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एक साल बाद से ही धक्के खाने लगी थी लो-फ्लोर बसें, पांच साल में निकल गई हवा

bus-8_1445065149दस्तक टाइम्स/एजेंसी :
जयपुर। जयपुर में पूर्व की गहलोत सरकार के दौरान मंगवाई गई लो-फ्लोर बसों की सांसें फूल गई हैं। धुआं छोड़ती बसों की सांस इस कदर फूल गई है कि एक साल बाद से ही हर चौराहे-नुक्कड़ और सड़कों के बीचों-बीच जब-तब कोई न कोई लो-फ्लोर बस खराब होकर खड़ी हो रही है।

आज स्थिति यह है कि लगभग रोज ही एक न एक बस खराब नजर आ ही जाती है। करीब तीन साल पहले गहलोत सरकार के दौरान इन बसों की जेसीटीएसएल के माध्यम से जयपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए शुरुआत की गई थी।

धुआं उगलती बसों में अब हर कोई सफर करते डरता है। कारण साफ है, वह कहीं भी रुक सकती है, खराब हो सकती है। फिर दूसरी बस के लिए इंतजार-धक्के खाने जैसी स्थिति से सामना। बात यहां लोगों की परेशानी की ही नहीं है, बल्कि जयपुर में फैल रहे प्रदूषण की भी है, जिसकी चिंता कई बार सरकार की बैठकों में जताई जा चुकी है। जेसीटीएसएल अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि ये बसें धुआं छोड़ती हैं।

ज्यादातर टूटी-फूटी

लो-फ्लोर बसों का संचालन शुरू होने के साथ ही गलत तरीके से संचालन, रखरखाव और खराब बसों के कारण बसों की बॉडी में जगह-जगह क्रेक हो गए। पहले चरण में खरीदी गई 400 बसों में ज्यादातर के हाल ऐसे ही हैं जबकि दूसरे चरण में खरीदी बसें तुलनात्मक रूप से ठीक हैं। गहलोत सरकार के दाैरान खरीदी उन बसों की हालत ऐसी है कि उनके पिछले हिस्से की बॉडी तो पूरी तरह से टूट-फूट चुकी है। यही नहीं धुएं से पूरी तरह काली भी हो चुकी हैं। मौजूदा समय में 300 लो फ्लोर बसें चल रही हैं। इनमें 280 पुरानी हैं। इनमें से अब तक 100 से ज्यादा बसें बार-बार खराब होती रहीं। इन्हें चलाने वाले भी मानते हैं- ये बसें धुआं बहुत छोड़ती हैं। इनसे प्रदूषण स्तर बढ़ रहा है। लोग इन बसों की शिकायत करते रहते हैं।

वॉल सिटी में जाम लगाती हैं ये बसें

जयपुर के हेरिटेज एरिया यानी वॉल सिटी में लो फ्लोर चलाकर सरकार ने जाम जैसी स्थिति पैदा कर दी है। शुरू से ही इस बात का विरोध किया जा रहा था कि वॉल सिटी का ट्रैफिक सिस्टम सुधारा जाए, यहां वाहनों की आवाजाही कम या बंद की जाए, ऊपर से बड़ी-बड़ी लो-फ्लोर बसों का संचालन शुरू कर दिया। जैसे ही कोई बस यहां प्रवेश करती है, पूरा रास्ता जाम हो जाता है। यही नहीं, बड़ी व छोटी चौपड़ पर तो एक-दो बसें हमेशा स्टैंड के रूप में खड़ी रहती हैं। इससे हमेशा जाम बना रहता है।

 

143 करोड़ में खरीदी 400 बसें

राज्य सरकार ने 400 बसों की खरीद पर 143.82 करोड़ रुपए खर्च किए। सवाल यहीं खड़ा हुआ कि आखिर इतनी राशि खर्चने के बावजूद इनकी हालत इतनी खराब क्यों। जो बसें खरीदी गईं, उनमें 260 सेमी लाे-फ्लोर नॉन एसी बसें, 60 लो-फ्लोर एसी बसें, 60 नॉन एसी बसें और 60 स्टैंडर्ड फ्रंट इंजिन बसें शामिल हैं। इन बसों के लिए केंद्र सरकार ने 50 प्रतिशत, राज्य सरकार ने 20 प्रतिशत और 30 प्रतिशत स्थानीय संगठन यानी जेसीटीएसएल ने दिए।

क्यों प्रदूषण नियंत्रण जांच में पास हो जाती हैं बसें

काला धुआं उगलती गाडिय़ां प्रदूषण नियंत्रण जांच में पास हो जाती हैं, क्योंकि मानक हारट्रिज स्मोक यूनिट (एचएसयू) ही 27 साल पुराना है। 1986 में जब यह मानक लागू हुआ, तब शहर में केवल 3.43 लाख गाडिय़ां थीं। आज इनकी संख्या 7 गुना बढ़कर 21.38 लाख पर पहुंच चुकी है और यह तेजी से बढ़ रही है। मानक के मुताबिक, 65 प्रतिशत तक अपारदर्शिता वाला धुआं छोडऩे वाले वाहन प्रदूषण मुक्त माने गए हैं। भले हवा में घुलता धुआं साफ दिखे, सांसों में जाकर दम घोट दे या आंखों में जलन के साथ आंसू निकाल दे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि धुआं के 65 फीसदी अपारदर्शिता वाले पैमाने से कम से कम 15 फीसदी कम न किया गया तो शहरों में प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ेगा।

ऐसा क्यों जरूरी

भारतीय डीजल कारें यूरोपीय कारों की तुलना में 50% ज्यादा प्रदूषण (पार्टिकुलेट मैटर व नाइट्रो-ऑक्साइड्स) फैलाती हैं। वहीं, ईंधन की खपत भी 20% ज्यादा करती हैं।

ये सवाल भी हैं आज मौजूद

प्रदूषण के बावजूद प्रदूषण मुक्त क्यों? क्या वर्ष 1986 की स्थिति को ध्यान में रखकर तय किया गया मानक अब बदलना नहीं चाहिए? जब प्रदूषण मुक्ति के लिए देश-दुनिया में हरसंभव कोशिश हो रही है, तो यह जरूरी छोटा-सा प्रयास क्यों नहीं करना चाहिए?

 

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