संपादकीय

चुनावी चंदे का संदिग्ध धंधा

20_12_2016-19rajeev_sachanjiनोटबंदी की घोषणा के बाद मोदी सरकार का एक बड़ा दावा यही था कि इस अप्रत्याशित फैसले का मकसद काले धन और साथ ही नकली नोटों पर लगाम लगाना है। प्रारंभ में आम धारणा भी यही बनी कि इस फैसले से काले धन वालों के होश ठिकाने लग गए, लेकिन अब यह अंदेशा गहरा गया है कि करीब-करीब सारा काला धन या तो सोने-चांदी में तब्दील हो गया या फिर सफेद होकर बैंकों में पहुंच गया। ऐसा होने का सीधा मतलब है कि काले धन वाले पात-पात रहे और सरकार डाल-डाल। इसकी पुष्टि आयकर कानून में संशोधन की पहल से भी हो गई। पता नहीं 30 दिसंबर के बाद क्या हालात बनेंगे, लेकिन वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक जिस तरह इसका पता लगाने में नाकाम हैं कि नए नोट बैंकिंग सिस्टम से बाहर निकलकर काले धन वालों के पास कैसे पहुंच रहे उससे आम आदमी खुद को ठगा महसूस कर रहा है। अब वह यह उम्मीद लगाए है कि मोदी सरकार कुछ ऐसा करेगी जिससे काले धन वाले मुश्किल में पड़ेंगे और नए सिरे से काला धन नहीं पैदा होने दिया जाएगा। इसी उम्मीद में वह तमाम परेशानी उठाने के बावजूद नोटबंदी के फैसले का समर्थन करने के साथ ही कैशलेस लेन-देन को अपनाने का काम कर रहा है। नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए सरकार तरह-तरह के उपाय करने के साथ यह संदेश देने में लगी हुई है कि अब मोबाइल फोन ही आपका बटुआ और पर्स है। नकदी संकट के इस दौर में नकदी रहित लेन-देन अपनाना जरूरी भी है और मजबूरी भी, लेकिन यह समझना मुश्किल हो रहा कि जब हर किसी को इसके लिए प्रेरित किया जा रहा है कि वह नकदी रहित लेन-देन के किसी उपाय से लैस हो जाए तब राजनीतिक दलों को इसके लिए बाध्य क्यों नहीं किया जा रहा कि वे भी कैशलेस तरीके से चंदा स्वीकार करें?
राजनीतिक दलों के चंदे की व्यवस्था को पारदर्शी बनाना क्यों जरूरी है, यह उस सरकार से बेहतर और कोई नहीं जान सकता जो काले धन के कारोबार पर रोक लगाना चाहती है। बावजूद इसके सरकार की ओर से ऐसा कोई कदम उठाया जाना शेष है जिससे काला धन जुटाने और उसे खपाने से रोकने में सफलता मिल सके। यदि कोई नोटबंदी के बाद नए सिरे से काले धन का कारोबार करना चाहे तो उसे तब तक परेशान होने की कोई जरूरत नहीं जब तक राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से कम के चंदे का श्रोत न बताने की रियायत मिली हुई है। ऐसे व्यक्ति किसी राजनीतिक दल को कुछ कमीशन देकर अपना काला धन सफेद कर सकते हैं। इसमें कोई परेशानी आए तो वे ‘काला धन विरोधी मोर्चा’ या ऐसे ही किसी नाम वाला खुद का राजनीतिक दल गठित कर अपने काले धन को आसानी से खपा सकते हैं। चुनाव आयोग के अनुसार 2015 में रजिस्टर्ड दलों की संख्या 1800 से अधिक हो चुकी थी। इनमें से तमाम दल ऐसे पाए गए जो कभी किसी चुनाव में उम्मीदवार नहीं खड़ा करते। आशंका है कि ऐसे कागजी दल काले धन को सफेद करने का काम करते हैं।
