दस्तक-विशेषराष्ट्रीय

क्यों गुस्से में है देश का अन्नदाता?

मध्यप्रदेश के किसान कई हफ्तों से फसल के अच्छे दाम और राज्य सरकार के कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। इसी दौरान मंदसौर जिले में किसानों द्वारा किये जा रहे धरना प्रदर्शन में पुलिस द्वारा चलायी गयी गोली में पांच किसानों की मौत और कई घायल हो गए जिसके बाद यह प्रदर्शन हिंसक हो गया और लगभग पूरे राज्य में फैल गया। देश में सुशासन, किसानी और किसानों के लिए सबसे अच्छा माना जाने वाला राज्य किसानों के विरोध प्रदर्शन की खबरों से सुर्खियों में छा गया। जिसे बाद में राज्य में सत्ता पर काबिज भाजपा ने इसे विरोधियों द्वारा रचित साजिश करार दिया। काफी मशक्कत के बाद शिवराज सिंह चौहान जो किसानों को मनाने के लिए उपवास पर भी गए हालात पर काबू पा सके।

कप्तान माली

देश के किसानों और खेती की स्थिति 31 मई 2017 के दिन बड़ी ही विडंबनाओं से भरी थी। एक तरफ अखबार भारत सरकार द्वारा कृषि और किसानों के लिए किये गए उपलब्धियों के कई पेज वाले विज्ञापनों से पटे पड़े थे तो वहीं दूसरी ओर उन्हीं अखबारों में पहले पन्ने पर किसानों की आत्महत्याएं, पुलिस की गोलियों से किसानों की मौत और हिंसक विरोध प्रदर्शन भी बड़े सुर्खियों से भरे हुए थे। देश की जनता के साथ-साथ कृषि क्षेत्र से जुड़े लोग भी अचम्भे में थे की आखिर जमीनी हकीकत क्या है जो सरकारी विज्ञापन में हैं? या जो अखबारों में पहले पन्ने पर हैं? इसके पहले इसी वर्ष अप्रैल में तमिलनाडु के कई किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक कभी अधनंगे तो कभी पूरे नंगे होकर अपनी विभिन्न माँगों को लेकर प्रदर्शन किया। कुछ ने तो अपना ही मूत्र पीकर और राष्ट्रपति भवन के सामने निर्वस्त्र होकर, सिर मुंडवाकर, गले में फाँसी का फंदा लगाकर विरोध किए और माँग न मानने पर स्वयं का मल भी खाने की धमकी दी पर फिर भी सरकार के कानों पर जूँ तक न रेंगी।
भारत में इस समय कृषि और किसान दोनों की स्थिति एक जैसी ही दयनीय बनी हुई है जहाँ खेती में बढ़ रही लागत से किसान की आमदनी कम हो रही है वही दूसरी ओर ज्यादा पैदावार होने के बावजूद किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिल रहा है जिसके चलते उत्पादन का खर्च तो दूर कई जगहों पर किसान दाम न मिलने की वजह से मंडियों में अपनी उपज फेंक कर चले जा रहे हैं। बाजार में उपभोक्ता द्वारा खरीदे जाने वाले किसी भी खाद्य पदार्थ के दाम का किसान कभी भी 50 फीसदी से ज्यादा नहीं पाता। एक सर्वेक्षण के अनुसार किसान द्वारा उगाई गई फसल में किसान द्वारा बेचने के बाद 21 फीसदी परिवहन, 12 फीसदी पैकेजिंग, 7 फीसदी मजदूरी और 6 फीसदी मंडियों द्वारा लगाया गया कर शामिल होता है जो किसान द्वारा बेचे गए फसल के ऊपर करीब 50 फीसदी होता है इसलिए हम किसान द्वारा बेचे गए दर से दोगुना तीन गुना या कभी-कभी चार गुना दर पर उत्पाद खरीदते हैं।
आखिर क्यों हुई मंदसौर की घटना?
