उत्तर प्रदेशराज्यवाराणसी

13 साल बाद इंसाफ : चंदापुर हत्याकांड में दोषी को फांसी

जुए के विरोध में उजड़ गया था पूरा परिवार

सुरेश गांधी

वाराणसी : तेरह साल पहले चोलापुर के चंदापुर गांव में हुई चार निर्मम हत्याओं के मामले में आखिरकार न्याय का पहिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया। एक मामूली विवाद से उपजी रंजिश ने जिस परिवार को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था, उस जघन्य हत्याकांड में अदालत ने दोषी रविंद्र उर्फ राजू पटेल को फांसी की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश विनोद कुमार की अदालत ने अपने सख्त फैसले में कहा कि दोषी को तब तक फंदे पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। यह फैसला न केवल एक परिवार के लिए न्याय की आस का अंत है, बल्कि समाज को भी एक कड़ा संदेश देता है कि जघन्य अपराधों के लिए कानून का शिकंजा देर से सही, लेकिन कसता जरूर है।

एक रात में खत्म हो गया हंसता-खेलता परिवार
यह हृदयविदारक घटना 29 अक्टूबर 2013 की रात करीब साढ़े नौ बजे की है, जब हमलावर लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से लैस होकर मोहनलाल जायसवाल के घर में घुसा। उस रात घर की चौखट पर जो खून बिखरा, उसने एक पूरे परिवार की सांसें छीन लीं। वह रात आज भी चंदापुर के लोगों के जेहन में सिहरन पैदा कर देती है। लोहे की रॉड और लाठियों से लैस हमलावर ने मोहनलाल जायसवाल के घर में घुसकर ताबड़तोड़ हमला किया। देखते ही देखते घर का आंगन चीखों और खून से भर गया। इस हमले में मोहनलाल, उनकी पत्नी कुसुम देवी, बेटे प्रदीप उर्फ गोलू और बेटी पूजा की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जबकि दूसरे बेटे संदीप ने गंभीर चोटों के बावजूद जिंदगी की जंग जीत ली।

जुए और शराब के विरोध ने ली चार जानें
पुलिस जांच में सामने आया कि इस खूनी वारदात की जड़ एक साधारण सामाजिक विरोध था। मोहनलाल अपने घर के पास जुआ खेलने, शराब पीने और मांसाहार बनाने का विरोध करते थे। यही बात आरोपी को नागवार गुजरती थी। शिकायत परिवार तक पहुंचने के बाद उसकी खुन्नस और गहरी हो गई। इसी रंजिश ने एक शांत गांव में खून की होली खेल दी। और पूरा परिवार उसकी हिंसा का शिकार बन गया।

बेटी की सूझबूझ से बची जान
हमले के दौरान घर में मौजूद छोटी बेटी आरती ने अदम्य साहस का परिचय दिया। चारों ओर चीख-पुकार और हिंसा के बीच उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया और चारपाई के नीचे छिपकर अपने चाचा को फोन कर घटना की जानकारी दी। उसकी इस सूझबूझ ने न केवल उसकी जान बचाई, बल्कि पुलिस को समय पर सूचना भी मिल सकी। और पुलिस कार्रवाई की पहली कड़ी बनी। घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई थी। पुलिस ने तत्काल मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की और छह दिन के भीतर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

25 गवाह, पुख्ता सबूत और लंबी सुनवाई
इस मामले में अदालत के समक्ष 25 गवाहों के बयान दर्ज हुए और खून से सने कपड़ों सहित तमाम साक्ष्य पेश किए गए। लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद अदालत ने इसे ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मानते हुए मृत्युदंड का फैसला सुनाया।

खामोश घर ने सुनी इंसाफ की दस्तक
आज भी चंदापुर गांव का वह मकान खामोश खड़ा है, जो कभी हंसी और खुशियों से गुलजार था। वर्षों तक बंद दरवाजों के पीछे जैसे न्याय की प्रतीक्षा ठहरी रही। नवरात्र की सप्तमी पर आया यह फैसला उस सन्नाटे को चीरता हुआ इंसाफ की दस्तक बनकर सामने आया है।

समाज के लिए सख्त संदेश
यह फैसला सिर्फ एक अपराधी को सजा नहीं, बल्कि समाज को चेतावनी भी है कि छोटी-सी रंजिश जब हिंसा में बदलती है तो उसका परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। साथ ही यह भी साबित हुआ कि न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन उसकी आहट अंततः पीड़ितों तक पहुंचती जरूर है।

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