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एक लाख स्र्पए तनख्वाह, फिर भी 17 जिलों में नहीं हैं विशेषज्ञ डॉक्टर

doctor_in_mp_news_salary_2016910_11524_09_09_2016भोपाल। ब्यूरो। मप्र के आदिवासी और ग्रामीण जिलों में खराब स्वास्थ्य सेवाओं का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि विशेषज्ञ डॉक्टर एक लाख स्र्पए प्रति माह के वेतन पर भी आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में जाने को तैयार नहीं हैं। हाल ही में सरकार ने 17 जिलों के 44 अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञ के लिए विज्ञापन निकाला था, लेकिन एक भी डॉक्टर नियुक्त नहीं किया जा सका।

नेशनल हेल्थ मिशन की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. अर्चना मिश्रा के मुताबिक जहां मिशन के तहत विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति होनी है, इनमें वे जिले हैं जिसे केंद्र सरकार ने हाई प्रायोरिटी डिस्ट्रीक्ट घोषित कर सुविधा बढ़ाने के लिए ज्यादा फंड दिया है। इसी वजह से यहां ज्यादा तनख्वाह देकर डॉक्टरों को आकर्षित करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई डॉक्टर यहां काम नहीं करना चाह रहा है।
 
सोशल लाइफ नहीं
 
डॉ. मिश्रा के मुताबिक प्रदेश में डॉक्टरों की कमी पहले ही है। ऊपर से आदिवासी या ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों को शहरों के मुकाबले सोशल लाइफ और अन्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं, इस वजह से इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टरों की तैनाती जिला अस्पतालों के साथ-साथ छोटे अस्पतालों में भी होनी थी। केंद्र सरकार ने मप्र में मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए यह कदम उठाया था।
 
2012-13 में हर 1 हजार गर्भवती महिलाओं में से 230 की प्रसव के दौरान मौत हो रही थी। इसे 2017 में 100 पर लाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं मिलने से सवाल खड़े हो रहे हैं कि मातृ मृत्यु दर में कैसे कमी आएगी। कुछ महीनों पहले आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि मप्र में स्त्री रोग विशेषज्ञ के 54 प्रतिशत नियमित पद खाली पड़े हैं।
 
इन जिलों में होनी थी पोस्टिंग
 
अलीराजपुर, अनूपपुर, बड़वानी, झाबुआ, रायसेन, छतरपुर, दमोह, सागर, डिंडौरी, सतना, मंडला, पन्न्ा, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, टीकमगढ़, उमरिया।
 
ग्रामीण इलाकों में इसलिए नहीं जाना चाहते डॉक्टर
 
ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी करने में सबसे बड़ी बाधा सुविधाएं बनती हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर कोई उपकरण नहीं होते। हम जो पढते हैं, उससे पुरानी दवाएं वहां उपलब्ध होती है।
 
– डॉ. गिरीश चतुर्वेदी, एमएस
 
छोटी जगहों पर राजनीतिक दबाव जरूरत से ज्यादा होता है। इस वजह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं होती है। साथ ही कुछ लोगों का स्थानीय स्तर पर दबदबा होने की वजह से असुरक्षा की भावना मन में रहती है।
 
– डॉ. ज्योति वर्मा (परिवर्तित नाम), गायनेकोलॉजिस्ट
 
इनका कहना है 

विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी होने से यह समस्या आ रही है। हम फिर से विज्ञापन निकालेंगे, उम्मीद है इस बार डॉक्टर मिल जाएंगे।

 
 

 

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