संपादकीय

जनता की परेशानी

download-13पंजाब में विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहे हैं अलग अलग विभागों के कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन तेज होता जा रहा है। शिक्षा, सेहत, परिवहन सहित कई विभागों के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हैं। बठिंडा में एक ईजीेएस अध्यापक द्वारा खुद को आग लगा लेना दुर्भाग्यपूर्ण है। हर किसी को अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए विरोध करने का अधिकार है, लेकिन इस दौरान यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इससे आम जनता को परेशानी न हो। बुधवार को पनबस कंडक्टर्स यूनियन ने खरड़-चंडीगढ़ नेशनल हाईवे जाम कर दिया जिससे बीस किलोमीटर लंबा जाम लग गया। सभी कर्मचारियों को पक्के करने, समान काम समान वेतन लागू करने सहित यूनियन की कई मांगें हैं। इसी तरह ईजीएस, ईटीटी अध्यापक भी लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। बठिंडा, श्री मुक्तसर साहिब आदि जिलों में टंकियों पर चढ़ना तो आम बात हो गई है। मुख्यमंत्री बादल के गृह जिले खासकर लंबी क्षेत्र में तो टंकियों की सीढ़ियों पर दीवार बनवानी पड़ी क्योंकि वहां आए दिन प्रदर्शनकारी टंकियों पर चढ़कर जान देने की धमकी देते थे। कुछ दिन पहले पटियाला में नर्सिग यूनियन की प्रधान ने भाखड़ा नहर में छलांग लगा दी थी। यहां नर्से कई दिन से प्रदर्शन कर रही थीं और पूरी रात नहर के किनारे गुजारती थीं। पुलिस प्रशासन के लिए उनकी सुरक्षा बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी। मोहाली में टंकी पर चढ़े अध्यापकों का मामला तो पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पहुंच चुका है। कोर्ट ने अध्यापक यूनियन के साथ सरकार को भी फटकार लगाई थी। कोर्ट की यह फटकार पूरी तरह से जायज है क्योंकि दोनों ही पक्ष अपने कर्तव्यों का सही तरीके से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के कई तरीके हैं। यह जरूरी नहीं है कि हाईवे जाम कर दिया जाए या फिर टंकी पर चढ़ कर आग लगाने अथवा वहां से कूदने की धमकी दी जाए। संघर्षरत अध्यापकों व कर्मचारियों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे टकराव और बढ़े। बीस किलोमीटर लंबे जाम से निश्चित रूप से आम जनता को काफी परेशानी हुई। इससे कई लोगों की फ्लाइट व ट्रेन भी छूट जाती है। किसी को यथाशीघ्र अस्पताल पहुंचना होता है। कुछ ही दिनों पहले लुधियाना में जाम में एंबुलेंस के फंसने से एक मरीज की मौत हो गई। सरकार भी आमतौर पर तभी सक्रिय होती है जब हालात विस्फोटक हो जाते हैं। सरकार को भी चाहिए कि संघर्षरत कर्मचारियों की मांगों पर समय रहते उचित कार्रवाई करे जिससे इस तरह के टकराव की नौबत ही न आए। दोनों पक्षों के लिए आम जनता को होने वाली परेशानियों और कानून व्यवस्था को ध्यान में रखना जरूरी है।

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