ईरान पर ट्रंप के बदले तेवर! सैन्य कार्रवाई से पीछे हटकर आर्थिक दबाव पर जोर, होर्मुज समझौते पर अब भी अटका पेंच

वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ किसी नए बड़े सैन्य अभियान की संभावना से फिलहाल दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। वाशिंगटन अब तेहरान पर सैन्य दबाव बढ़ाने के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक उपायों पर ज्यादा जोर देता नजर आ रहा है। रविवार को ‘एक्सियोस’ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने ईरान के मुद्दे पर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते हुए कहा कि उनका प्रशासन फिलहाल कम आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रहा है।
ट्रंप ने ईरान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका इन हालात पर नजर रख रहा है। उनके मुताबिक, ईरान की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि उसके पास अपने सैनिकों को वेतन देने के लिए भी पर्याप्त धन नहीं है।
ईरान के साथ आंशिक बातचीत का दावा
ट्रंप ने कहा कि ईरान में भारी महंगाई और आर्थिक संकट को देखते हुए अमेरिका फिलहाल संयम बरत रहा है और तेहरान के साथ आंशिक बातचीत भी चल रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार, ईरान की कमजोर आर्थिक स्थिति और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी से तेहरान पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में वाशिंगटन को तत्काल किसी बड़े सैन्य अभियान की जरूरत महसूस नहीं हो रही है।
खाड़ी सहयोगियों ने भी सैन्य कार्रवाई से बचने की दी सलाह
ट्रंप ने बताया कि उनके खाड़ी सहयोगियों ने भी बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई से बचने और आर्थिक तथा कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की सलाह दी है। अमेरिका में कच्चे तेल की कीमत करीब 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन को ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए तत्काल सैन्य कदम उठाने से बचने का मौका मिल रहा है।
ट्रंप ने पूरे घटनाक्रम की तुलना शतरंज के खेल से करते हुए संकेत दिया कि आगे चलकर किसी समाधान तक पहुंचा जा सकता है। इससे साफ है कि फिलहाल वाशिंगटन की प्राथमिकता सैन्य टकराव के बजाय दबाव और बातचीत के जरिए स्थिति को अपने पक्ष में रखने की है।
होर्मुज समझौते पर किन शर्तों से फंसा पेंच?
उधर, होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बहाल करने को लेकर अमेरिका, ईरान और ओमान के बीच संभावित समझौते पर सहमति नहीं बन पाई है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख मोहम्मद बागेर जोलकद्र ने शनिवार को समझौते के लिए कई शर्तें रखीं।
ईरान की मांग है कि अमेरिका युद्ध पूरी तरह समाप्त करे, नौसैनिक नाकेबंदी हटाए और अपनी सेना वापस बुलाए। इसके साथ ही तेहरान ने प्रतिबंध हटाने, फ्रीज की गई संपत्तियां बहाल करने और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी रखी है।
ईरान ने अमेरिकी धमकियों और कथित अपमान को रोकने के साथ क्षेत्र में उसके सहयोगियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई बंद करने की मांग भी की है।
दूसरी ओर, अमेरिका होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इनमें व्यावसायिक जहाजों से किसी तरह का टोल वसूलने की कोशिश भी शामिल है।
परमाणु समझौते से ज्यादा होर्मुज पर ट्रंप का फोकस?
‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल कर देता है, तो ट्रंप नए परमाणु समझौते के बिना भी सैन्य दबाव कम करने पर विचार कर सकते हैं। ऐसा होने पर यह अमेरिकी नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।
पिछले कई महीनों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौता करना अमेरिका की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहा है। हालांकि, तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत को आगे बढ़ाना लगातार चुनौतीपूर्ण रहा है।
ईरान के परमाणु ठिकानों को लेकर ट्रंप का दावा
ट्रंप का कहना है कि ईरान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचाए जाने के बाद उसके लिए अपनी परमाणु क्षमताओं को दोबारा तैयार करना बेहद मुश्किल होगा। अमेरिका को यह भरोसा भी है कि उसकी खुफिया एजेंसियां ईरान की किसी गुप्त परमाणु गतिविधि का पता लगाने में सक्षम होंगी।
ईरान के जमीन के नीचे मौजूद यूरेनियम भंडार को लेकर उठ रही चिंताओं को भी ट्रंप ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। जुलाई में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा था कि परमाणु सामग्री जमीन के काफी नीचे है और दूसरे देश उसे हासिल नहीं कर पाएंगे।
ऐसे में ट्रंप प्रशासन के लिए व्यापक परमाणु समझौते की तुलना में फिलहाल होर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलना ज्यादा तात्कालिक प्राथमिकता बन सकता है। इससे अमेरिका सैन्य टकराव को बढ़ाए बिना ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।



