रायबरेली में है एक ऐसी नदी जो लोगों के लिए बनी ‘अभिशाप’, जानिये इसकी कहानी

रायबरेली में है एक ऐसी नदी जो लोगों के लिए बनी 'अभिशाप', जानिये इसकी कहानी

रायबरेली: नदियां हमारे लिए जीवनदायनी होती हैं, सदियों से हमारे लिये जीवन की धारा है। इनके किनारे कई सांस्कृतिक और आर्थिक संपन्न सभ्यता पनपी, लेकिन कभी लोगों के लिए जीवन धारा रहने वाली एक नदी अब अभिशाप बन चुकी है।

रायबरेली से निकली और प्रतापगढ़ में सई में समाई बकुलाही नदी के किनारे लाखों किसान इस नदी से अभिशप्त हैं। उनकी हजारों हेक्टेयर खेती बर्बाद है और किसान गरीबी में रहने को मजबूर।

सरकारों का ध्यान इस ओर कभी नहीं रहा, थोड़े प्रयास जो हुए वह केवल खानापूर्ति तक सीमित रहे। हालांकि इन सबके बीच लोगों ने खुद ही इस अभिशाप से मुक्त होकर ठानी जिससे सार्थक परिणाम भी मिल रहे हैं और लोगों के जीवन में खुशियां दिखाई पड़ रही है।

रायबरेली के सलोन तहसील में भरतपुर झील से निकली यह नदी सई की मुख्य सहायक नदी है। क़रीब 174 किमी लंबी यह रायबरेली और प्रतापगढ़ जनपदों के बीच बहती है। यह प्रतापगढ़ में ही खजुरनी गांव में सई में मिल जाती है।

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प्राचीन और आध्यात्मिक नदी है बकुलाही

बकुलाही नदी की प्राचीनता इस बात से आंकी जा सकती है कि इसका वर्णन वेदों में भी मिलता है। वेदों में इसे बालकुनी कहा गया है जो कि अवधी भाषा के कारण बाद में संभवतः अपभ्रंश होकर बकुलाही हो गया। पुराणों और महाभारत में भी स्पष्ट तौर पर इस नदी का उल्लेख है।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में भी भरत और हनुमान के संवाद में इस नदी का उल्लेख मिलता है। राजा भरत के द्वारा हनुमान से यह पूछने पर कि उन्होंने क्या क्या देखा।हनुमान जी कहते है “सो अपश्यत राम, तीर्थम च नदी बालकुनी, तथा बरुठी, गोमती चैव भीमशालं वनम तथा।”

इसके अलावा कई धार्मिक ग्रंथों में भी इस अति प्राचीन नदी का उल्लेख मिलता है। धार्मिक और पौराणिक महत्व बकुलाही नदी का धार्मिक और पौराणिक महत्व रहा है। भगवान परशुराम के कर्मस्थलों से जहां यह गुजरती है वहीं इसी के तट पर प्रसिद्ध भयहरणनाथ धाम भी है जिसकी स्थापना भीम के द्वारा की गई थी।

भगवान शिव के धाम और नदी की महिमा का उल्लेख महाभारतकालीन कई ग्रंथों में मिलता है। इसके आलावा इस नदी के कई तटों पर प्राचीन मंदिर इसकी प्राचीनता और अध्यात्मिक महत्व को इंगित करते हैं।

जीवनदायिनी कैसे बनी अभिशाप

एक जीवन धारा को कैसे लोग अपने लिए अभिशाप मानने लगते हैं इसका उदाहरण बकुलाही नदी से मिलता है। लोगों ने स्वयं इस जीवनदायिनी को अपने लिए अभिशाप बना लिया। जगह-जगह इसकी धारा को रोककर निर्माण कर लिए गए।

उथले स्थानों पर बराबर कर खेती होने लगी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि यह अपनी मुख्य धारा से कटकर समस्या का कारण बन गई। बरसात के दिनों में हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो जाती है और सीपेज के कारण भूमि परती पड़ी रहती है। प्रतापगढ़ जिले में तो इस नदी का रास्ता ही बदल दिया गया और लोगों ने इसे काटकर छोटी कर दिया।

अभिशाप से अब बन रही है जीवनदायनी

बकुलाही को अभिशाप मानने वालों को लिए यह अब वरदान भी है, हालांकि यह वरदान अभी तक कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित है। इस प्रयास ने एक दिशा जरूर दी है और यह प्रयास कर दिखाया नदियों और प्राचीन जलाशयों के पुनुरुद्धार में लगे प्रसिद्ध समाजसेवी समाज शेखर ने।

करीब 21 किमी विलुप्त हो चुकी इस नदी को उसके पुराने स्वरूप में शेखर ने समाज और सरकार के सहयोग से वापस कराया। नतीजा यह हुआ कि करीब 40 गाँवों के लोग आज इस नदी को अपने लिये वरदान मान रहे हैं। अभिशाप मान रहे लोगों के लिए यह प्राचीन नदी बकुलाही अभी भी कैसे जीवनदायिनी बन सकती है।

इस संबंध में समाजसेवी समाज शेखर ने विस्तृत बात की। शेखर के अनुसार यदि समाज इसे अपनी नदी मान ले और इसके लिए प्रयास करे तो समस्या सुलझ सकती है। शेखर कहते हैं कि नदियों को स्वाभाविक प्रवाह की जरूरत होती है और हम अपनी लालच में इसका अतिक्रमण करते रहतें है जिसका दुष्प्रभाव हमारे ही जीवन में पड़ता है।

बकुलाही नदी के विभिन्न तकनीकी और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन कर रहे समाज शेखर ने कहा कि यह नदी रायबरेली और प्रतापगढ़ के लिए वरदान है, बस इसे समझने की जरूरत है। गांव के लोगों ने इसे साबित भी किया है। शेखर के अनुसार वह पूरी बकुलाही नदी के पुनुरुद्धार की कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं, जिसपर जल्द ही अमल करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

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