अद्धयात्म

कुंभ में इस अखाड़े में हैं सबसे ज्यादा साधु, भगवान दत्तात्रेय की करते हैं साधना

शंकराचार्य की सेना कहलाने वाले साधु-संतों के अखाड़े कुंभ मेले की शान होते हैं। शंकराचार्य ने एक समय मठों-मन्दिरों एवं धर्म की रक्षा हेतु अखाड़ों की स्थापना की थी। कुंभ मेले में पेशवाई से लेकर शाही स्नान तक इन अखाड़ों की कठिन साधना-अराधना देखते ही बनती है। सनातन परंपरा से जुड़े ये अखाड़े शैव, वैष्णव एवं उदासीन परंपरा से जुड़े होते हैं।

शस्त्र और शास्त्र दोनों का होता है ज्ञान 
सनातन परंपरा के प्रतीक माने जाने वाले इन अखाड़ों और इनसे जुड़े नागा साधुओं का वैभव कुंभ और महाकुंभ में ही देखने को मिलता है। शंकराचार्य की सेना कहलाने वाले इन अखाड़ों से जुड़े साधु-संत शस्त्र एवं शास्त्र दोनों में ही पारंगत होते हैं।

उत्तराखंड के कर्ण प्रयाग में हुई थी स्थापना 
कुंभ मेले में शामिल होने वाले 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा है। इसे श्री जूनादत्त या फिर जूना अखाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस अखाड़े की स्थापना 1145 ई में उत्तराखंड के कर्ण प्रयाग में हुई। जूना अखाड़े से जुड़े साधु-संत अपने ईष्टदेव रुद्रावतार दत्तात्रेय की साधना-आराधना करते हैं।

लाखों की संख्या में जुड़े हैं साधु-संत
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े का केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। इस अखाड़े का एक आश्रम हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के समीप स्थित है। वर्तमान समय में जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर/आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज है, जो अब तक एक लाख से अधिक सन्यासियों को दीक्षा दे चुके हैं।  जूना अखाड़े के साधु-संतों का समूह – जिसमें बड़ी संख्या में नागा साधु शामिल हैं, जब कुंभ मेले में शाही स्नान के लिए निकलता है तो उनका वैभव देखने लायक होता है। कुंभ मेले में जूना अखाड़े का पंडाल भी लोगों का आकर्षण का केंद्र रहता है। इस अखाड़े से तमाम देशी-विदेशी भक्त जुड़े हुए हैं।

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