
जब मोहन वीणा ने दुनिया से कहा, रुको, सुनो और थम जाओ!
युद्ध के शोर में शांति के सुर
वाराणसी के संकट मोचन मंदिर का पावन प्रांगण मंगलवार की रात केवल संगीत का साक्षी नहीं बना, बल्कि वह एक वैश्विक संदेश का केंद्र बन गया। जब दुनिया के कोने-कोने में युद्ध, तनाव और अस्थिरता की खबरें गूंज रही हैं, ठीक उसी समय पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट ने अपनी मोहन वीणा के सुरों से मानो विश्व को ठहरने का आह्वान किया। उनके साथ सात्विक वीणा पर पंडित सलिल भट्ट की संगति ने इस संदेश को और भी प्रभावशाली बना दिया। राग “विश्व रंजनी” की प्रस्तुति केवल एक संगीत रचना नहीं थी, बल्कि वह एक भावपूर्ण प्रार्थना थी, मानवता के लिए, शांति के लिए, संतुलन के लिए। आलाप से लेकर झाला तक हर सुर में एक बेचैनी भी थी और उसे शांत करने की साधना भी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सुरों के माध्यम से युद्ध के वातावरण पर नियंत्रण पाने और विश्व को एक नई दिशा देने की कोशिश की जा रही हो। संकट मोचन की यह प्रस्तुति इस बात का सशक्त प्रमाण बन गई कि जब शब्द विफल हो जाते हैं, तब संगीत ही वह भाषा बनता है जो सीधे हृदय से संवाद करता है
–सुरेश गांधी
फिलहाल, संकट मोचन मंदिर में इन दिनों संगीत ही नहीं गूंज रहा है, बल्कि आध्यात्मिक तरंगे भी समय को ठहरा देने पर विवश करती नजर आ रही है. दीपों की लौ, मंदिर की पवित्रता और भक्तिभाव से भरे श्रोताओं के बीच जब मोहन वीणा और सात्विक वीणा के स्वर उठे, तो लगा मानो स्वयं पवनपुत्र हनुमान के चरणों में एक वैश्विक प्रार्थना अर्पित की जा रही हो। इस अद्वितीय संगीतमय क्षण के साक्षी बने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी ने कार्यक्रम के बाद पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट और उनके सुपुत्र, ‘तंत्री सम्राट’ पंडित सलिल भट्ट से विस्तृत बातचीत की। खास यह है कि ये संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा तक पहुंचने का एक माध्यम बन गया। मोहन भट्ट ने संगीत, साधना और ‘विश्व रंजनी’ के रहस्यों से पर्दा उठाते हुए जो कहा, वो अकल्पनीय रही. आलाप से लेकर जोड़ और झाला तक, हर चरण में इस राग ने एक नई परत खोली। विलंबित लय की गंभीरता और द्रुत गति की चंचलता ने मिलकर एक ऐसा भाव रचा, जो श्रोताओं को भीतर तक स्पर्श करता चला गया। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-
सुरेश गांधी : संकट मोचन संगीत समारोह में आपकी प्रस्तुति को किस रूप में देखा जाए, एक कार्यक्रम, साधना या कुछ और?
पं. विश्व मोहन भट्ट : मुस्कुराते हुए कहते हैं, देखिए, संकट मोचन में प्रस्तुति देना किसी भी कलाकार के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं होता। यह साधना है, आराधना है। यहां हर सुर सीधे पवनपुत्र हनुमान के चरणों में अर्पित होता है। जब मैंने मोहन वीणा को हाथ में लिया, तो लगा जैसे मैं वादन नहीं, बल्कि प्रार्थना कर रहा हूं। वे आगे जोड़ते हैं, हमने जो भी प्रस्तुत किया, वह किसी मंचीय प्रदर्शन के लिए नहीं था, बल्कि यह विश्व शांति के लिए एक विनम्र प्रयास था।
प्रश्न : आपकी और आपके पुत्र पं. सलिल भट्ट की जुगलबंदी को श्रोताओं ने बेहद सराहा। इस संगति को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
उत्तर : यह जुगलबंदी कम, संवाद अधिक है। पिता-पुत्र का संबंध यहां गुरु-शिष्य में बदल जाता है। मेरे सुर एक दिशा देते हैं और सलिल उसे आगे बढ़ाते हैं। मोहन वीणा और सात्विक वीणा का यह संगम परंपरा और नवाचार का मिलन है।
प्रश्न : आपने इस प्रस्तुति में राग “विश्व रंजनी” को केंद्र में रखा। इसके पीछे क्या भावना थी?
उत्तर : आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें अशांति, संघर्ष और तनाव अधिक है। ऐसे समय में हमने सोचा कि संगीत के माध्यम से शांति का संदेश दिया जाए। क्यों न एक ऐसा राग प्रस्तुत किया जाए, जो केवल कानों को नहीं, बल्कि आत्मा को भी स्पर्श करे। ‘विश्व रंजनी’ उसी भावना से जन्मा, यह राग विश्व को रंजित करने, उसे शांति और संतुलन देने का प्रयास है।
प्रश्न : क्या संगीत वास्तव में विश्व के तनाव और संघर्ष को कम कर सकता है?
उत्तर : संगीत में अपार शक्ति है। यह मनुष्य के भीतर के द्वंद्व को शांत करता है। जब व्यक्ति भीतर से शांत होगा, तभी समाज और विश्व में शांति संभव है। हम संगीतकारों का दायित्व है कि हम सुरों के माध्यम से प्रेम, करुणा और एकता का संदेश दें। मेरा मानना है, संगीत से विश्व युद्ध का वातावरण भी बदला जा सकता है.
