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जहां रंगता है हर चेहरा और जुड़ता है हर दिल!

फागुन की दस्तक, मुस्कान की वापसी, रंगों ने फिर जोड़े दिलों के तार

फाल्गुन की मधुर बयार जब प्रकृति के आंचल में रंगों की चादर बिछाती है, तब मनुष्य का मन भी अनायास ही उल्लास से भर उठता है। होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भावनाओं का वह उत्सव है जिसमें रिश्तों की गरमाहट, सामाजिक समरसता और जीवन की सकारात्मकता एक साथ खिल उठती है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीवन की भागदौड़ में भले ही संवाद कम हो जाए, पर अपनापन कभी समाप्त नहीं होता, बस उसे जगाने के लिए एक अवसर चाहिए, और वही अवसर बनकर आती है होली। गुलाल की एक चुटकी मानो मन के द्वार खोल देती है, जहां गिले-शिकवे धीरे-धीरे पिघलने लगते हैं और मुस्कान संवाद का माध्यम बन जाती है। होली रंगों के माध्यम से जीवन के विविध आयामों को जोड़ने का संदेश देती है। यह पर्व बताता है कि भिन्नताओं के बीच भी एकता संभव है और रिश्तों की मजबूती ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति है। प्रकृति के नवोन्मेष के साथ यह त्योहार हमें भी भीतर से नया बनने की प्रेरणा देता है, कटुता को जलाकर प्रेम को अपनाने की। यही कारण है कि होली भारतीय संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जहां उत्सव केवल मनाया नहीं जाता, बल्कि जिया जाता है।

सुरेश गांधी

फाल्गुन की मादक हवा जब मन की देहरी पर दस्तक देती है, तब मौसम ही नहीं, भावनाएं भी रंग लेने लगती हैं। साथ होली का उल्लास समाज को फिर से जोड़ने आतुर होने लगता है। रिश्तों की धूल झरने लगती है, मन की गांठें खुलने लगती हैं और समाज का सामूहिक हृदय उल्लास से भर उठता है। यही वह क्षण होता है जब होली केवल एक त्योहार नहीं रहती, बल्कि संवेदनाओं का उत्सव बन जाती है। मतलब साफ है रंगों की फुहार केवल चेहरों को नहीं, बल्कि रिश्तों को भी सराबोर कर रही है। गिले-शिकवे भूलकर लोग एक-दूसरे को गुलाल लगा रहे हैं और भाईचारे का संदेश दे रहे हैं। होली का पर्व आते ही बाजार से लेकर आंगन तक उत्साह की रंगत गहराने लगी है।

रिश्तों में मिठास घुल रही है और समाज में सामूहिकता की नई तस्वीर उभरने लगती है। या यूं कहे तेज रफ्तार जिंदगी में दूर होते रिश्तों को होली फिर करीब ला रही है। रंगों का यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव का जीवंत उत्सव बन गया है. यह पर्व रंगों के बहाने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जहाँ मुस्कान संवाद बनती है और गुलाल अपनापन। होली भारतीय जीवन का वह जीवंत अध्याय है जिसमें परंपरा, आध्यात्मिकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक उत्साह एक साथ रंगों की तरह घुलते दिखाई देते हैं। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीवन का सबसे बड़ा रंग प्रेम है और सबसे बड़ा उत्सव मिलन।

रंगों में भीगती संवेदनाएं, रिश्तों में घुलता विश्वास
होली का नाम लेते ही मन में उमंग की लहर दौड़ जाती है। जैसे किसी ने दिल के भीतर छिपे बचपन को जगाकर कह दिया हो, “अब मुस्कुराने का समय आ गया है।” यह पर्व सामाजिक दूरियों को मिटाने का माध्यम है। वर्ष भर के मतभेद इस दिन गुलाल की एक चुटकी में धुल जाते हैं। आज जब जीवन की गति तेज हो चुकी है और रिश्तों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, तब होली हमें ठहरकर संबंधों की गरमाहट महसूस करने का अवसर देती है। परिवारों में जो संवाद कम हो गया है, वह इस दिन स्वतः लौट आता है। घरों में गुझिया की खुशबू, आंगन में रंगों की छटा और चौखट पर आने-जाने वाले मेहमान, सब मिलकर सामाजिक संस्कृति की जीवंत तस्वीर बनाते हैं।

बुराई पर अच्छाई की विजय का सांस्कृतिक संदेश
होली का पौराणिक आधार हमें जीवन का गहरा दर्शन देता है। कथा के अनुसार भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और दुष्ट होलिका के अहंकार का परिणाम आज भी हर वर्ष होलिका दहन के रूप में सामने आता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक सामाजिक संदेश है, अहंकार जलता है, विश्वास बचता है। आज के संदर्भ में देखें तो यह पर्व हमें अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मकता को जलाने की प्रेरणा देता है। आधुनिक समाज में मानसिक तनाव बढ़ रहा है, ऐसे में होली आत्मशुद्धि का सांस्कृतिक अवसर भी है।

सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उत्सव
होली का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका लोकतांत्रिक स्वरूप है। यह त्योहार किसी वर्ग, जाति या आर्थिक स्थिति का नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का है। रंग लगाते समय कोई बड़ा या छोटा नहीं रहता। यही कारण है कि होली को सामाजिक समरसता का सबसे सशक्त पर्व माना जाता है। ग्रामीण भारत में आज भी फाग के गीतों के साथ सामूहिकता की अनूठी परंपरा जीवित है। चौपालों पर ढोलक बजती है, लोकगीत गूंजते हैं और पूरा गांव एक परिवार बन जाता है। शहरों में भी अपार्टमेंट संस्कृति के बीच यह त्योहार लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का माध्यम बनता है।

