जीवनशैली

अगर गुस्से वाले होने का है आपको घमंड, तो आप हो सकते है कंगाल….

क्रोध हमारे जीवन में लक्ष्यपूर्ति में सबसे बड़ी बाधा है। क्रोध की अवस्था में व्यक्ति के शरीर में स्थित अंतःस्रावी ग्रंथियों से ऐसे हार्मोंस उत्सर्जित होकर खून में मिल जाते हैं जो हमारे शरीर के लचीलेपन को समाप्त कर उसे कठोर बना डालते हैं। इससे हम अपनी मांसपेशियों और अंगोपांगों पर नियंत्राण खो बैठते हैं। इससे हमारी कार्य करने की स्वाभाविक गति व सहजता नष्ट हो जाती है। क्रोध जिस क्षण व्यक्ति के मस्तिष्क पर अपना अड्डा जमा लेता है व्यक्ति उसी क्षण विचारशक्ति से शून्य हो जाता है। विचारशक्ति के अभाव में कोई कैसे सही निर्णय ले सकता है?

किसी भी कार्य की सफलता उसके संकल्प पर निर्भर करती है। क्रोधावस्था में व्यक्ति का संकल्प क्षीण हो जाता है जिससे सफलता संदिग्ध हो जाती है। क्रोध की अवस्था में व्यक्ति भूल जाता है कि उसे क्या करना है और सही न करने पर उसकी भूल का क्या परिणाम होगा। क्रोधावस्था में व्यक्ति के मस्तिष्क की कोशिकाएँ अथवा न्यूरॉन्स जो संकल्प की पूर्णता के लिए अपेक्षित स्थितियों के निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं अपेक्षित मानसिक व भौतिक स्थितियों का निर्माण करने में सक्षम नहीं रह पाते हैं।

क्रोध व्यक्ति का सर्वनाश कर देता है अतः इससे बचना अनिवार्य है। प्रश्न उठता है कि क्रोध से बचने का क्या उपाय है? वो कौन सी स्थितियाँ हैं जिनमें व्यक्ति को क्रोध नहीं आता अथवा उसका रूपांतरण संभव है? शरीर और मन दोनों के स्वस्थ होने पर क्रोध की अधिकता का प्रश्न ही नहीं उठता। किसी भी सर्जनात्मक कार्य के दौरान व्यक्ति को क्रोध नहीं आता अतः क्रोध से बचे रहने के लिए सर्जनात्मकता का विकास सहायक हो सकता है।

क्रोध न आना अच्छी बात है पर यदि क्रोध आने पर आप उसे सही रूप में व्यक्त नहीं करते तो यह स्थिति आपके स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़राब हो सकती है अतः उचित रीति से क्रोध कीजिए तथा क्रोध प्रकट करने के बाद आप उसे मन से निकाल भी दीजिए अन्यथा यह स्थिति आपके लिए घातक हो सकती है। सर्जनात्मकता अथवा विभिन्न कलाओं के अभ्यास द्वारा यह संभव है। इनके अभ्यास द्वारा क्रोध का रूपांतरण संभव है।

यदि हम किसी घटना से क्षुब्ध हैं तो क्रोध करने की बजाय उस घटना पर कुछ लिखना, कार्टून व चित्रादि बनाना अथवा अन्य रचनात्मक कार्य करना लाभदायक होगा। यदि इस प्रकार की किसी भी रचनात्मकता में रुचि नहीं है तो बाग़बानी, साफ-सफाई अथवा पठन-पाठन व अध्ययन में संलग्न होकर क्रोध से मुक्ति पाई जा सकती है। व्यस्तता में ही नहीं सहजता में भी क्रोध उत्पन्न नहीं होता। सहजता से कार्य में उत्कृष्टता व सौंदर्य उत्पन्न होता है। वहीं से रचनात्मकता व कला का विकास होता है।

संगीत, नृत्य, अभिनय, योग, पेंटिंग, मूर्तिकला, लेखन, गायन आदि सभी कलाओं व रचनात्मक कार्यों में सहिष्णुता व सहजता की विशेष आवश्यकता होती है। जहाँ सहिष्णुता व सहजता नहीं, वहाँ सामान्य जीवन में तो छोडि़ए, कला में भी सौंदर्य नहीं रहता। रचनात्मकता द्वारा ही संभव है सहिष्णुता व सहजता के विकास द्वारा क्रोध का परिष्कार। (स्वास्थ्य दर्पण)

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