जीवनशैली

पहली सैलरी से ही शुरू कर दें रिटायरमेंट की तैयारी, वरना 40-50 की उम्र में बिगड़ सकता है पूरा वित्तीय गणित

नई दिल्ली: भारत में बड़ी संख्या में माता-पिता रिटायरमेंट के बाद अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए बच्चों पर निर्भर रहते हैं। हालांकि बदलते पारिवारिक ढांचे, बढ़ती महंगाई और लगातार बढ़ते खर्चों के बीच यह व्यवस्था अब पहले जितनी आसान नहीं रह गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और युवा रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाकर बस रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि नौकरी शुरू करते ही, पहली सैलरी से ही रिटायरमेंट के लिए बचत और निवेश की योजना बना लेना चाहिए।

बदलते पारिवारिक ढांचे ने बढ़ाई चुनौती

‘इंडियाज फ्यूचर्स इन्वेस्टर्स’ की संस्थापक महक तोमर के मुताबिक, पहले देश में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। परिवार बड़े होते थे, पेंशन जैसी सुविधाएं उपलब्ध थीं और घर के संसाधनों का इस्तेमाल सामूहिक रूप से होता था। अब स्थिति काफी बदल चुकी है।

न्यूक्लियर परिवार बढ़ रहे हैं और युवा नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहरों में रहने लगे हैं। इसके साथ होम लोन, दूसरी ईएमआई, बच्चों की पढ़ाई और परवरिश जैसे खर्च भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में एक कमाने वाले व्यक्ति के लिए एक साथ दो परिवारों की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी उठाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

20 से 30 की उम्र में निवेश का मिलता है बड़ा फायदा

डिजिट लाइफ इंश्योरेंस के वाइस प्रेसिडेंट (प्रोडक्ट्स) अशोक मनवानी कहते हैं कि आदर्श स्थिति में कमाई शुरू होते ही रिटायरमेंट की तैयारी भी शुरू कर देनी चाहिए। अगर 20 से 30 साल की उम्र में निवेश शुरू किया जाता है तो चक्रवृद्धि ब्याज का फायदा लंबे समय तक मिलता है। इससे छोटी रकम का नियमित निवेश भी समय के साथ बड़ा फंड तैयार कर सकता है।

हालांकि वास्तविक जीवन में कई लोगों के लिए शुरुआती दौर में ऐसा कर पाना आसान नहीं होता। होम लोन, बच्चों की शिक्षा, पारिवारिक जिम्मेदारियां और दूसरी जरूरतों के चलते रिटायरमेंट की बचत लगातार टलती रहती है। इसका असर तब दिखाई देता है जब व्यक्ति 40 या 50 की उम्र तक पहुंच जाता है और उसके पास पर्याप्त रिटायरमेंट फंड नहीं होता।

देर हो गई है तो पहले आर्थिक स्थिति का आकलन करें

विशेषज्ञों के मुताबिक, 40 या 50 की उम्र तक पर्याप्त रिटायरमेंट फंड नहीं बना है तो घबराने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले अपनी मौजूदा आर्थिक स्थिति का वास्तविक आकलन करना चाहिए। इसके बाद गैर-जरूरी खर्चों में कटौती और क्रेडिट कार्ड या अधिक ब्याज वाले नए कर्ज से दूरी जरूरी है।

40 की उम्र पार कर चुके लोगों को बचत की रफ्तार बढ़ाने के साथ पुराने और महंगे कर्ज जल्द खत्म करने पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा ऐसे निवेश विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है, जिनसे सुरक्षित और नियमित आय हासिल हो सके।

बाजार में उपलब्ध एन्युटी और पेंशन योजनाएं ऐसे लोगों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट की तैयारी देर से शुरू की है। कुछ एन्युटी योजनाएं पूरी जिंदगी गारंटीड आय देती हैं, जबकि कुछ विकल्प गारंटीड आय के साथ निफ्टी-50 जैसे सूचकांकों से जुड़े होते हैं और इनमें अधिक रिटर्न की संभावना रहती है। जरूरत के मुताबिक किस्त और भुगतान का विकल्प चुनकर देर से शुरू हुई रिटायरमेंट योजना को भी बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है।

परिवार में एक ही कमाने वाला है तो सुरक्षा और जरूरी

महक तोमर के मुताबिक, जिस परिवार में सिर्फ एक सदस्य कमाता है, वहां आर्थिक सुरक्षा की जरूरत और ज्यादा बढ़ जाती है। अगर कमाने वाले व्यक्ति के साथ कोई अनहोनी होती है या वह गंभीर बीमारी अथवा दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो परिवार के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।

ऐसे परिवारों के लिए पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस सबसे जरूरी कदमों में से एक है। बीमा कवर इतना होना चाहिए कि बकाया होम लोन जैसे कर्ज चुकाए जा सकें, महंगाई को ध्यान में रखते हुए रोजमर्रा के खर्च पूरे किए जा सकें और बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च भी संभाला जा सके।