मध्यप्रदेश के किसान कई हफ्तों से फसल के अच्छे दाम और राज्य सरकार के कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। इसी दौरान मंदसौर जिले में किसानों द्वारा किये जा रहे धरना प्रदर्शन में पुलिस द्वारा चलायी गयी गोली में पांच किसानों की मौत और कई घायल हो गए जिसके बाद यह प्रदर्शन हिंसक हो गया और लगभग पूरे राज्य में फैल गया। देश में सुशासन, किसानी और किसानों के लिए सबसे अच्छा माना जाने वाला राज्य किसानों के विरोध प्रदर्शन की खबरों से सुर्खियों में छा गया। जिसे बाद में राज्य में सत्ता पर काबिज भाजपा ने इसे विरोधियों द्वारा रचित साजिश करार दिया। काफी मशक्कत के बाद शिवराज सिंह चौहान जो किसानों को मनाने के लिए उपवास पर भी गए हालात पर काबू पा सके। मध्यप्रदेश के किसान अपनी फसल खासकर प्याज के कम दाम मिलने, देर से खरीद दाम निश्चित करने, सरकार द्वारा खरीदे गए प्याज के सड़ने, कर्ज न वापस कर पाने, फसल खराब होने, फसल न बिक पाने की हालात में सालभर में करीब 2000 किसानों द्वारा आत्महत्या जैसे मामले प्रमुख थे।
एमएसपी की मार
भारत सरकार अनाजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करती है जो उस अनाज के कुल उत्पादन खर्च से ज्यादा होना चाहिए जिस दर से नीचे उस अनाज को नहीं खरीदा या बेचा जा सकता है। इस समय देश में कुल 28 फसलें इस समय एमएसपी के अंतर्गत आती हैं जिनमें फल और सब्जियां शामिल नहीं हैं। हाल में अरहर की फसल जिसका एमएसपी 5500 रुपये प्रति कुंतल तय किया गया था वही अरहर किसान ज्यादा उत्पादन के कारण 3500 रुपये प्रति कुंतल पर मजबूरन बेच रहे थे। कुछ ऐसा ही हाल अन्य फसलों के साथ भी होता है।
एमएसपी केंद्र सरकार द्वारा निश्चित की जाती है जो और देश की फसल के लिए एक होती है पर भारत देश विविधताओं का देश है जहां हर राज्य या इलाके में फसल उपजाने के लिए लगाने वाले खर्च जैसे पानी की उपलब्धता, बिजली का खर्च, परिवहन, मशीनरी, भंडारण इत्यादि अलग-अलग होता है ऐसे में ओड़िशा या झारखंड में उपजाए गए धान का खर्च आन्ध्रप्रदेश और पंजाब में उपजाए गए धान के खर्च से कम होगा पर बाजार में उनके दाम एक ही होंगे।
यह एमएसपी की धारणा कई स्तर पर किसानों के विरुद्घ जा रही हैं जिनका गलत इस्तेमाल करके किसानों का ही नुकसान किया जा रहा हैं। गेहूँ और चावल जैसे अनाज जिन्हें सीधे फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) द्वारा एमएसपी पर खरीदा जाता है जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारू रखने के लिए है। अन्य फसलों के लिए एमएसपी सिर्फ संकेतात्मक दर है। हाल के वर्षों से एफसीआई भी अब जरूरत से ज्यादा फसलों का भंडारण कर चुकी है जो अनाजों के नुकसान के लिए हमेशा सुर्खियों में रहती है। ऐसे में एमएसपी जो एक अनाज के लिए समान दर पर होती है किसी निम्न और उच्च क्वालिटी के अनाज में कोई भेद नहीं दर्शाती जिसकी आड़ में कई व्यापारी उच्च क्वालिटी के अनाज की भी वही कीमत देते हैं जो एक निम्न क्वालिटी के अनाज की होती है। ऐसे में ज्यादा लागत पर उपजाए गए बेहतर क्वालिटी की फसल को भी वही दाम मिलता है जो कम उत्पादन खर्च पर उपजाए निम्न क्वालिटी की फसल को मिलता है जो किसान को भारी नुकसान पहुंचाता है।
कर्ज माफी और अर्थव्यस्था
