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शरद पूर्णिमा 2026 पर 30 साल बाद दुर्लभ संयोग की चर्चा! 25 अक्टूबर को बनेंगे शुभ योग, जानें मां लक्ष्मी की पूजा और खीर रखने की परंपरा

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा, चंद्रमा के दर्शन और चांदनी में खीर रखने की परंपरा है। इस बार शरद पूर्णिमा पर हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग बनने की चर्चा है। वहीं, करीब 30 साल बाद दुर्लभ संयोग बनने के दावे भी सामने आ रहे हैं। हालांकि, ऐसे ज्योतिषीय संयोगों का महत्व धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है।

शरद पूर्णिमा पर शुभ योगों को लेकर क्या है मान्यता?

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, हर्षण योग को प्रसन्नता और उत्साह से जोड़कर देखा जाता है, जबकि सर्वार्थ सिद्धि योग को पूजा-पाठ, मंत्र जाप, दान-पुण्य और शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए अनुकूल माना जाता है। इन योगों के कारण इस बार पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्सुकता है। हालांकि, 30 साल बाद बनने वाले दुर्लभ संयोग के दावे की पुष्टि के लिए पंचांग संबंधी विस्तृत गणना देखना जरूरी है।

क्यों कहा जाता है कोजागरी पूर्णिमा?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। इसी मान्यता से इस पर्व का नाम कोजागरी पूर्णिमा पड़ा। ‘कोजागरी’ का अर्थ है—कौन जाग रहा है। इस अवसर पर भक्त मां लक्ष्मी की पूजा करके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। कई जगह रात में जागरण, भजन-कीर्तन और मंत्र जाप भी किया जाता है।

चांदनी में खीर रखने की क्या है परंपरा?

शरद पूर्णिमा पर दूध और चावल से खीर बनाकर रात में खुले स्थान पर चांदनी के नीचे रखने की परंपरा है। धार्मिक विश्वास है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत के समान गुण होते हैं। इसी मान्यता के आधार पर अगले दिन खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। हालांकि, चांदनी में रखने से खीर में विशेष औषधीय गुण या अमृत जैसे प्रभाव पैदा होने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। खीर को खुले में रखते समय स्वच्छता और भोजन की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

शरद पूर्णिमा पर कैसे करें मां लक्ष्मी की पूजा?

श्रद्धालु अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा कर सकते हैं। सामान्य तौर पर सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं। इसके बाद मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। दीप प्रज्वलित कर मंत्र जाप और प्रार्थना की जाती है। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य देने और खीर का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की जाती है।

दान-पुण्य और रात्रि जागरण का भी महत्व

शरद पूर्णिमा पर दान-पुण्य को शुभ मानने की धार्मिक परंपरा है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान कर सकते हैं। कई परिवार इस अवसर पर रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि और रीति-रिवाजों में अंतर हो सकता है।

इस तरह शरद पूर्णिमा चंद्रमा की पूर्णता, मां लक्ष्मी की आराधना और पारिवारिक मंगलकामनाओं से जुड़ा पर्व है। इस वर्ष 25 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर शुभ योगों की चर्चा के बीच श्रद्धालु अपनी मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना करेंगे।

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