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जातीय जनगणना की मांग हुई तेज

देवव्रत

केन्द्र में सत्तारुढ़ नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश की आधी आबादी को बड़ा लाभ देते हुए उन्हें 33 फीसदी आरक्षण का अधिकार दे दिया है लेकिन इस अधिकार को देने के लिए लाये गए विधेयक में यह साफ कहा गया है कि जनगणना और उसके बाद नए सिरे से परिसीमन कराये जाने के बाद ही यह व्यवस्था लागू होगी। वहीं, विपक्षी दल विशेषकर जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी बहुत पहले से ही जनगणना के साथ ही जातीय गणना की मांग करते हुए इसे मुद्दा बनाती रही है। इस बीच, भाजपा के खिलाफ बने विपक्षी दलों के ‘इण्डिया’ गठबंधन में शामिल अन्य दलों ने भी जातीय जनगणना की मांग का समर्थन किया है। वहीं नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाने के बाद अब कांग्रेस ने भी यही राग अलापना शुरु कर दिया है। विपक्ष के सभी दलों की नजर इस विधेयक के आ जाने के बाद ओबीसी मतों पर है। इसीलिए इस मांग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। ऐसा कदापि नहीं है कि देश में पहली बार जातीय जनगणना की मांग उठी हो। यानि भारत में जातिगत जनगणना की मांग दशकों पुरानी है। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही नहीं है कि अलग-अलग जातियों की संख्या के आधार पर उन्हें सरकारी नौकरी में आरक्षण दी जाये और जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जाये। बल्कि इससे इतर जातीय जनगणना की आड़ में राजनैतिक लाभ हासिल करने की भी यह कवायद है। भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानि एनडीए के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सबसे पहले और एनडीए से अलग होने के बाद जनता दल यूनाइटेड (जदयू) नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने यह दांव खेला।

नितीश के इस दांव को बिहार हाईकोर्ट से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायालय तक इसे घसीटा गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि देश की सबसे बड़ी अदालत में भारत सरकार ने बिहार सरकार की इस कवायद यानि जाति आधारित गणना को असंवैधानिक करार देते हुए कहा है कि यह अधिकार सिर्फ और सिर्फ उसे ही है। जातिगत गणना को लेकर हिन्दी भाषी और जाति के जाल में फंसे लोगों की भावनाओं को ‘हवा’ देने के लिए ही बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने ऐसी गणना अपने राज्य यानि बिहार में शुरू करा दी। बिहार सरकार के इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती भी दी गयी लेकिन वहां से उठी आग अब देश के हिन्दी भाषी राज्यों में ‘भड़क’ चुकी है। ‘माहौल’ को देखते हुए विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इण्डिया’ ने भी अपनी 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में हुई बैठक में भी एक साझा बयान जारी कर जातिगत गणना की वकालत की है। इस बैठक में देश की 26 प्रमुख विपक्षी पार्टियां शामिल थीं। बैठक के बाद सभी विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ ने देश में जातिगत जनगणना कराने की मांग की। सवाल यह भी है कि केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए यानि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जाति आधारित गणना को तैयार है कि नहीं? यहां यह उल्लेखनीय है कि जातियों की जनसंख्या के मुताबिकआरक्षण की मांग सबसे पहले 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने की थी। यूपी की समाजवादी पार्टी भी जातिगत जनगणना की मांग करती रही है।

