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युग चांडक केस: हत्यारों को दोहरी फांसी की सजा, जानिए कैसे रची गई थी साजिश

दस्तक टाइम्स एजेन्सी/ d1_1454629295नागपुर. आठ साल के मासूम युग चांडक के हत्यारों को अंतत: उनके अपराध की सजा मिल गई। अपराधी राजेश धनालाल दवारे (19) और अरविंद अभिलाष सिंह (23) को जिला एवं सत्र न्यायालय ने दोहरी फांसी व उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही जुर्माना भी लगाया गया है।
 
प्रधान सत्र न्यायाधीश किशोर सोनवणे ने आरोपियों को सजा सुनाते हुए मासूम बच्चांे के प्रति बढ़ रहे अपराधों पर गहरी चिंता व्यक्त की। कहा कि समाज के हित को देखते हुए अदालत युग के हत्यारों को फांसी की सजा देकर एक संदेश देना चाहती है।
अदालत के इस फैसेले पर अपराधियों के वकील मनमोहन उपाध्याय और प्रदीप अग्रवाल ने कहा कि वे इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। जबकि अदालत के इस फैसले से युग के परिजनों ने न्याय व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया है।
 
मामले में सरकारी पक्ष ने 50 और बचाव पक्ष ने 7 गवाह पेश किए। इसके अलावा सीसीटीवी फुटेज, अपराधियों के फोन लोकेशंस व फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर आरोपियों के अपराध सिद्ध हुए।
 
आगे क्या?
 
दैनिक भास्कर ने नागपुर के पूर्व मुख्य जिला शासकीय अधिवक्ता एवं बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा के सदस्य आसिफ कुरैशी से चर्चा की और इस बारे में जाना। जिसे हम अपने पाठकों से साझा कर रहे हैं…
 
 
अब सजा की पुष्टि के लिए फाइल हाईकोर्ट जाएगी। हाईकोर्ट भी सरकारी व बचाव पक्ष की दलीलें सुनेगा और तय करेगा की फांसी की सजा कायम रखनी है या इसमें परिवर्तन करना है। सजायाफ्ता सजा की पुष्टि के बाद जिला अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में 30 दिन में चुनौती दे सकता है। हाईकोर्ट में दायर अपील पर फैसला आने के बाद अपराधी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है। यह अपील भी जल्द तय होती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पुनर्विचार याचिका दायर करने का अधिकार होता है। इस पर निर्णय आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यदि कोई त्रुटि लगती है, तो अपराधी क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल कर सकता है।
 
दुबारा खटखटा सकते हैं कोर्ट का दरवाजा
 
न्याय की डगर यहां से निकल कर राज्यपाल व राष्ट्रपति के समक्ष पहुंचती है। फांसी की सजा पाए व्यक्ति या उसके संबंधी या उसके वकील या सभी अलग-अलग राज्यपाल के समक्ष दया याचिका पेश कर सकते हैं। राज्यपाल के समक्ष दया याचिका खारिज होने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष याचिका पेश की जा सकती है। दया याचिका के खारिज होने के बाद भी अपराधी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा पुन: खटखटा सकता है। यह याचिका दया याचिका पर दिए आदेश में तकनीकी खामी के खिलाफ या उस पर निर्णय होने में देरी या अन्य किसी कारण के लिए दायर की जा सकती है।
 
फांसी की सजा क्यों
 
अदालत ने आरोपियों को सजा सुनाने से पहले फांसी क्यों दी जाती है, यह समझाया। कहा कि भादंवि के तहत धारा 364 (ए) और 302 के तहत फांसी का प्रावधान है। फांसी की सजा का यह उद्देश्य है कि इससे समाज में सुरक्षा का संदेश जाए। बच्चों की सुरक्षा व समाज के हित के लिए फांसी की सजा जरूरी है।
 
इस तरह दिया था घटना को अंजाम
 
दंत चिकित्सक डाॅ. मुकेश चांडक के अस्पताल के पूर्व कर्मचारी राजेश दवारे ने एक अन्य साथी के साथ मिलकर 1 सितंबर 2014 को युग का अपहरण कर लिया था। दोनों ने पकड़े जाने के डर से घबराकर देर रात शहर से 27 किमी दूर ले जाकर युग की हत्या कर दी। अपराधियों के बयान के आधार पर पाटनसांवगी के समीप पुलिया के नीचे से युग का शव बरामद िकया गया था।

ऐसे रची गई थी युग के हत्या की साजिश
 
डॉ. मुकेश चांडक दंत चिकित्सक हैं। उन्होंने अपने अस्पताल के कर्मचारी राजेश दवारे को नौकरी से निकाल दिया था। बदले की भावना और पैसे के लालच से दवारे ने अपने एक साथी के साथ मिल कर युग चांडक के अपहरण की साजिश रची।
 
ऐसे रची साजिश
 
अपराधी राजेश दवारे इस हत्याकांड का मास्टरमांंइड कहा जा रहा है। वह डॉ.चांडक के परिवार को अच्छी तरह जानता था। लिहाजा उसने इस बात का फायदा उठाया। अपने साथी अरविंद को राजेश ने डॉ. चांडक के अस्पताल की यूनिफार्म पहनने को दी, ताकि युग उन्हें अस्पताल का ही कर्मचारी समझे।

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