रक्षा बंधन पर बहनों ने निभाया रक्षा का वचन, भाइयों को किडनी देकर दिया नया जीवन; भाई ने भी भांजी के लिए दान किया लिवर

ग्रेटर नोएडा/नई दिल्ली: रक्षा बंधन पर आमतौर पर भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं, लेकिन इस बार दो बहनों ने अपने भाइयों को नया जीवन देकर रिश्ते की अनूठी मिसाल पेश की है। किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने भाइयों की जिंदगी बचाने के लिए दोनों बहनों ने अपनी किडनी दान कर दी। वहीं, दिल्ली में एक भाई ने अपनी पांच महीने की भांजी की जान बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान किया। इन परिवारों के लिए इस बार का रक्षा बंधन जीवन की नई उम्मीद लेकर आया है।
बहन ने भाई के लिए दी अपनी किडनी
उत्तराखंड के किच्छा निवासी 40 वर्षीय जितेंद्र गंगवार पिछले दो वर्षों से दीर्घकालिक किडनी रोग से जूझ रहे थे। भाई की गंभीर स्थिति को देखते हुए उनकी 45 वर्षीय अविवाहित बहन बीना गंगवार ने अपनी किडनी दान करने का फैसला किया। जुलाई के अंत में ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में जितेंद्र का सफल किडनी प्रत्यारोपण किया गया।
जितेंद्र ने इस मौके को अपने जीवन का सबसे खास रक्षा बंधन बताया। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी बहन मिलने पर गर्व है और भगवान हर भाई को ऐसी बहन दें।
दूसरे भाई के लिए भी बहन बनी जीवनदाता
सुप्रियो भी लंबे समय से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी हालत में सुधार के लिए किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता बचा था। ऐसे में उनकी बहन सोनाली ने अपनी किडनी दान करने का फैसला किया। दोनों भाई-बहन अब रक्षाबंधन के मौके पर जीवन की नई उम्मीद के साथ यह त्योहार मनाएंगे।
मामा ने पांच महीने की भांजी के लिए दान किया लिवर
दिल्ली में भी रक्षा बंधन से पहले भाई-बहन के रिश्ते की ऐसी मिसाल सामने आई, जिसने सभी का ध्यान खींचा। 24 वर्षीय युवक सिवेंद्र कुमार पांडे ने अपनी पांच महीने की भांजी सांविका शुक्ला की जान बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर दिया। जटिल बाल लिवर प्रत्यारोपण सफल रहा और बच्ची को 20 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिल गई।
गंभीर पीलिया के बाद बिगड़ने लगी थी बच्ची की हालत
सांविका को जन्म के कुछ सप्ताह बाद गंभीर पीलिया हुआ था। इसके बाद उसकी पित्त नलिकाओं में रुकावट पैदा हो गई, जिससे लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा और उसकी हालत लगातार खराब होती गई। चिकित्सकों ने बताया कि उसकी जान बचाने के लिए लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प था।
बच्ची के माता-पिता और दादी की चिकित्सकीय जांच के बाद उन्हें लिवर दान के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। इसके बाद बच्ची के मामा सिवेंद्र कुमार पांडे अपनी बहन की बेटी के लिए आगे आए और लिवर का एक हिस्सा दान करने का निर्णय लिया। शालीमार बाग स्थित फोर्टिस अस्पताल में डॉ. आशीष जॉर्ज के नेतृत्व में प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किया गया।
दिल्ली में भाइयों ने बहन को किडनी देकर बचाई जान
दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में भी भाई-बहन के रिश्ते की ऐसी ही मिसाल सामने आई। यहां किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रही दो बहनों के लिए उनके छोटे भाई किडनी दानदाता बने। दोनों मामलों में जीवित दाता से किडनी प्रत्यारोपण किया गया।
मूलचंद किडनी प्रत्यारोपण कार्यक्रम के निदेशक और मूत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. मनोज अग्रवाल के अनुसार, पीयूष चौधरी ने अपनी 48 वर्षीय बड़ी बहन सारिका चौधरी को किडनी दान की। वहीं, 31 वर्षीय मोहम्मद आलम ने अपनी 40 वर्षीय बहन शीमू चौधरी को किडनी देकर उन्हें नया जीवन दिया।
दोनों मामलों में छोटे भाइयों ने अपनी बहनों की जिंदगी बचाने के लिए आगे बढ़कर अंगदान का फैसला किया। चिकित्सकों के अनुसार, दोनों किडनी प्रत्यारोपण आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुविधाओं की मदद से किए गए।



