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धूमधाम से मनाई मुंशी प्रेमचन्द की 134वीं जयन्ती

munci premchandबाराबंकी। महान उपन्यासकार, साहित्य जगत की हस्ती धनपतराय उर्फ मुंशी प्रेमचन्द की 134वीं जयन्ती कार्यक्रम कायस्थ चित्रगुप्त महासभा के लखपेड़ाबाग स्थित कैम्प कार्यालय पर संगठन उपाध्यक्ष डा0 ए0के0 श्रीवास्तव द्वारा आयोजित किया गया। कायस्थ चित्रगुप्त महासभा द्वारा आयोजित इस जयन्ती कार्यक्रम की अध्यक्षता संगठन अध्यक्ष डा0 नवनीत प्रकाश श्रीवास्तव सर्वप्रथम मुंशीप्रेमचन्द्र की फोटो को माल्यार्पण किया। तत्पश्चात् अन्य लोगों ने भी पुष्प अर्पित किए। मुंशी प्रेमचन्द की जयन्ती के अवसर पर उपस्थित कायस्थ चित्रगुप्त महासभा के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए संगठन अध्यक्ष डा0 नवनीत श्रीवास्तव ने कहा हमारे कायस्थ समाज के लिए गर्व की बात है कि इतना बड़ा व्यक्तित्व हमारे समाज का था। सन् 1880 में बनारस जनपद के ग्राम लमही में डाक कर्मचारी अजायब रायके घर प्रेमचन्द जी जन्में थे। 13 वर्ष की उम्र में ही साहित्य लिखने लगे थे और हिन्दी के अलावा उनकी रूचि उर्दू में विशेष रूप में थी। वे अपने समकालीन उपन्यासकार ’’सरूर मोलमाशार’’ उर्दू के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे, उनके दीवाने थे। उर्दू की दीवानगी तो उनमें इतनी थी कि एक तम्बाकू बेचने वाले के पास रखी किताब ’’तिलस्मे होशरूबा’’ पढ़ने के लिए उससे दोस्ती की। इस तरह वे एक अलग तरह के प्रतिभावान वाले व्यक्तित्व भी थे। और हमें गर्व है कि आज हम सभी उनकी जयन्ती पर याद करके उनको श्रृद्धा सुमन अर्पित कर रहें हैं। इस अवसर पर कार्यक्रम संयोजन युवा जागरण मंच के अध्यक्ष एवं हिन्दू जागरण मंच के युवा प्रदेश अध्यक्ष मनीष श्रीवास्तव ने कहा प्रेमचन्द जी का व्यक्तित्व इतना बड़ा है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है, वे उपन्यासकार के साथ-साथ गरीबों के भी बहुत हमदर्द थे। एक बार जब उनकी पत्नी ने 40 रू0 उनको कोट सिलाने के लिए दिए तो वे रूपये उन्होंने अपने मजदूरों को दे दिए। जब पत्नी ने पुनः 40 रू0 दिए फिर उन्होंने वह रूपये मजदूरों को दे दिए और पत्नी से कहा कि हमारे मजदूर ठंड में कांपे और हम सूट पहनकर घूमें। यह शोभा नहीं देता। ऐसी उच्च सोच परख व गरीबों के हमदर्द भी थे।

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