सर्बिया में छात्र आंदोलन ने पलटी सत्ता की बाजी, वुसिक ने मानी हार; रूस के करीबी नेता को बड़ा झटका

नई दिल्ली: यूरोप के बाल्कन क्षेत्र के देश सर्बिया में छात्र आंदोलन ने राजनीति की तस्वीर बदलने के संकेत दिए हैं। रविवार को हुए संसदीय चुनाव के बाद लंबे समय से सत्ता में प्रभाव रखने वाले नेता अलेक्जेंडर वुसिक ने हार स्वीकार कर ली। चुनाव में विश्वविद्यालय के छात्रों के समर्थन वाली स्टूडेंट्स लिस्ट ने वुसिक के राजनीतिक गठबंधन को कड़ी चुनौती दी। वुसिक के अपने अनुमान के मुताबिक, छात्र समर्थित समूह को 250 सदस्यीय संसद में 135 से 140 सीटें मिल सकती हैं, जबकि उनकी पार्टी को करीब 105 सीटें मिलने की संभावना है। इन अनुमानों से छात्र आंदोलन से जुड़े समूह के बहुमत हासिल करने की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि, सीटों की वास्तविक स्थिति अंतिम आधिकारिक नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
करीब 14 साल से सर्बिया की राजनीति में प्रभावशाली रहे वुसिक को झटका
अलेक्जेंडर वुसिक सर्बिया की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (एसएनएस) लंबे समय तक देश की सत्ता में प्रभावशाली रही। वुसिक वर्ष 2014 से सरकार के शीर्ष पदों पर रहे और बाद में राष्ट्रपति बने। उन्हें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी संबंधों वाले नेता के रूप में देखा जाता है। ऐसे में छात्र आंदोलन से जुड़े समूह का चुनाव में आगे निकलना सर्बिया की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम माना जा रहा है।
चुनाव में एक ओर वुसिक की दक्षिणपंथी पार्टी थी, तो दूसरी ओर विश्वविद्यालय के छात्रों के नेतृत्व वाला आंदोलन। छात्रों ने सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए थे। देश के अलग-अलग हिस्सों में समर्थन मिलने के बाद यह आंदोलन सरकार के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा।
रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे के बाद शुरू हुआ आंदोलन
सर्बिया में छात्र आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद शहर के रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे के बाद हुई थी। स्टेशन की छतरी जैसी संरचना गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद सरकारी जवाबदेही और कथित भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठने लगे। छात्रों ने हादसे की जिम्मेदारी तय करने और सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की।
धीरे-धीरे विरोध प्रदर्शन व्यापक जन आंदोलन में बदल गए। विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ समाज के अन्य वर्गों ने भी सरकारी व्यवस्था में सुधार की आवाज उठाई। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण से लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। सरकार और उसके समर्थकों ने आंदोलन पर सवाल उठाए, लेकिन विरोध लगातार देश की राजनीति के केंद्र में बना रहा।
हार के लिए वुसिक ने विदेशी हस्तक्षेप को ठहराया जिम्मेदार
चुनावी कार्यक्रम में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए वुसिक ने स्वीकार किया कि स्टूडेंट्स लिस्ट को जीत मिली है। हालांकि, उन्होंने अपनी पार्टी के प्रदर्शन के लिए सर्बिया के स्वतंत्र मीडिया, कुछ यूरोपीय देशों के कथित हस्तक्षेप और अमेरिकी डीप स्टेट को जिम्मेदार ठहराया। ये आरोप वुसिक की ओर से लगाए गए हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
चुनाव से पहले सर्बिया में राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ था। छात्र आंदोलन के समर्थक सरकार से जवाबदेही तय करने और संस्थागत सुधारों की मांग कर रहे थे, जबकि वुसिक ने आंदोलन को विदेशी साजिश से जोड़ने की कोशिश की थी। चुनाव के शुरुआती अनुमानों ने इस राजनीतिक संघर्ष को एक नया मोड़ दे दिया है।
नई सरकार के सामने होंगी कई बड़ी चुनौतियां
यदि अंतिम नतीजों में स्टूडेंट्स लिस्ट को बहुमत मिलता है, तो उसके सामने सरकार बनाने और प्रशासन चलाने की बड़ी जिम्मेदारी होगी। भ्रष्टाचार की जांच, सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और न्यायिक व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे नई राजनीतिक व्यवस्था की परीक्षा लेंगे।
इसके अलावा रूस और चीन के साथ सर्बिया के संबंध तथा यूरोपीय संघ की सदस्यता से जुड़े सवाल भी नई सरकार के लिए अहम होंगे। छात्र आंदोलन की चुनावी सफलता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सड़कों पर उठी मांगें अब सरकारी नीतियों में बदल पाएंगी। आने वाले दिनों में आधिकारिक चुनावी नतीजे और सरकार गठन की प्रक्रिया सर्बिया के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।



