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रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए ट्रंप का टैरिफ दांव, भारत पर भी पड़ सकता है असर

न्यूयॉर्क: रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने के लिए अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में कहा कि जरूरत पड़ने पर वह पिछले सप्ताह कानून बने नए प्रावधानों के तहत मिली टैरिफ लगाने की शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। ट्रंप ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध में हर महीने बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही है और अब इसे रोकने का समय आ गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका रूस और यूक्रेन दोनों के नेतृत्व के संपर्क में है और युद्ध उम्मीद से ज्यादा तेजी से खत्म हो सकता है।

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की समेत दोनों देशों के अधिकारी न्यूयॉर्क में मौजूद हैं। अमेरिका ने 18 सितंबर को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को कानून बनाया था। यह कानून रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने और रूस से कारोबार जारी रखने वाले देशों पर आर्थिक दबाव डालने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को नई शक्तियां देता है।

क्या है नया अमेरिकी कानून?

कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति रखते हैं। इसके अलावा रूस के तेल पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष पांच देशों या संस्थाओं को भी निशाना बनाया जा सकता है। कानून में रूस के अधिकारियों, बैंकों और उसकी ‘शैडो फ्लीट’ से जुड़े लोगों या संस्थाओं पर प्रतिबंधों का भी प्रावधान है।

प्राकृतिक गैस की खरीद को लेकर कानून में कुछ सीमित छूट भी है। यदि किसी देश की रूस से गैस खरीद रूस के कुल गैस निर्यात के 15 प्रतिशत से कम है और वह अपनी निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है, तो संबंधित टैरिफ से छूट मिल सकती है। इसके अलावा रूसी मूल के सामान पर अलग से 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति भी दी गई है। यूरेनियम जैसे कुछ उत्पादों और मेडिकल आइसोटोप के लिए अपवाद रखे गए हैं।

भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?

कानून में भारत का नाम अलग से किसी तय लक्ष्य देश के रूप में नहीं लिखा गया है। हालांकि, भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। इसलिए यदि अमेरिकी प्रशासन कानून में मिली शक्तियों का इस्तेमाल करता है, तो भारत संभावित रूप से प्रभावित हो सकता है। फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप लागू नहीं हुआ है; इसके लिए अमेरिकी प्रशासन को आगे निर्णय लेना होगा।

भारत ने इस कानून को लेकर कहा है कि उसकी प्राथमिकता 140 करोड़ से अधिक आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। नई दिल्ली ने संकेत दिया है कि वह बाजार की परिस्थितियों और अपनी ऊर्जा जरूरतों के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा। ऐसे में अमेरिकी फैसले का असर भारत-अमेरिका व्यापार के साथ ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है।

रूस से भारत की तेल खरीद में पहले ही आई कमी

अमेरिकी दबाव के बीच भारत के रूसी कच्चे तेल आयात में हाल के महीनों में कमी दर्ज की गई है। रॉयटर्स के अनुसार, अगस्त 2026 में रूस से भारत का तेल आयात करीब 21 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो जुलाई के मुकाबले 16.5 प्रतिशत कम था। सितंबर के शुरुआती आंकड़ों में यह करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। भारतीय रिफाइनरियां मध्य-पूर्व समेत अन्य स्रोतों से तेल की खरीद बढ़ाने के विकल्प भी देख रही हैं।

क्या टैरिफ से रुक सकता है रूस-यूक्रेन युद्ध?

अमेरिकी कानून के समर्थकों का तर्क है कि रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाकर उसकी युद्ध से जुड़ी आर्थिक क्षमता को प्रभावित किया जा सकता है और इससे मॉस्को पर बातचीत के लिए दबाव बढ़ सकता है। कानून के समर्थकों ने इसे अमेरिकी राष्ट्रपति की बातचीत की स्थिति मजबूत करने वाले कदम के रूप में भी पेश किया है।

हालांकि, इस कदम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप प्रशासन किन देशों को निशाना बनाता है, टैरिफ की दर कितनी रखी जाती है और संबंधित देश इसके जवाब में क्या कदम उठाते हैं। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इसका असर केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

UNGA में ट्रंप ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने के लिए बातचीत के साथ आर्थिक दबाव का भी संकेत दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका रूस और यूक्रेन के नेतृत्व के साथ संपर्क में है और युद्ध को जल्द खत्म करने की कोशिश जारी है। ऐसे में नए कानून के तहत मिली टैरिफ शक्ति रूस पर दबाव बढ़ाने के अमेरिकी प्रयासों का एक संभावित साधन बन सकती है।

फिलहाल निगाह इस बात पर है कि ट्रंप प्रशासन इस कानून के तहत टैरिफ लगाने का फैसला कब करता है और किन देशों को निशाना बनाया जाता है। भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग स्रोतों से कच्चे तेल की आपूर्ति बनाए रखनी है, जबकि अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध भी इस घटनाक्रम से प्रभावित हो सकते हैं।

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