दक्षिण भारत की कई पार्टियां इस तरह की जनगणना की मांग करती रही हैं, जबकि बिहार सरकार ने भी इसी साल जातिगत सर्वेक्षण की शुरुआत कराई लेकिन फिलहाल यह प्रकरण कानूनी पचड़े में फंसता दिख रहा है। वहीं, विपक्ष सामाजिक न्याय के नाम पर साल 2024 के चुनावों में जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाकर बीजेपी पर दबाव बनाने और दलित, पिछड़े वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। इससे पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने साल 2010-11 में देशभर में आर्थिक-सामाजिक और जातिगत गणना करवाई थी लेकिन इसके आंकड़े जारी नहीं किए गए थे। इसी तरह इसी तरह साल 2015 में कर्नाटक में जातिगत जनगणना करवाई लेकिन इसके आंकड़े भी कभी सार्वजानिक नहीं किए गए। कमोवेश कांग्रेस को जो डर था, वही भाजपा को भी हो सकता है। दरअसल, भाजपा को जातीय जनगणना से डर यह है कि उसे आशंका है कि उसके इस कदम से अगड़ी जातियों के उसके वोटर नाखुश हो सकते हैं। वहीं, भाजपा का परंपरागत हिन्दू वोट बैंक भी छिन्न-भिन्न होने की संभावना है। उधर, भाजपा का सहयोगी रहते ही जनता दल यूनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अपने राज्य में जातिगत सर्वेक्षण कराने का फैसला लिया था। तब भाजपा ने इस फैसले का समर्थन किया था, जिसके बाद बिहार सरकार ने इसी साल सात जनवरी को राज्य जातीय सर्वे की प्रक्रिया की शुरुआत भी कर दी। लेकिन इस कदम को न्यायालय में चुनौती दे दी गयी। याचिकाकर्ता का कहना था कि बिहार में हो रहा जातीय सर्वेक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है क्योंकि इस तरह की जनगणना कराने का अधिकार केवल केन्द्र सरकार को है।

बिहार सरकार द्वारा जातिगत जनगणना को लेकर लिए निर्णय के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दिया है। इसमें सरकार ने कहा है कि जनगणना का अधिकार राज्यों के पास नहीं है। इससे पहले कोर्ट में बिहार सरकार ने दलील देते हुए कहा कि राज्य में सर्वे का काम पूरा हो चुका है। सारे डाटा भी ऑनलाइन अपलोड कर दिए गए हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से डाटा रिलीज करवाने की मांग की थी। इससे पूर्व पटना हाईकोर्ट ने बिहार में जातीय जनगणना को लेकर उठ रहे सवालों पर सुनवाई की थी। चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस पार्थ सार्थी की खंडपीठ ने लगातार पांच दिनों तक याचिकाकर्ता और बिहार सरकार की दलीलें सुनीं थी। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना। इसके बाद एक अगस्त को पटना हाईकोर्ट ने सीएम नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी। पटना हाईकोर्ट ने इसे सर्वे की तरह कराने की मंजूरी दे थी। इसके बाद बिहार सरकार ने बचे हुए इलाकों में गणना का कार्य फिर से शुरू करवा दिया, जिसके बाद बिहार सरकार ने दावा किया कि जाति आधारित गणना का कार्य पूरा हो गया है। वहीं, जब से ‘इण्डिया’ गठबंधन ने आकार लिया है तब से नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के अलावा बिहार सरकार में शामिल राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अलावा विपक्षी गठबंधन कई दल जातिगत जनगणना को लेकर मुखर हो गए हैं।

दलितों को एकजुट करने के प्रणेता माने जाने वाले कांशीराम ने जातियों को आरक्षण दिए जाने की वकालत को और पुरजोर तरीके से उठाने के लिए ही जातिगत जनगणना की हिमायत की थी। बहुजन समाज पार्टी को आकार देने के समय उन्होंने ही, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी.. उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा दिया था। जाहिर है कि इस नारे को मूर्त रूप देने के लिए जातिगत जनगणना होना आवश्यक है। यही वजह है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसी साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली में पिछड़े, दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए जातिगत जनगणना की मांग की और यही नारा लगाया था। राहुल गांधी ने 2011 जातिगत जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने और पिछड़े वर्ग, दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने की मांग भी की थी। साफ है कि कांग्रेस ही नहीं विपक्ष के लगभग सभी दल दलितों और पिछड़ों के बड़े वोट को अपने पक्ष में लाना चाहता है। अब महिलाओं को आरक्षण की राह में सारी बाधाओं के हटने के बाद इतना तो तय है कि देश में जनगणना तो होकर रहेगी लेकिन क्या उसमें जातीय आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं या फिर उसे पूर्व की भांति ठण्डे बस्ते में डाल दिया जायेगा। फिलहाल अब जनगणना को लेकर विपक्ष, भाजपा पर पहले से ज्यादा आक्रामक दिख रहा है। ल्ल

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