CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की विपक्ष की कोशिश में कितना दम? समझिए महाभियोग का पूरा नंबर गेम

CEC को हटाना आसान नहीं, संविधान में बेहद सख्त प्रक्रिया
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष एक बार फिर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। विपक्षी दल बुधवार को नई दिल्ली में बैठक कर इस मुद्दे पर आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे। यह पूरा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों से जुड़ा है।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है? इसके लिए कितने सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है और मौजूदा संख्याबल के आधार पर क्या विपक्ष ज्ञानेश कुमार को पद से हटा सकता है?
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान संवैधानिक सुरक्षा हासिल है। इसका मतलब है कि CEC को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत पद से नहीं हटाया जा सकता। इसके लिए एक सख्त और कई चरणों वाली संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
पहला चरण: सांसदों के समर्थन से नोटिस
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा के कम से कम 50 सांसद संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को नोटिस दे सकते हैं।
दूसरा चरण: आरोपों की जांच
अगर पीठासीन अधिकारी नोटिस स्वीकार करते हैं तो तीन न्यायविदों की एक समिति गठित की जाती है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज करते हैं। समिति CEC पर लगाए गए आरोपों की जांच करती है।
तीसरा चरण: दोनों सदनों में बहुमत जरूरी
अगर जांच समिति CEC को दोषी पाती है तो इसके बाद सदन में प्रस्ताव पर मतदान होता है। प्रस्ताव को पारित कराने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और सदन में मौजूद एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।
विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्यों है?
विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर काम किया और SIR के जरिए लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया। विपक्ष के ताजा हमले के पीछे इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट भी बताई जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों को लेकर 10 महीने में कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं।
मार्च में भी लाया गया था महाभियोग प्रस्ताव
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की यह पहली कोशिश नहीं है। मार्च 2026 में विपक्ष ने लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के समर्थन से नोटिस दिए थे। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने जांच के शुरुआती चरण में दोनों नोटिस खारिज कर दिए थे।
इसके बाद 24 अप्रैल को राज्यसभा में एक और नोटिस दिया गया। इस नोटिस पर विपक्ष के 73 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे और इसमें नौ नए आरोप शामिल किए गए थे। यह नोटिस अभी वैध है।
अब नया महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी क्यों?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश के मुताबिक, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से कुछ ऐसी अतिरिक्त जानकारी सामने आई है, जो पहले दिए गए महाभियोग प्रस्तावों में शामिल नहीं थी।
इसके अलावा, दूसरे नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले 73 सांसदों में से कम से कम सात या तो बीजेपी में जा चुके हैं या सदन से रिटायर हो चुके हैं। ऐसे में राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन उस नोटिस को स्वतः खारिज कर देंगे। इसी वजह से विपक्ष लोकसभा और राज्यसभा दोनों में नया महाभियोग नोटिस लाने की तैयारी कर रहा है।
क्या मौजूदा संख्याबल से CEC को हटाया जा सकता है?
मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, विपक्ष के पास ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए जरूरी संख्याबल नहीं है। महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी मिलना जरूरी है।
लोकसभा में कांग्रेस के पास 98 सांसद हैं। सभी विपक्षी दलों का समर्थन मिलने के बावजूद उसके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है। ऐसे प्रस्ताव को पारित कराने के लिए बीजेपी का समर्थन भी जरूरी होगा। बीजेपी के पास लोकसभा में 240 सांसद हैं।
बीजेपी पहले ही ज्ञानेश कुमार के समर्थन में सामने आ चुकी है और कांग्रेस पर देश को गुमराह करने का आरोप लगा चुकी है। ऐसे में सत्तारूढ़ दल के इस तरह के प्रस्ताव का समर्थन करने की संभावना कम बताई गई है। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले पैनल ने की थी।
फिर विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव क्यों ला रहा है?
विपक्ष की मौजूदा कोशिश संख्याबल के दम पर प्रस्ताव पारित कराने से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने की है। विपक्ष इस प्रस्ताव के जरिए यह दिखाना चाहता है कि कई राजनीतिक दलों को मुख्य चुनाव आयुक्त पर भरोसा नहीं है।
इसके साथ ही विपक्ष CEC और बीजेपी के बीच कथित मिलीभगत को भी मुद्दा बनाना चाहता है। यानी फिलहाल पूरा जोर महाभियोग प्रस्ताव के जरिए अपनी आपत्तियों और राजनीतिक विरोध को दर्ज कराने पर है।



