मेरी कलम से…

 

ग्लासगो में सम्पन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अब तक का बेहतरीन प्रदर्शन कर तीसरा स्थान हासिल किया। इस प्रतियोगिता में 26 स्वर्ण सहित 66 मेडल हासिल किए। कई खिलाड़ियों ने देश का नाम विदेशी धरती पर रोशन किया लेकिन जैसे ही स्वदेश वापसी हुई वे क्षेत्रीयता में बंटते हुए नजर आए। देश के प्रधानमंत्री व उनके राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने सभी खिलाड़ियों की प्रशंसा की और जल्द ही विभिन्न राज्य खिलाड़ियों को अपने-अपने स्तर पर सम्मानित भी करने वाले हैं। लेकिन इस बार के खेलों के दौरान जहां खिलाड़ियों ने देश का मान बढ़ाया वहीं हमने हमेशा की तरह कुछ नादानियां भी जारी रखीं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जब कोई खिलाड़ी मेडल जीतकर तिरंगे को सलाम कर रहा होता था तो यहां के निवासी राष्ट्रवाद की बजाय क्षेत्रीयता में बंट जाते थे और लोगों के मुंह से यह सुनने को मिलता कि हरियाणा के खिलाड़ी ने सोना जीत लिया, उत्तर प्रदेश के खिलाड़ी ने रजत जीत लिया, आंध्र प्रदेश के खिलाड़ी ने कांस्य जीत लिया आदि। कोई खिलाड़ी विदेश जाता है तो वह देश का प्रतिनिधित्व करता है न कि राज्यों का। जब राष्ट्रीय खेलों में विभिन्न राज्यों की टीमें भाग लें तब यह कहना सही है कि हमारा राज्य जीत गया या तुम्हारा। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब भारतीय खिलाड़ी मेडल या कोई सम्मान हासिल कर रहे होते हैं तब भारत का राष्ट्रगान बजाया जाता है ना कि किसी प्रांत का लोकगीत। हमारी सबसे बड़ी गलती है कि हम खिलाड़ियों को राज्यों के चश्मे से देखते हैं। बात यहीं तक सीमित रहती तो भी ठीक थी, समाज के तौर पर हमसे गलती हो जाये तो भी बात समझ आती है लेकिन सरकार भी ऐसी बड़ी गलती करेगी यह बात समझ से परे है। जो खिलाड़ी मेडल जीत कर लाये हैं वह भले ही किसी प्रदेश या विभाग के कर्मचारी या निवासी हों लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करते समय उनकी एकमात्र पहचान भारतीयता है। जब कोई खिलाड़ी विदेशी धरती पर अच्छा प्रदर्शन करता है तो प्रदेशों के बीच होड़ मच जाती है कि फलां प्रदेश के खिलाड़ी ने कम अच्छा प्रदर्शन किया या किसी ने ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। इस प्रकरण पर राष्ट्रीय खेल नीति का अपनी स्पष्टता को न प्रदर्शित कर पाना ही इस भ्रम का कारण है।

  • रामकुमार सिंह