प्रश्न : आपकी प्रस्तुति में आलाप, जोड़ और झाला के साथ विलंबित और द्रुत गत की रचनाएं बेहद प्रभावी रहीं। क्या यह पूर्व निर्धारित था या सहज प्रवाह?
उत्तर : शास्त्रीय संगीत में संरचना होती है, लेकिन आत्मा सहजता में होती है। आलाप से हम राग का स्वरूप स्थापित करते हैं, जोड़ और झाला में उसे विस्तार देते हैं, और विलंबित-द्रुत में उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति होती है। परंतु मंच पर बहुत कुछ उस क्षण की ऊर्जा पर निर्भर करता है।
प्रश्न : अंत में आपने श्रीराम भजन की धुन से वादन को विराम दिया। क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण था?
उत्तर : संकट मोचन में बिना भक्ति के कोई भी प्रस्तुति पूर्ण नहीं हो सकती। श्रीराम भजन के माध्यम से हमने अपनी प्रस्तुति को ईश्वर को समर्पित किया। यह हमारे लिए समापन नहीं, बल्कि समर्पण था।
प्रश्न : आपको ग्रैमी अवॉर्ड जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। क्या वैश्विक मंच पर भारतीय शास्त्रीय संगीत को प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण होता है?
उत्तर : चुनौती जरूर होती है, लेकिन यही हमारी जिम्मेदारी भी है। जब मैंने ‘मीटिंग बाई दी रीवर’ के लिए ग्रैमी प्राप्त किया, तब यह केवल मेरा नहीं, बल्कि भारतीय संगीत का सम्मान था। दुनिया में लोग हमारी परंपरा को समझना चाहते हैं, हमें बस उसे सच्चाई से प्रस्तुत करना होता है।
प्रश्न : आपने मोहन वीणा का निर्माण किया और आपके पुत्र ने सात्विक वीणा को विकसित किया। इस नवाचार को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर : जब मैंने मोहन वीणा का निर्माण किया, तब यह केवल एक प्रयोग था। लेकिन आज यह भारतीय संगीत की पहचान बन चुका है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। परंपरा स्थिर नहीं होती, वह प्रवाहित होती है। मैंने गिटार को भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनुरूप ढालकर मोहन वीणा बनाई। सलिल ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सात्विक वीणा का निर्माण किया। यह दर्शाता है कि संगीत जीवंत है और समय के साथ विकसित होता है। देखा जाएं तो हर पीढ़ी का अपना योगदान होता है। मैंने प्रयास किया है कि परंपरा को बनाए रखते हुए उसमें कुछ नया जोड़ा जाए, ताकि युवा पीढ़ी भी इससे जुड़ सके।
प्रश्न : जयपुर में 35 मिनट में 52 राग प्रस्तुत करने का आपका रिकॉर्ड भी काफी चर्चित रहा। यह अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : यह एक अनूठा अनुभव था। हर राग का अपना अलग भाव और व्यक्तित्व होता है। एक राग में डूबकर तुरंत दूसरे में प्रवेश करना आसान नहीं होता। लेकिन यह एक साधना का परिणाम था और ईश्वर की कृपा से सफल हुआ।
प्रश्न : आपके साथ तबले पर पंडित राम कुमार मिश्रा और कौशिक कंवर की संगत रही। संगतकारों की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर : संगतकार संगीत की आत्मा को विस्तार देते हैं। बनारस घराने की तबला संगत ने हमारी प्रस्तुति को और समृद्ध किया। यह सामूहिक साधना का ही परिणाम है कि प्रस्तुति पूर्णता प्राप्त करती है।
प्रश्न : अंत में, युवा पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर : संगीत को केवल करियर न बनाएं, इसे साधना बनाएं। इसमें धैर्य, अनुशासन और समर्पण आवश्यक है। यदि आप ईमानदारी से साधना करेंगे, तो संगीत स्वयं आपको मार्ग दिखाएगा।
प्रश्न : आप अपनी इस पूरी यात्रा को एक वाक्य में कैसे परिभाषित करेंगे?
उत्तर : मैं यही कहूंगा, हम कलाकार नहीं, केवल माध्यम हैं। जो कुछ भी होता है, वह ईश्वर की प्रेरणा से होता है। अगर हमारे सुरों से किसी के मन को शांति मिलती है, तो वही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
पिता-पुत्र की जुगलबंदी : संवाद या साधना?
जब पंडित सलिल भट्ट से पूछा गया कि पिता के साथ मंच साझा करने का अनुभव कैसा होता है, तो वे भावुक हो उठते हैं। “यह जुगलबंदी नहीं, यह संवाद है। एक ऐसा संवाद जिसमें शब्द नहीं होते, केवल स्वर होते हैं। पिता जी का हर सुर मेरे लिए मार्गदर्शन होता है और मैं उसी पथ पर चलने का प्रयास करता हूं।” वे आगे कहते हैं, “मोहन वीणा और सात्विक वीणा का संगम केवल वाद्ययंत्रों का मेल नहीं, बल्कि परंपरा और नवाचार का संगम है।” तबले पर बनारस घराने के पंडित राम कुमार मिश्रा और असम के कौशिक कंवर की संगत ने संगीत को और भी समृद्ध किया। जब अंतिम चरण में श्रीराम भजन की धुन गूंजी, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। ऐसा लगा मानो संगीत अपने चरम पर पहुंचकर ईश्वर में विलीन हो गया हो। बेशक, पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित सलिल भट्ट की जुगलबंदी ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि वह एक ऐसी शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है, उसे शांति का मार्ग दिखा सकती है।