MWPA के तहत टर्म इंश्योरेंस क्यों अहम

टर्म इंश्योरेंस को मैरिड विमेन प्रॉपर्टी एक्ट यानी MWPA के तहत लेना भी उपयोगी माना जाता है। इसके तहत लिया गया बीमा दावा पत्नी और बच्चों के लिए सुरक्षित रहता है। इसे किसी देनदार, बैंक या कारोबारी विवाद में फंसे व्यक्ति की ओर से जब्त नहीं कराया जा सकता।

सिर्फ टर्म प्लान ही पर्याप्त नहीं है। नौकरी देने वाली कंपनी से मिलने वाले स्वास्थ्य बीमा पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय व्यक्तिगत हेल्थ इंश्योरेंस लेना भी जरूरी है। इसके साथ गंभीर बीमारी और विकलांगता से जुड़े कवर को भी अपनी जरूरत के अनुसार शामिल करना चाहिए।

पति-पत्नी दोनों को बैंक खातों और संपत्तियों में एक-दूसरे को नॉमिनी बनाना चाहिए। साथ ही वसीयत तैयार रखना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में संपत्ति के हस्तांतरण में कानूनी अड़चनें कम हों।

घर के बैंक खातों, निवेश और दूसरी वित्तीय संपत्तियों की जानकारी दोनों जीवनसाथियों के पास होनी चाहिए। इससे किसी आपात स्थिति में परिवार के एक सदस्य को आर्थिक मामलों की जानकारी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

आज का 50 हजार का खर्च 20 साल बाद कितना हो सकता है?

अशोक मनवानी के मुताबिक, रिटायरमेंट फंड तय करते समय सिर्फ मौजूदा खर्चों को आधार बनाना बड़ी गलती हो सकती है। रिटायरमेंट की जरूरत का अनुमान भविष्य में होने वाले खर्चों और महंगाई को ध्यान में रखकर लगाना चाहिए। भारत में रोजमर्रा की चीजों, खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतें करीब 7 से 8 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही हैं।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर आज किसी परिवार का मासिक खर्च 50,000 रुपये है तो 20 साल बाद इसी तरह की जीवनशैली बनाए रखने के लिए करीब 2 लाख रुपये महीने की जरूरत पड़ सकती है।

इसके साथ लोगों की औसत उम्र भी बेहतर इलाज और स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण बढ़ रही है और यह 75 से 80 साल या उससे अधिक हो सकती है। इसका मतलब है कि नौकरी या कामकाज खत्म होने के बाद 20 से 30 साल तक खर्च चलाने के लिए पर्याप्त धन की जरूरत पड़ सकती है।

मेडिकल महंगाई रिटायरमेंट फंड के लिए बड़ा खतरा

मनवानी के अनुसार, चिकित्सा खर्च में महंगाई की दर करीब 12 से 14 प्रतिशत तक है। ऐसे में गंभीर बीमारी का इलाज कई वर्षों की जमा पूंजी को तेजी से खत्म कर सकता है। इसलिए रिटायरमेंट की योजना बनाते समय स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को अलग से ध्यान में रखना जरूरी है।

महक तोमर के मुताबिक, रिटायरमेंट के लिए कितने पैसे चाहिए, यह तय करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि व्यक्ति काम छोड़ने के बाद किस तरह की जीवनशैली चाहता है। सुरक्षित रिटायरमेंट कॉर्पस के लिए एक सामान्य नियम यह है कि महंगाई के हिसाब से बढ़े हुए सालाना खर्च का 25 गुना पैसा रिटायरमेंट के लिए उपलब्ध होना चाहिए।

इसके अलावा मेडिकल इमरजेंसी के लिए अलग फंड रखना चाहिए और उसे रिटायरमेंट की बचत से अलग रखना बेहतर है। रिटायरमेंट से पहले चुकाए जाने वाले सभी कर्ज और बकाया रकम को भी अंतिम लक्ष्य तय करते समय शामिल करना चाहिए।

रिटायरमेंट को आखिरी समय तक टालना पड़ सकता है भारी

दोनों विशेषज्ञों के मुताबिक, बुढ़ापे में बच्चों पर आर्थिक निर्भरता अचानक पैदा नहीं होती। अक्सर इसके पीछे वर्षों तक रिटायरमेंट की तैयारी को टालते रहना होता है। घर खरीदने, बच्चों की शिक्षा और कारोबार जैसी प्राथमिकताओं के बीच लोग अपने भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लगातार पीछे करते जाते हैं।

इसलिए सिर्फ संपत्ति बनाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि तैयार की गई संपत्ति से रिटायरमेंट के बाद लंबे समय तक नियमित आय कैसे हासिल होगी। समय रहते की गई बचत, निवेश और आर्थिक सुरक्षा की योजना व्यक्ति को बुढ़ापे में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने में मदद कर सकती है।

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