फागुन और प्रकृति का रंगोत्सव
फाल्गुन केवल कैलेंडर का महीना नहीं, प्रकृति का उत्सव है। सरसों के पीले फूल, गेहूं की लहराती बालियां और आम की बौर, सब मिलकर प्रकृति की रंगोली सजाते हैं। यह वही समय है जब वातावरण में नवजीवन का संचार होता है। प्रकृति का यह परिवर्तन हमें भी जीवन में सकारात्मक बदलाव स्वीकार करने का संदेश देता है। जैसे पेड़ पुराने पत्ते छोड़ देते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी पुरानी कटुता छोड़ देनी चाहिए।

प्रेम और लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक
होली का सबसे मनमोहक रूप ब्रज की परंपराओं में दिखाई देता है, जहाँ कृष्ण और राधा के प्रेम प्रसंगों ने इसे सांस्कृतिक ऊंचाई प्रदान की। रंगों के माध्यम से व्यक्त प्रेम का यह स्वरूप भारतीय लोकजीवन की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। फाग, धमार, ठुमरी और लोकगीतों में जो उल्लास मिलता है, वह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनात्मक संवाद है। यही कारण है कि होली केवल खेली नहीं जाती, बल्कि गाई भी जाती है।

रंगों का मनोविज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान
रंग केवल दृश्य अनुभूति नहीं, मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी रखते हैं। लाल रंग उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है, पीला रंग ज्ञान और सकारात्मकता का, हरा रंग समृद्धि का, नीला रंग विस्तार और गहराई का. भारतीय परंपरा में रंगों का प्रयोग आध्यात्मिक साधना तक में किया गया है। तिलक, वस्त्र, ध्वज और पूजा सामग्री में रंगों का चयन केवल सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि मनोभावों को जागृत करने के लिए किया गया। होली हमें बाहरी रंगों के साथ भीतर के रंगों को भी पहचानने का अवसर देती है।

सकारात्मकता का सामाजिक अभियान
होली हमें जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण देती है। यह सिखाती है कि कठिनाइयों के बीच भी उत्सव संभव है। यदि समाज में संवाद बना रहे तो मतभेद स्थायी नहीं रहते। आज जब सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैं, तब होली जैसे पर्व हमें संवाद और सहिष्णुता का रास्ता दिखाते हैं।

आध्यात्मिक चेतना का रंग
होली का एक सूक्ष्म आध्यात्मिक पक्ष भी है। यह आत्मा के उत्सव का प्रतीक है। रंगों का मिलना हमें यह समझाता है कि विविधता में ही सौंदर्य है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व अहंकार को त्यागकर प्रेम को अपनाने का अवसर देता है। होली हमें भीतर से हल्का होने का अवसर देती है।

भारतीय संस्कृति की जीवित पहचान
हजारों वर्षों बाद भी यदि होली का उत्साह कम नहीं हुआ है, तो इसका कारण है इसकी सामाजिक उपयोगिता। यह त्योहार केवल परंपरा नहीं, जीवन पद्धति है। इसमें लोक है, शास्त्र है, संस्कृति है और आधुनिकता के साथ तालमेल बैठाने की क्षमता भी। होली भारतीय समाज की उस शक्ति का प्रतीक है जो हर परिस्थिति में उत्सव ढूंढ लेती है।

रंगों से रिश्तों तक
होली हमें याद दिलाती है कि जीवन का सबसे सुंदर रंग प्रेम है। यदि मन में सकारात्मकता हो तो हर दिन होली बन सकता है। यह पर्व केवल रंग खेलने का नहीं, बल्कि रिश्तों को संवारने का अवसर है। जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तब केवल चेहरा नहीं रंगताकृदिल भी रंगता है। जब दिल रंगते हैं, तब समाज मजबूत होता है। इस वर्ष होली केवल उत्सव न बने, बल्कि एक सामाजिक संकल्प बने, कटुता जलाने का, संवाद बढ़ाने का और प्रेम के रंग फैलाने का। क्योंकि सच यही है, रिश्तों में खुशियों की आहट तभी आती है, जब जीवन में होली उतरती है।

परिवारों को जोड़ने वाला भावनात्मक अवसर
तेज रफ्तार जीवन ने परिवारों को समय से दूर कर दिया है। ऐसे में होली एक भावनात्मक पुनर्मिलन का अवसर बनती है। कई लोग वर्ष भर बाद अपने घर लौटते हैं, रिश्तेदार मिलते हैं और पुरानी यादें ताजा होती हैं। होली का यही पारिवारिक पक्ष इसे विशेष बनाता है। यह त्योहार हमें बताता है कि रिश्ते समय मांगते हैं और उत्सव उन्हें जीवित रखते हैं।

आधुनिक जीवन में होली का बदलता स्वरूप
समय के साथ त्योहारों के रूप में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज डिजिटल युग में संदेश मोबाइल से भेजे जाते हैं, लेकिन वास्तविक आनंद अब भी व्यक्तिगत मिलन में ही है। सोशल मीडिया की होली रंग दिखाती है, लेकिन दिलों की होली केवल मुलाकात से ही खिलती है। आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाएं, प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें, जल की बचत करें और त्योहार को स्वस्थ संस्कृति का माध्यम बनाएं।

आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र
होली केवल सांस्कृतिक पर्व नहीं बल्कि आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा माध्यम है। बाजारों में रंग, पिचकारी, मिठाइयाँ, कपड़े और सजावटी सामग्री की बिक्री से व्यापार में तेजी आती है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारियों तक सभी के लिए यह पर्व आर्थिक अवसर लेकर आता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखा जाता है।

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