रिजर्व बैंक ने राज्य सरकारों के किसानों का कर्ज माफ करने के फैसलों पर ऐतराज जताया है। आरबीआई ने अनुसार ऐसे कदम से वित्तीय घाटा और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ जाएगा। रिजर्व बैंक के अनुसार जब तक राज्यों के बजट में वित्तीय घाटा सहने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक किसानों के ऋण माफ करने से बचना चाहिए़ रिजर्व बैंक का कहना है किसान कर्ज माफी तत्काल रूप में तो उनकी समस्या हल कर देती है पर असलियत में तो यह करदाताओं का ही पैसा होता है। रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा है कि पहले भी देखा गया है कि किसानों के ऋण माफ करने से महंगाई बढ़ी है। इसलिए हमें बेहद सावधानी से कदम रखने चाहिए, इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए।
इसके पहले भी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चेयरमैन और अन्य वित्त विशेषज्ञ भी किसानों के कर्ज माफी के खिलाफ अपने बयान दे चुके हैं और जिनकी यह राय रही है कि यह एक गलत आदत को बढ़ा रहा है। ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा कर्ज माफ करने के बाद सभी कर्जदार किसान इसका लाभ उठा पाएंगे क्योंकि ज्यादातर छोटे किसान स्थानीय साहूकार या अन्य असंगठित क्षेत्रों से कर्ज लेते हैं जिनका हिसाब लगाना और उन्हें भुगतान करना आसान नहीं है। करीब 40 फीसदी किसान ही संगठित क्षेत्र यानि की बैंकों से कर्ज ले पाते हैं बाकि के अन्य असंगठित क्षेत्रों से ही ऊँचे दामों पर कर्ज लेते हैं जो काफी ऊँचे ब्याज दर पर होता है।
इसी दौरान कई बार ऐसे भी मौके आये हैं जब सरकारों ने किसानों को फसल नुकसान के मुआवजे के नाम पर एक रुपये की राशि चेक के द्वारा भेजी है। जापानी ब्रोकरेज फर्म नोमुरा के अनुसार इस समय करीब 9.5 लाख करोड़ रूपये का कृषि कर्ज देश में हैं जिसका करीब 65 फीसदी आने वाले 2 वर्षों में राज्य सरकारों द्वारा माफ किया जायेगा। जून 2017 में जारी अमेरिकन बैंक मेरिल लिंच रिसर्च के अनुसार वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव तक भारत में छोटे और मझले किसानों का कुल कृषि कर्ज भारत के जीडीपी के 2 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच जायेंगे।
कर्जमाफी और राजनीति
देश में राजनीतिक पार्टियों के लिए किसान एक सबसे बड़ा वोट बैंक (आबादी का करीब 60 फीसदी) है जिसे कोई भी पार्टी किसी भी हाल में नजरअंदाज करने का खतरा नहीं उठा सकती। हर चुनाव में वोट पाने के लिए किसानों के हितों की बातें हर पार्टी प्रमुखता से करती हैं जिसमें सबसे बड़ा वादा उनके कर्ज माफी का होता है। शायद ही कोई पार्टी हो जिसने सत्ता पाने के लिए यह वादा नहीं किया है। हर पार्टी किसानों को उनके फसलों का ऊँचा दाम, मुफ्त बिजली, सस्ते दामों पर या मुफ्त कृषि इनपुट, मुफ्त सिंचाई जैसी सुविधाओं के वादें करती है।
शायद ही कोई पार्टी इन किसानों के लिए सही परिवहन व्यवस्था, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, प्रोसेसिंग उद्योग, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, बेहतर भण्डारण सुविधा, वाजिब एमएसपी पर फसल की खरीद, बुआई, पूर्व किसानों का मार्गदर्शन, उच्च दर्जे की कीटनाशक और फसल संरक्षण तकनीकी इत्यादि विकासपरक बातें करती नजर आती हैं जो भविष्य में न केवल इन किसानों को आर्थिक मजबूती देंगे बल्कि उनका कर्ज पर निर्भर रहने और आत्महत्याओं को भी रोकेंगी।
इस समय हर राज्य में किसान सरकार की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं कि उनका कर्ज माफ कर दिया जाए क्योंकि लगभग हर राज्य की सरकार में बैठी पार्टियों ने ये वादें इन किसानों से चुनाव पूर्व किये थे जिन्हें पूरा करना अब इन्हें आर्थिक बोझ लग रहा है।
भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने के लिए किसानों के कर्ज माफी की बातें की थी और सत्ता में आते ही आनाकानी करने लगी बाद में काफी विरोध के बाद किसानों की यह मांग मान ली गयी, जिसके परिणामस्वरुप महाराष्ट्र जहाँ भाजपा ही सत्ता में है वहां भी यह मांग जोर पकड़ी और किसानों ने सरकार के आनाकानी की वजह से सड़कों पर उतरकर दूध बहाये, सब्जियां-फल फेंके, कई दिनों तक कृषि मंडियां बंद रखीं और सरकार ने विवश होकर कुछ शर्तों पर उनकी मांग मान ली जिसकी वजह से सरकार पर 40 लाख किसानों का करीब 30 हजार करोड़ रूपये कर्ज माफी का आर्थिक बोझ पड़ेगा। पंजाब सरकार भी राज्य में 10 लाख किसानों के 2 लाख रूपये तक के कर्ज माफ करने का निर्णय ले चुकी है जिसके चलते राज्य पर एक अनुमान के मुताबिक 24 हजार करोड़ रूपये का बोझ पड़ेगा।
इस समय देश के कई राज्य जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्णाटक, केरल, छत्तीसगढ़ इत्यादि के किसान कर्ज माफी की मांग को लेकर उम्मीद से हैं जिनका भी कर्ज आज नहीं तो कल माफ ही करना पड़ेगा जो एक गलत प्रवृत्ति को जन्म देगा। सचिन पायलट, कांग्रेस के राजस्थान अध्यक्ष का कहना है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब भी वे कांग्रेस को ही किसानों की समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानती थी और अब सत्ता में 3 वर्ष पूरे करने के बाद भी वही राग अलाप रही है। सत्ता पाने के लिए भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में ही वादा किया गया था कि वे किसानों की कुल लागत पर 50 फीसदी बढ़ाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करेंगे जिसके लिए किसी ने उन्हें दबाव नहीं डाला था। हर दिन किसान मर रहा है और कृषि मंत्री अपनी चुप्पी तक नहीं तोड़ रहे हैं।
हमने भी वर्ष 2008 में कृषि कर्ज माफ किये थे पर वह किसी राज्य केन्द्रित नहीं बल्कि पूरे देश के लिए था जबकि भाजपा अपने पार्टी शाषित राज्यों का ही सिर्फ कर्ज माफ कर रही है। यदि आप उत्तर प्रदेश में कर्ज माफ कर रहे हैं तो इसमें अन्य राज्यों का क्या दोष है कि उनका कर्ज नहीं माफ करेंगे? भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि वे अब सत्ता में बहुत दिन रह चुके हैं और अब किसान उनसे जवाब मांग रहे हैं। यह खुलासा हो चुका है कि भाजपा एक किसान विरोधी पार्टी है। भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ का कहना है कि किसानों के इस विरोध प्रदर्शन के पीछे उनके उत्पाद का सही दाम न मिलना है। 80 फीसदी से भी ज्यादा किसानों का उत्पाद एमएसपी के तहत नहीं आता है। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि वह किसानों को उनकी लागत के ऊपर 50 फीसदी ज्यादा भाव देगी जो प्रसिद्घ कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के फार्मूले के तहत था लेकिन बाद में इसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुपके से अक्टूबर 2015 में एक एफिडेविट दायर करके यह कह दिया कि इसका पालन संभव नहीं है। किसानों का सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा है और ऐसा ही असंतोष पूर्व कांग्रेस सरकार के भी साथ था। सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर्याप्त नहीं है। इस समय दो तिहाई कृषि उत्पाद एमएसपी से नीचे की दर पर बिक रहे हैं जो पिछले वर्ष से भी कम हैं। इस समय यह कहने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है कि किसानों के मसले अपने चरम पर पहुंच गए हैं।