मुख्य धारा के राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए भी चंदे के रूप में काला धन हासिल करना और उसे खपाना इसलिए आसान है, क्योंकि जब वह यह दावा करते हैं कि उन्हें 20-20 हजार रुपये से कम राशि में ज्यादा चंदा मिला तो इस दावे की परख करने का कोई उपाय नहीं होता। इसी का परिणाम है कि करीब-करीब सभी राजनीतिक दल यही बताते हैं कि उन्हें चंदे के तौर पर मिली कुल रकम में बड़ा हिस्सा वह है जो 20-20 हजार रुपये से कम राशि में मिला। आम तौर पर यह हिस्सा 75 प्रतिशत से अधिक होता है। कुछ राजनीतिक दल तो ऐसे हैं जो यह बताते हैं कि उन्हें पूरा चंदा 20-20 हजार रुपये से कम राशि में ही मिला। स्पष्ट है कि राजनीतिक दल चंदे का गोरखधंधा बिना किसी शर्म-संकोच चला रहे हैं। उनकी मानें तो एक तो उन्हें 20-20 हजार रुपये से कम राशि का चंदा बहुत मिलता है और दूसरे वे सदस्यता शुल्क के जरिये अथवा कूपन बेचकर भारी-भरकम राशि जुटाने में समर्थ रहते हैं। उनके ऐसे संदिग्ध दावों को स्वीकार करना एक तरह से जीती मक्खी निगलना है। राजनीतिक दलों की इसलिए भी पौ-बारह है, क्योंकि उन्हें किसी तरह का कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। उन्हें अपने आय-व्यय का विवरण अवश्य देना पड़ता है, लेकिन उनके खातों का ऑडिट उनकी ही पसंद के ऑडिटर करते हैं। चुनाव आयोग न जाने कब से यह चाह रहा है कि राजनीतिक दलों के खातों का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की ओर से सुझाए गए ऑडिटर करें, लेकिन राजनीतिक दल इसके लिए तैयार नहीं। वे सूचना अधिकार कानून के दायरे में आने को भी तैयार नहीं और इसका मतलब है कि कोई भी उनसे यह नहीं पूछ सकता कि चाय पर या फिर खाट पर अथवा नोट पर चर्चा के आयोजनों में उन्होंने कितना पैसा खर्च किया? आयकर विभाग कभी किसी राजनीतिक दल के खातों की छानबीन नहीं करता, क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा राजनीतिक बदले के तहत कार्रवाई के आरोप का सामना करना।
राजनीतिक दल जिस तरह अपने चुनावी चंदे और आय-व्यय का संदिग्ध विवरण पेश करते हैं उसी तरह चुनाव खर्च का विवरण भी। चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च करने वाले प्रत्याशी भी हलफनामा देकर यही कहते हैं कि उन्होंने निर्धारित राशि के अंदर ही पैसा खर्च किया। चुनाव आयोग के पास इन झूठे हलफनामों को स्वीकार करने के अलावा और कोई जतन नहीं। मोदी सरकार को इस मांग का केवल समर्थन ही नहीं करना चाहिए कि राजनीतिक दल दो हजार रुपये से ज्यादा के चंदे का पूरा विवरण दें, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस आशय की कोई व्यवस्था भी बने। सच तो यह है कि दो हजार रुपये से कम राशि के चंदे की भी एक सीमा होनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों के अलग और राष्ट्रीय दलों के अलग। यदि किसी दल को दो हजार रुपये से कम राशि का चंदा तय सीमा से अधिक मिले तो वह निर्वाचन आयोग के निगरानी वाले किसी कोष में जाना चाहिए। यदि चंदे की व्यवस्था पारदर्शी बनाने के मामले में अन्य राजनीतिक दल सरकार का साथ देने के लिए तैयार नहीं होते तो भी उसे आगे बढ़ना चाहिए-ठीक वैसे ही जैसे वह नोटबंदी के फैसले पर आगे बढ़ी। यह ऐसा मामला नहीं जिस पर आम राय न बनने का हवाला दिया जाता रहे।

Related Articles

Back to top button