जांच एजेंसियों की लड़ाई में विदेशी सीक्रेट एजेंटों का नाम आने से खफा हुई केंद्र सरकार

इन्होंने दुबई व कई दूसरी जगहों पर पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से संबंधित कुछ वित्तीय जानकारियां भी जुटाई थीं। इसके अलावा ये एजेंट दुबई व खाड़ी के देशों में पैसा लगाने वाले आईएएस-आईपीएस और दूसरे कई विभागों के अधिकारियों की जानकारी एकत्रित करने में लगे थे। विदेशों में ईडी के कई मामले सुलझाने में मदद करने वाले एजेंट भी अब दूर हट रहे हैं।
डीओपीटी के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने पिछले दिनों रॉ एवं अन्य एजेंसियों के सीक्रेट एजेंट को लेकर सख्त हिदायतें भी जारी की हैं। इनमें साफ तौर से कहा गया है कि एजेंसी अपने सीक्रेट एजेंट का ध्यान रखे। जब किसी एजेंट के खिलाफ देश द्रोह का केस हो या फिर वह दूसरे मुल्क में रह कर किसी अन्य एजेंसी को अपनी गोपनीय फाइलें शेयर करता हुआ पकड़ा जाता है तो ही उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
सरकार ने नए एजेंटों के लिए कुछ नियम भी बनाए हैं। एजेंसियों को कहा गया है कि वे आपातकालीन स्थिति को छोड़कर बाकी समय के दौरान नए मापदंडों का पालन करें। सूत्र बताते हैं कि पीएमओ भी आलोक वर्मा की कार्रवाई से खासा नाराज है। राकेश अस्थाना व अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज होने से पहले ही उन्हें इशारे में सूचित कर दिया गया था कि इस केस में रॉ के लिए काम करने वाले एजेंट भी हैं, इसलिए वे इस केस में बहुत गहराई से अध्ययन करने के बाद ही आगे बढ़ें।
सूत्रों की माने तो मनोज प्रसाद और सोमेश प्रसाद के अलावा कई अन्य लोग रॉ की मदद कर रहे थे। मनोज प्रसाद ने तो रॉ के कई बड़े टॉस्क पूरे किए थे। उसने पाक के पूर्व राष्ट्रपति को लेकर कई अहम जानकारियां हासिल की थीं। साथ ही देश के कई बड़े नौकरशाह, जो विदेशों में अपने भारी निवेश को लेकर सरकार के निशाने पर थे, उनकी सूचनाएं भी एजेंसी को दी थी। ये एजेंट किसी अफसर को पैसे देकर, तबादला या फिर अन्य कोई काम कराकर सूचना हासिल करते थे।
कई बार इन्हें हनी ट्रैप की मदद से उनके खातों की जानकारी लेनी पड़ी थी। ऐसे में जांच एजेंसी अपने स्तर पर या दूतावास की मदद से एजेंटों का भी काम करा देती थी। अधिकांश एजेंट दूसरे देश में निवेश एवं अन्य कारोबार के सिलसिले में ही दूतावास या सीक्रेट एजेंसी की मदद लेते हैं। कुछ एजेंट ऐसे भी थे, जो विदेश में रहते हुए भारत में सरकार से कोई फेवर ले लेते थे।




