अजब-गजब

नाचने वालियों से कहीं ऊपर हैं तवायफें, फिर किसने बिगाड़ दी इनकी इमेज?

तवायफ, जिन्हें लेकर समाज में आम धारण है कि वो महज नाच गाकर मनोरंजन करने वाली एक महिलाएं हैं. हालांकि “तवायफ” शब्द के मायने दूसरे भी हैं. लेकिन बहुत से लोग उस बारे में नहीं जानते. और तवायफों को लेकर जो लोकप्रिय धारणा बनी है, कहीं न कहीं उसके पीछे सिनेमा है.

मंजरी चतुर्वेदी का कहना है, “आप मुझे तवायफ कहकर पुकारिए, मैं बुरा नहीं मानूंगी. इतिहास के इस पहलू के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.” चतुर्वेदी मानती हैं कि वह तवायफों की कहानी दुनिया को सुनाने में करीब 20 साल लेट हैं. बता दें कि मंजरी कथक डांसर हैं और अपने शो के जरिए तवायफों को लेकर बनी अवधारणाओं को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं. उनके शोज में महिलाओं की शानदार कहानियों को साझा किया जाता है.

इसी कड़ी में गुरुवार को मुंबई के NCPA टाटा थिएटर में द कर्टसीन प्रोजेक्ट के तहत मंजरी एक शो में परफॉर्म करेंगी. इस दौरान 18 से 20वीं शताब्दी की महिला परफॉर्मर्स की कहानियों को प्रस्तुत करेंगी. यह कार्यक्रम शाम को 7 बजे से शुरू होगा.

मंजरी, लखनऊ शहर में पली-बढ़ी हैं और उन्होंने उत्तरी राज्यों में कथक सीखा. फिर अभिनय सीखने चेन्नई चली गईं. वह 16 साल की उम्र से ही परफॉर्म कर रही हैं. यहीं से उनका रुझान “तवायफ” होने की कला की तरफ बढ़ा. तवायफें, जो कभी राजसी महफिलों की डांसर होने से कहीं ज्यादा हुआ करती थीं.

एक बातचीत में मंजरी ने कहा, “हमने महिला परफॉर्मर्स को उतनी इज्जत नहीं दी है जितनी पुरुष परफॉर्मर्स को. और यदि पुरुष और महिला दोनों परफॉर्मर्स हैं तो क्यों पुरुष स्टार हैं और महिलाएं महज नाचने वाली?” मंजरी आरोप लगाती हैं कि सोसायटी ने किसी भी आत्मनिर्भर महिला पर नजर डाली और उसे मशहूर करने के लिए उसकी तुलना “वेश्या” से कर दी.

बॉलीवुड ने बिगाड़ी तवायफों की छवि

मंजरी के मुताबिक, यही चीज बॉलीवुड में भी सामने आई जिसने तवायफों को लेकर अपने हिसाब से एक मानसिकता बना रखी थी. वो हमेशा से एक बेबस महिला के तौर पर दिखाई जाती रही हैं. तवायफ, इस शब्द का इस्तेमाल डायलॉग्स में किसी को गाली देने के लिए भी किया जाता रहा.

हालांकि सदियों तक पहले तवायफें, मनोरंजन का सर्वश्रेष्ठ साधन हुआ करती थीं और आम लोगों के लिए निषेध थीं. वे राजसी हुआ करती थीं जिन्हें मनोरंजन की बारीक कलाएं आती थीं और जो पारसी भाषा में पारंगत थीं.

चतुर्वेदी कहती हैं, “ये महिलाएं शुरुआती भारतीय सिनेमा की बुनियाद रही हैं और मुजरे की कला के बहुत चीप वर्जन के जरिए आज भी सबसे खूबसूरत महिलाओं को दिखाने का प्रयास किया जाता है.”

बता दें कि मंजरी चतुर्वेदी पंजाब के 700 वर्षीय लोकगीत जुगनी को “बाबा बुले शाह” और “कथक” में “वारिस शाह” के साथ भारत के इतिहास में पहली बार लाने के लिए जानी जाती हैं.

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