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भारतीय समाज को भारतीय नजरिये से समझने की एक कोशिश

के.एन. गोविन्दाचार्य

भाग-2

स्तम्भ: सामान्यतः लोग समाज परिवर्तन के संदर्भ में राजसत्ता के महत्त्व और उसकी भूमिका के बारे में ज्यादा ही अपेक्षा पाल लेते हैं। तंत्र की यथास्थितिवादिता, भ्रष्टाचार, जड़ता आदि पहलुओं का उतना विचार नहीं करते।

भारत मे म्.पू. प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गाँधी ने ठीक ही कहा था कि रूपये में 15 पैसा ही नीचे तक पहुंचता है। शेष बीच की सीढियों पर गायब होता चलता है। सत्ता का अपना नैसर्गिक स्वभाव और वैशिष्ट्य भी होता है। सत्ता का स्वभाव है – ग्लैमर और पॉवर अर्थात् चमक-दमक एवं स्थितियों को प्रभावित करने की ताकत। उसकी विशेषता है तंत्र की विशालता और साधनों की विपुलता। वैसा ही सत्ता का नैसर्गिक विकार भी होता है। वह है सर्वंकशता, एकाधिकारवाद अर्थात् हर कुछ हमारे हाथ मे रहे और हमेशा रहे। और इसके अतिरिक्त विकार है कालक्रमेण भ्रष्टता, इसलिये सत्ता पर सामाजिक अंकुश आवश्यक होती है।

कुछ लोग सत्ता का अर्थ विधायिका समझते हैं। यह सोच अपूर्ण है। व्यवहार मे समाज परिवर्तन मे सत्ता का योगदान 5 अंगों के द्वारा होता है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के अतिरिक्त मीडिया(सोशल मीडिया भी) और एकेडेमिया(बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार आदि)। सही मे देखा जाय तो समाज परिवर्तन मे सत्ता के योगदान के संदर्भ में अलग-अलग स्थिति -परिस्थिति मे इन पाँचों मे से कोई भी अंग निर्णायक प्रभाव डाल सकता है। इसलिये उपरोक्त तीनों धाराओं के हिसाब से समाज परिवर्तन मे उनके योगदान का आकलन करना हो तो इन पाँचों अंगों को 100-100 अंक देकर अंदाज किया जाना चाहिये।

कुल 500 में किस धारा का प्रभाव बढा अथवा घटा? जैसे संप्रति सत्तासीन समूह को विधायिका की संख्या के हिसाब से अगर 100 में 60 अंक दिये जाँय तो जरुरी नही है उसे एकेडेमिया, या न्यायपालिका आदि मे अच्छे अंक मिलेंगे। उसी प्रकार कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, ईसाई गुट और इस्लामी गुट का प्रभाव अध्ययन करें तो उन्हे विधायिका छोड़कर अन्य तीन या चार में ज्यादा अंक दिया जा सकेगा।

परन्तु ग्लैमर और पावर का क्षेत्र सत्ता होने के कारण विधायिका की दृश्यमानता अधिक रहने से प्रभावशीलता ज्यादा दिखती है। पर निष्पादन को आधार मानकर देखा जाय तो चित्र दूसरा ही कुछ सामने आयेगा।

इस आलेख मे आज की स्थिति का विचार किया जाय तो पहली धारा का शक्ति स्थान और दुर्बल स्थान समझ मे आयेगा। कुल 500 अंकों में पहली धारा को 150-200 अंक प्राप्त हो सकेंगे। दूसरी धारा और तीसरी धारा के मूल्यांकन मे बहुत अंतर नही रहेगा।

समाज विभक्त है। परस्पर अविश्वास से घिरा है। जाति, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय के कारक तत्वों का सत्ता और चुनावी राजनीति के कारण समाज पर तोड़क प्रभाव निरंतर बढ़ता गया है।

समतायुक्त, एकात्म, सम्पन्न, एकरस समाज की स्थिति से हम कितने दूर हैं इसका एक अनुभव सन् 80 के दशक में आया। हुआ यह कि अ.भा.वि.प., संघ परिवार के कुछ कार्यकर्ता पंचायत चुनाव में प्रचार के लिये गाँव मे गये। वहाँ उनकी एक पढ़े-लिखे दलित व्यक्ति से बात हुई। इन कार्यकर्ताओं का परिचय होने, आने का उद्देश्य मालूम होने पर उस व्यक्ति ने शालीनता से कहा कि हम लोग तो आपको वोट नहीं देंगे। कारण पूछे जाने पर उसने कहा कि क्योंकि आपलोग वंदेमातरम पार्टी के हैं। इसमें आपको क्या आपत्ति है पूछने पर उसने जवाब दिया- आपके लिये भारत माता, माता होंगी पर हमारी स्थिति कुछ भिन्न है।

आपलोग शस्य श्यामला कहते हैं, होगी आपके लिये शस्य श्यामला, क्योंकि फसल कटने के बाद आपके खलिहान मे जायेगी। हमारे लिये तो वह बस एक कमर तोड़ मेहनत की जगह भर है। ऐसी ही उनकी बहुत तीखी प्रतिक्रिया अनेक पहलुओं पर थी। तब समझ मे आया कि इन स्थितियों मे से एकात्म समाज की ओर बढना है।

संघ के सरसंघचालक रहे बाला साहब देवरस ने कार्यकर्ताओं की बैठक मे एक बार कहा था कि समाज के बारे मे समझ तब आ सकेगी जब आप अपने बारे मे कल्पना करें कि आप सूअरों के बाड़े के बगल मे जिन्दगी गुजार रहे हैं। तब समरसता की ओर बढ़ने के लिये पहले समाज के प्रति सोच और जीवन के प्रति, किस दृष्टि से, परिमार्जन कहाँ?, किसका?, कैसे हो?, आदि स्पष्ट हो सकेगा।

सामाजिक न्याय के जो राजनैतिक प्रयास किये गए उसमे आरक्षण व्यवस्था भी एक है। अस्सी के दशक में बाला साहब देवरस जी ने संघ की अ.भा.प्रतिनिधि सभा मे एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उस सिलसिले में उन्होने कहा कि ध्यान रखें कि केवल जाति के आधार पर जो आरक्षण की बात करते हैं वे जातिवाद से ग्रस्त होंगे। किन्तु जो केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करते है वे अपने देश के सदियों के दुखद सामाजिक इतिहास को अनदेखा करते हैं।

सामाजिक समरसता के लिये जो भी योगदान करना चाहते हैं उन्हें जाति, वर्ग की चेतना से ऊपर उठकर सामाजिक न्याय और सामाजिक एकता मे संतुलन बैठाना पड़ेगा।

ऐसा डी क्लास होना जरुरी हैं जो बहुत कठिन है। अवचेतन के स्तर तक प्रयास करना होगा। मगर ऐसा किये बिना एकरस समाज की स्थितियों को प्राप्त करने की स्थिति नही आयेगी। इसमे बड़ा द्वंद्व आता है। वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ विचार करने में। उसके लिये मानसिकता बनाना ही पड़ेगा। क्योंकि सभी परस्पर विचार मिलकर ही तो हम एक राष्ट्र है।

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