण काशी से सिख धर्म का भी बहुत ही गहरा नाता रहा है। मान्यता के अनुसार गुरु गोविंद सिंह जी ने पंज प्यारे के द्वारा जिस खालसा पंथ की स्थापना की थी, उन पंज प्यारे को सर्वप्रथम काशी में धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया, जिससे कि वह सनातन धर्म के पूर्ण तत्व ज्ञान प्राप्त करते हुए उसकी रक्षा में तत्पर हो सकें। मान्यता के अनुसार पंज प्यारे द्वारा काशी में शिक्षा ‘प्राप्त करने के कारण सिख धर्म का काशी से अनन्यतम संबंध है।

स्कंदपुराण और काशी नगरी

यहाँ संस्कृत पाठशालाओं में शास्त्रार्थ की परम्परा अब भी जीवंत है। इसकी उत्पति के सन्दर्भ में स्कन्दपुराण के काशी खण्ड में वर्णन है,कि स्कन्द माता पार्वती के साथ इस

पृथ्वीलोक में विचरण करते हुए स्वयं भगवान् शिव ने अपने साक्षात् विग्रह द्वारा अपनी इच्छानुसार परमानन्द को देने वाली एक ऐसी नगरी की रचना की, जहाँ माता पार्वती के साथ स्वयं भगवान् शिव प्रलयान्त तक निवास कर सकें। स्कन्द पुराण के अनुसार, काशी नगरी का स्वरूप सतयुग में त्रिशूल के आकार का, त्रेता में चक्र के आकार का, द्वापर में रथ के आकार का तथा कलियुग में शंख के आकार का होता है। इसीलिए काशी को भगवान् शिव के त्रिशूल पर स्थित बताया जाता है, क्योंकि इन आकृतियों का प्रथम रूप त्रिशूल ही है।

काशी विश्वनाथ धाम : ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख आदि विश्वेश्वर काशी में विराजमान हैं। काशी नगरी के उत्तर की तरफ ओंकारखंड, दक्षिण में केदारखंड और बीच में विश्वेश्वर खंड स्थित है। प्रसिद्ध विश्वनाथ-ज्योतिलिंग इसी खंड में स्थित है।

पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में यह कथा दी गयी है, कि भगवान् शंकर माता पार्वती से विवाह करके कैलाश पर्वत पर रह रहे थे! लेकिन अपने पिता के घर में विवाहित जीवन बिताना पार्वती को अच्छा नही लग रहा था! एक दिन उन्होंने भगवान् शिव से कहा, कि आप मुझे अपने घर ले चलिए! भगवान् शिव ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। तब भगवान् शिव माता पार्वती को साथ लेकर अपनी पवित्र नगरी काशी आ गये और यहां आकर वे विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

वैदिक मंत्रोच्चार एवं मोक्षदा काशी

यहाँ एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है, कि ‘जीवन के अंतिम छोर में काशी वास मोक्ष प्रदायक माना गया है।’ जब कि सनातन धर्म में निम्न स्थलों को भी मोक्षदायी माना गया है!

“अयोध्या-मथुरा माया काशी कांचीत्वन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैते मोक्षदायिकाः॥”

अर्थात् अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार ), काशी (वाराणसी), कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारिका धाम, ये सात मोक्षपुरियाॅ है!

“अन्यानि मुक्तिक्षेत्राणि काशीप्राप्तिकराणि च।
काशीं प्राप्य विमुच्येत नान्यथा तीर्थकोटिभि: ।।”
।। स्कन्दमहापुराण दृ 4/6/71

परंतु काशी ही एक पुरी है, जो साक्षात् मोक्ष देती हैं! जैसा कि हमारे प्राचीन ग्रंथो में वर्णित है, कि काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नही होता! मुक्तिदायिनी काशी की यात्रा, निवास एवं मरणोपरांत दाहसंस्कार का सौभाग्य, केवल बाबा विश्वनाथ की कृपा से ही मिलता है। ऐसी मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के स्पर्श मात्र से मनुष्य की कई पीढ़ियां पाप मुक्त हो जाती हैं।

काशी युग परिवर्तंन

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने, वर्ष 2014 में, काशी में अपना नामांकन पत्र दाखिल करते हुए जब यह कहा – ‘न मैं यहां खुद आया हूं , और न लाया गया हूँ, मुझे मां गंगा ने बुलाया है।’उसी वक्त काशी युग परिवर्तंन का संदेश ध्वनित हो गया था!

आज श्री काशी विश्वनाथ धाम सनातन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका है, जिसका प्रभाव सम्पूर्ण विश्व में दृष्टिगोचर हो रहा है। मंदिर परिसर के विस्तार और सौंदर्यीकरण के पश्चात, ‘बाबा विश्वनाथ का यह धाम’, भारतीय ज्ञान परम्पराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ दिव्यस्वरूपा काशी नगरी के बहुआयामी विकास में अपनी अहम भूमिका अदा कर रहा है।

(लेखिका शिक्षाविद एवं साहित्यकार हैं)

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