नोटबंदी और किसान
किसानों की अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह कर्ज पर ही चलती है जिसके चलते वह खेती में बुआई से लेकर कटाई तक लगने वाली हर सेवा और इनपुट के लिए स्थानीय कृषि विक्रेता और अन्य सुविधा प्रदाताओं से उधारी सेवा लेता है और फसल बाजार में बेचने के बाद ही उनका भुगतान करता है। फसल के नुकसान होने या घाटे की हालात में वह इनका बकाया भुगतान नहीं कर पाता है और कर्ज के बोझ तले दब जाता है। करीब दो वर्ष के खराब मानसून के बाद 2016 में मानसून खेती के हिसाब से बहुत ही अच्छा आया था और किसानों ने अच्छी फसल भी उगाई और काटी पर जैसे ही उस फसल का दाम उसे बाजार में मिलना था वैसी ही भारत सरकार ने नोटबंदी का फरमान जारी कर दिया जिसके चलते नकद पर चलने वाली यह कृषि व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गयी। मंडियों में व्यापारी किसानों से फसलें नकद पर खरीदते हैं और किसान भी नकद में ही सौदा करना पसंद करता है और नोट बंदी के हालात में व्यापारियों ने टैक्स बचाने के लिए डिजिटल लेनदेन से बचना चाहा और किसानों के फसलों के दाम मजबूरन लागत से भी नीचे गिर गईं और कई राज्यों में किसान मंडियों में फसलों को ऐसे ही फेंक कर घर चले आये ।
उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में पिछले वर्ष जो आलू 600 रुपये प्रति कुंतल बिके थे वे 350 रुपये से भी नीचे के दामों पर बिके। इसी प्रकार से मई 2016 में जो आलू की अधिकतम कीमत 1100 रुपये प्रति कुंतल पर थी वह इस समय 400 रुपये के आसपास चल रही है। यही हाल 750 रुपये से लेकर 1200 रुपये प्रति कुंतल पर बिकने वाला प्याज लासलगांव में इस समय 450 रुपये प्रति कुंतल पर बिक रहा है। टमाटर के बाजार का भी यही हाल इस समय है। जो अंगूर प्रति किलो 45 रुपये पर बिक रही थीं वह इस समय 12 रुपये प्रति किलो के स्तर पर हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अरहर जिसने पिछले वर्ष 200 प्रति किलो के स्तर को पार कर न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक सुर्खियां बटोरी थी वह इस समय बम्पर पैदावार के कारण अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपये से भी नीचे 3700 रुपये के आसपास बिक रही है। कमोबेश यही हाल सोयाबीन, जीरा, लहसुन इत्यादि फसलों के भी हैं।
जिस समय किसानों ने अपने दो साल तक सूखा झेलने के बाद अच्छी आमदनी की उम्मीद कर रहे थे उसी समय अप्रत्याशित नोटबंदी ने उनके उम्मीदों पर पानी फेर दिया और अच्छा मुनाफा तो दूर किसान तो अपनी लागत भी वसूल न कर पाए दूसरे लेनदारों के कर्जे भी बढ़ गए। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफम्र्स (एडीआर) द्वारा एक हालिया सर्वेक्षण में जिसमें जनवरी 2017 से अप्रैल 2017 तक 527 लोकसभा क्षेत्र के 18 वर्ष से ज्यादा उम्र के 2 लाख 70 हजार मतदाताओं के विचार जाने गए। इस सर्वेक्षण में शीर्ष 5 मुद्दे खेती से जुड़े थे। सर्वेक्षण का नतीजा यह निकला कि 38.5 फीसदी मतदाताओं ने किसान कर्ज को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा माना और अन्य तीन प्रमुख मुद्दे खेती के लिए बिजली (29.9 फीसदी), कृषि सब्सिडी (28.7 फीसदी) और सिंचाई सुविधा (25.6 फीसदी) रहे। 
