दिल्लीराजनीति

दिल्ली, दीपावली और दंगल

ताजा समस्या सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के रूप में सामने आई। सफाई कर्मचारी वेतन, एरियर और कैशलेस हेल्थ कार्ड आदि की मांग पर हड़ताल पर चले गए। दूसरी तरफ एमसीडी और दिल्ली सरकार आमने-सामने आ गए।

Capture देश की राजधानी दिल्ली लगता है सबसे अलग है। देश की अपनी समस्याएं अलग हो सकती हैं। राज्यों की अलग, लेकिन दिल्ली पिछले करीब एक साल से जैसे एक द्वीप बनकर रह गई है। जब से यहां नई सरकार (आम आदमी पार्टी) बनी है, एकदम भिन्न किस्म की राजनीति देखने को मिल रही है। लोग समस्याएं झेलने को मजबूर हो रहे हैं तो राजनीतिक पार्टियां अपने एजेंडे साधने में लगी हैं। भ्रष्टाचार का सवाल सत्ता पाने और उसके बचाए रखने का साधन बनकर रह गया है। जब हर कोई दीपावली मनाने की तैयारियों में जुटा हुआ है, यहां के लोग गंदगी झेलने को अभिशप्त हैं। सफाई कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से लोगों का हाल बेहाल है। नीचे नगर निगमों और ऊपर केंद्र में भाजपा का राज है और दिल्ली में सरकार आम आदमी पार्टी की। हर कोई एक दूसरे पर आरोप लगाकर खुद के कर्तव्यों की इतिश्री मान ले रहा है। ऐसे में दिल्ली की दीवाली में दंगल जैसे हालात बने हुए हैं।
वैसे भी यह समस्या कोई नई नहीं है। इस सरकार के दौरान भी अब से करीब छह महीने पहले भी एक बार सफाई कर्मचारियों की हड़ताल हुई थी। तब किसी तरह वह खत्म हुई थी और लोगों की समस्याएं भी। अब एक बार फिर लोग गंदगी में जीने को मजबूर हुए। हड़ताल खत्म होने के बाद भी ऐसी संभावनाएं भी व्यक्त की जा रही हैं कि निकट भविष्य में हड़ताल खत्म हो सकती है, लेकिन यह सवाल तो बना ही हुआ है कि आखिर ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है। यह सवाल भी है कि क्या इसके पीछे दलीय राजनीति तो ज्यादा जिम्मेदार नहीं है। यह सवाल इसलिए ज्यादा मौजूं है कि भाजपा को पहली बार केंद्र में बहुमत की सरकार मिली थी। उसके बाद राज्यों के चुनाव में भी उसे लगातार सफलता मिल रही थी। बीच में यह केवल दिल्ली में हुआ कि भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और यहां आप की सरकार बन गई। आप नेताओं और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का शुरू से आरोप रहा है कि भाजपा की सरकार उन्हें और उनकी पार्टी को काम नहीं करने दे रही है। कभी लेफ्टिनेंट गवर्नर के बहाने रोड़े अटकाए जाते हैं तो एमसीडी के बहाने। एमसीडी पर भी भाजपा का कब्जा है। ऐसे में दिल्ली की सरकार दोनों के बीच झूलती और संतुलन बनाती अधिक नजर आती है।
ताजा समस्या सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के रूप में सामने आई। सफाई कर्मचारी वेतन, एरियर और कैशलेस हेल्थ कार्ड आदि की मांग पर हड़ताल पर चले गए। इसका प्रभाव इस रूप में सामने आया कि चारों तरफ गंदगी का ढेर लगने लगा। दूसरी तरफ एमसीडी और दिल्ली सरकार आमने-सामने आ गए। मुद्दा बना फंड। नगर निगमों का आरोप रहा है कि दिल्ली सरकार उन्हें फंड नहीं देती। दिल्ली सरकार कहती है कि फंड जारी किया जा चुका है। निगमों की ओर से बताया जाता है कि उन्हें जरूरी फंड नहीं दिया गया है इससे आर्थिक समस्याएं होती हैं। दिल्ली के तीनों मेयर उपमुख्यमंत्री और एलजी से भी इस समस्या पर मिले। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बाकायदा आंकड़े जारी कर बताया कि कितना फंड जारी किया जा चुका है। यह भी बताया गया कि फंड में कोई कमी नहीं की गई है। अक्टूबर 2015 तक जितना भी पैसा एमसीडी को दिया जाना चाहिए था, वह दे दिया गया है। अर्बन डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के आंकड़े के साथ सिसोदिया ने जानकारी दी कि पिछले साल अक्टूबर 2014 तक एमसीडी को जितना फंड जारी किया गया था, उससे कहीं अधिक इस बार दिया गया है। इसके अलावा, डीडीए को प्रापर्टी टैक्स के रूप में 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा धन दिया गया है। अक्टूबर 2015 तक एमसीडी को दिए जाने वाले पैसे में पिछले साल के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में एमसीडी के इस तरह आरोप गलत हैं कि फंड जरूरत के हिसाब से नहीं दिया गया।
दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता का आरोप है कि दिल्ली सरकार को अभी भी तीनों नगर निगमों को 3000 करोड़ रुपये देने हैं। बकाया का भुगतान नहीं किया जा रहा है। उनका यह भी आरोप है कि दिल्ली सरकार निगमों को पंगु बनाना चाहती है। दिल्ली सरकार जानबूझकर चौथे वित्त आयोग की सिफारिशें लागू नहीं कर रही है। वित्त आयोग का गठन इसलिए किया गया था कि निगमों को ग्लोबल शेयर का पैसा मिलेगा और निगम की वित्तीय हालत सुधरेगी, लेकिन सरकार निगमों को 04 प्रतिशत हिस्सा ही देना चाहती है, जबकि उन्हें 12.5 प्रतिशत हिस्सा चाहिए। उनका मानना है कि सरकार को वित्त आयोग की सिफारिशें लागू करनी चाहिए ताकि निगमों की वित्तीय हालत सुधर सके। गुप्ता कहते हैं कि दिल्ली सरकार गलत आंकड़े जारी कर जनता को गुमराह रही है। सरकार जिस पैसे की डीडीए से वसूली का सुझाव एमसीडी को दे रही है, वह मामला कोर्ट में लंबित है। इस पर कोर्ट का स्टे भी है। इससे पता चलता है कि दिल्ली सरकार जानबूझ कर समस्या खड़ी कर रही है और झेलना पड़ रहा है निगमों और दिल्ली की जनता को। इस बीच, सफाई कर्मचारियों और आप नेताओं के बीच बातचीत भी हुई। आप नेताओं का कहना है कि सफाई कर्मचारियों के सामने पूरी स्थिति बताई गई। आम आदमी पार्टी के राज्य संयोजक दिलीप पांडे का कहना है कि कर्मचारियों को बताया गया कि अक्टूबर तक जितना पैसा एमसीडी को देना था, उतना दिया जा चुका है। बाकी बचा पैसा मार्च 2016 तक देना है। करीब 1100 करोड़ रुपये तय समय सीमा से पहले जारी किए जाने के मुद्दे पर सरकार से बात की जाएगी। डीडीए को 1500 करोड़ से ज्यादा रुपये एमसीडी को देने हैं। अगर यह पैसा दे दिया जाए तो एमसीडी की वित्तीय हालत सुधर सकती है और कर्मचारियों को वेतन व एरियर भी मिल सकता है। उनका यह भी कहना कि आम आदमी पार्टी की ओर से कर्मचारियों को हरसंभव मदद की जाएगी, लेकिन केंद्र सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। डीडीए को प्रापर्टी टैक्स के रूप में जो राशि एमसीडी को देनी है, उसे जारी किया जाना चाहिए। उनका यह भी आरोप है कि नगर निगम और केंद्र सरकार दिल्ली सरकार व राज्य की जनता को परेशान कर रही है।
फिलहाल इस तरह के आसार नजर आ रहे हैं कि कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है, लेकिन बुनियादी सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं क्योंकि मूल समस्याओं को अभी भी सुलझाया जाना बाकी है। ऐसे में एक तरह से यह भी तय लग रहा है कि निकट भविष्य में हड़ताल फिर होने की आशंका बनी रहेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि इस समस्या का पुख्ता हल खोजा जाए अन्यथा नगर निगम और दिल्ली सरकार एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे और दिल्ली की जनता समस्याएं झेलने के लिए मजबूर रहेगी। 2=

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