देश में हर समय अखबार किसान द्वारा कर्ज माफी, खराब फसल, अच्छी फसल पर कम दाम मिलना, आत्महत्या इत्यादि जैसी नकारात्मक खबरों से भरे रहते हैं और जब तक ये समस्याएं दूर नहीं होती देश का किसान और खेती दोनों की स्थिति बदतर ही रहेगी। इस तरह की खबरों से आम जनता में यह संदेश जाता है कि किसान हमेशा कर्ज माफी ही चाहता है और सरकार से हर वक्त सब्सिडी की मांग करता रहता है। जबकि स्थिति इसके बिलकुल उलट हो सकती है यदि सरकारें किसानों की खस्ता आर्थिक हाल को कर्ज माफी का मरहम लगाने की बजाए उन्हें कृषि सुविधाएँ जैसे कृषि उत्पाद के लिए सही परिवहन, व्यवस्था, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, प्रोसेसिंग उद्योग, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, बेहतर भण्डारण सुविधा, वाजिब एमएसपी पर फसल की खरीद, बुआई पूर्व किसानों का मार्गदर्शन, उच्च दर्जे की कीटनाशक और फसल संरक्षण तकनीकी इत्यादि विकासपरक सुविधाएँ पहुँचाने में अपनी ताकत लगाए तो किसान कभी कर्ज नहीं लेगा और वह आत्मनिर्भर होगा।
इन्फोसिस के चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी के अनुसार किसानों की समस्या का सबसे सीधा उपाय है कि सरकार को कृषि उत्पादों पर लगे सभी निर्यात, निजी भण्डारण जैसे प्रतिबंध तत्काल हटा लें। जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पाद जैसे प्याज, आलू और टमाटर के लिए ज्यादा बेहतर भंडारण सुविधाओं का सृजन, कृषि उत्पाद प्रोसेस करने वाली कंपनियों से सीधा संपर्क, कॉन्ट्रैक्ट खेती, किराये पर खेती जमीन उपलब्धता की तरफ तत्काल कदम बढ़ाना चाहिए। हमें इस समय अमूल मॉडल की तरह प्रभावी, समानता वाले वैल्यू चेन विकसित करने की आवश्यकता है।
भारत के पूर्व कृषि आयुक्त सिराज हुसैन के अनुसार इन कर्ज माफी के द्वारा ज्यादातर छोटे और मंझले किसान फायदा नहीं पा सकेंगे क्योंकि इनका कर्ज ज्यादातर असंगठित कर्ज क्षेत्र से आता हैं और यह कर्ज माफी उन्हीं बड़े किसानों को लाभ पहुंचाएंगे जो राज्य सरकार की एमएसपी नीति से पहले ही फायदा उठा रहे हैं। हुसैन का कहना है कि नीति आयोग को चाहिए कि वह कर्ज माफी पर पॉलिसी दस्तावेज बनाये और राज्यों को पूछे कि कैसे वे कर्ज माफी से बचें। किसान इसका भी इंतजार कर रहे है कि केंद्र सरकार कथित दिवालिये उद्योग घरानों के कर्ज (एनपीए) का क्या करती है?
क्या कहना है़ कृषि मंत्री का
मंदसौर की घटना के ठीक बाद जब कृषि मंत्री से सवाल किया गया था तो उन्होंने जवाब दिया था योगा कीजिये। हालाँकि वे बाद में पत्रकारों से कहे कि सरकार ने किसानों के हित के लिए बहुत कार्य किये हैं। आज जो (विपक्ष) किसानों की चिंता करने का नाटक कर रहें हैं, तो यह किसकी देन है? हाल ही में द इकॉनोमिक टाइम्स को दिए गए अपने एक साक्षात्कार में देश के कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा की मंदसौर की किसान हिंसा विपक्षी दलों की साजिश है जिसकी पुनरावृत्ति वे राजस्थान में भी करना चाहते थे। किसानों की यह समस्या 60 वर्षों के कांग्रेस शासन की वजह से है। प्रधानमत्री मोदी जी द्वारा किसानों के हित में किये हुए कार्यों का परिणाम दिख रहा है इसलिए विपक्षी दल डरे हुए हैं इसीलिए वे किसानों को भड़का रहे हैं इसी तरह का बखेड़ा वे नोटबंदी के समय भी करना चाह रहे थे पर वे सफल नहीं हुए अब लोगों को उनकी साजिश समझ में आ रही है। हालाँकि किसानों के कर्ज माफी मुद्दे पर वे सीधा जवाब देने की जगह प्रधानमंत्री के छोटे किसानों के लिए किये जाने वाले कई योजनाओं को गिनाने में लग गए। 

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