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तुम्ही से दिल का हाल छुपाएँ, तुम्ही को हाल बताएं

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ: घूस यानी रिश्वत से हमारी बहुत पुरानी जान पहचान है। हमें इससे नफरत तो है लेकिन प्यार कहीं ज्यादा है। हमसे सच-सच बताते नहीं बनता, बताने को मन भी नहीं करता। दरअसल घूस यानी रिश्वत आज व्याख्यानों की विषय वस्तु है, घृणा योग्य सच्चाई है, छिपाकर रखने वाली हकीकत है, प्यार के काबिल जरूरत है, किसी को भी शोभायमान बनाने की ताकत है, किसी को भी कुर्सी पर बिठाने और उससे उतारने की क्षमताधारक है, खुशबूदार सैनिटाइजर है, सत्ता पक्ष का अंगरक्षक है तो विपक्ष का अमोघ अस्त्र भी है। हंगामा करने के लिए उत्प्रेरक है तो नफरत करने लायक प्यारी सी चीज भी है। वैसे भी कहा जाता है कि रसगुल्ले का स्वाद तो उसके खाने में ही छिपा होता है। डायबिटीज वाले क्या जानें उसका मजा।

भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली यह घूस ईमानदारों की बहुत कड़ी परीक्षा लेती है और वे बेचारे जो इसे अपना कवच नहीं बना पाते, कष्ट भोगने और अपनी कुंडली को कोसने को मजबूर होते हैं। इसीलिए आपने देखा होगा कि जब शादी ब्याह की बात होने को होती है तो लड़के की तनख्वाह के साथ ही इसके बारे में भी पूछा जाता है कि उपर की आमदनी कितनी है।

इसकी खास बात यह है कि दिखाने को हर कोई इसकी बुराई करता है, इसके खिलाफ किताबें लिखी जाती हैं, व्याख्यान दिए जाते हैं, बड़े बड़े कमीशन बिठाए जाते हैं लेकिन फिर भी लोग कहते हैं कि न जाने क्यों इसके लिए हाथ की हथेली, जेब का पर्स, दफ्तर की मेज की दराज और छोटे बड़े ब्रीफकेस निरंतर रूप से खुरखुराते रहते हैं। भगवान जानें!

अब ऐसे में जबकि 20-20 मैचों वाला आईपीएल नहीं हो पा रहा है, स्कर्ट पहनने वाली चियर लीडर्स नहीं दिख रही हैं, लोगों का मनोरंजन नहीं हो पा रहा है तो भारत के धुआंधार कप्तान विराट कोहली ने मैच के बाहर ही एक छक्का जड़ दिया है। वे अपने छक्कों के लिए तो मशहूर हैं ही, शानदार बैटिंग उनकी ताकत है, भारतीय क्रिकेट की, उसके स्वाभिमान की शक्ति है। वे आज दुनिया की किसी भी एकादश में चुने जाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन इस बार उन्होंने एक धमाका खेल के मैदान के बाहर कर दिखाया है।

उन्होंने रहस्योद्घाटन किया है कि एक बार दिल्ली की जूनियर टीम में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाया था कि उनके पापा ने रिश्वत देने से इन्कार कर दिया था। ये तो कोहली का मुकद्दर अच्छा था कि बिना घूस के लिए इतने उच्च पायदान पर पहुॅच गए वरना न जाने कितने उदीयमान बच्चे/ जिनमें से यूपी के कुछ बच्चों का नाम मैं जानता हूॅ/ आगे नहीं बढ़ पाए। ऐसे बच्चों के भूतकाल को उभारकर उनका वर्तमान खराब करना ठीक नहीं होगा। मुकद्दर सही होता तो वे भी कोहली के कंधे से कंधा रगड़ रहे होते। तो बात इतनी भर है कि इस मुई घूस ने खेल के मैदान को भी अपने शिकंजे से मुक्त नहीं छोडा है।

आईएएस अधिकारी हरिश्चंद्र गुप्ता

एक बार एक समारोह में मैंने पुराने गुरुओं की कही बात दोहराई कि घूस या रिश्वत या भ्रष्टाचार शीर्ष से शुरू होता है और फिर नीचे की ओर जाता है। वहीं मौके पर मौजूद एक वरिष्ठ अधिकारी ने जो अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं, मुझे रोक कर कहा था कि भ्रष्टाचार पहले कभी शीर्ष से नीचे जाता रहा होगा, अब तो यह कहीं से भी शुरू हो जाता है और कहीं भी जा सकता है। ठीक बात है। यह तो वो मर्ज है जो इलाज करने से बढ़ता है। यह वो अमरबेल है जिसके उगने के लिए जड़ और जमीन की जरूरत नहीं होती।

उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन एक नहीं दो नहीं, छह विभाग भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने का सरकारी जिम्मा ओढ़कर चल रहे हैं। लेकिन हकीकत यह कि अगर आप में घूस देने की क्षमता है तो घूस के आरोप से आप बच सकते हैं। वरना! वरना उत्तर प्रदेश काडर के एक निहायत ईमानदार आईएएस अधिकारी हरिश्चंद्र गुप्ता का उदाहरण सबसे सामने है। अगर आप घूस का एकतरफा नहीं, दुतरफा व्यापार करते हैं तो आप 100 में से 95 मौकों पर बच सकते हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक साल में देश के विभिन्न राज्यों के 60 प्रतिशत लोगों ने विभिन्न सरकारी विभागों को घूस दी है।

काले बादलों के बीच आशा की एक किरण भी है। उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त संगठन की रिपोर्ट पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुत सख्त कार्रवाई करते हैं। तीन जुलाई 2019 की एक खबर बताती है कि योगी जी ने 600 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार में कार्रवाई की है। लेकिन यह हकीकत भी अपनी जगह है कि मध्यप्रदेश के लोकायुक्त की तरह उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त के पास जाॅच पड़ताल करने, भ्रष्टों के गले पकड़ने के लिए अपनी पुलिस नहीं है। उसके अंडर में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री नहीं हैं, विश्वविद्यालय नहीं हैं, सर्च और सीजर के अधिकार नहीं हैं।

केन्द्र की सरकार की रिपोर्ट भी देख लें। उसकी एक सरकारी वेबसाइट बताती है कि 58 मामलों में तीन वर्तमान सांसदों, कई विधायकों और कई अधिकारियों पर कार्रवाई करने के लिए केन्द्रीय जाॅच ब्यूरो यानी सीबीआई को सरकारी पूर्वानुमति की फरवरी महीने तक प्रतीक्षा थी। यह प्रतीक्षा इस साल फरवरी में चार महीने से की जा रही थी।

फरवरी के बाद क्या हुआ, वेबसाइट ने अभी नहीं बताया है। सुप्रीम कोर्ट तक इस बारे में कई बार हैरानी जता चुका है कि भ्रष्टाचार पर कार्यवाही के लिए सरकारी पूर्वानुमति की आखिर जरूरत क्यों होती है। पर वास्तविकता फिर भी यही है कि बड़े अफसरान के मामले में भ्रष्टाचार पर तब तक कार्रवाई नहीं हो पाती जब तक कि सरकार से पूर्वानुमति न मिल जाय। उत्तर प्रदेश के कई अधिकारी सालों साल इसी सरकारी कवच में सुरक्षित रहकर मौज करते रहे हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है।

अंत में, और जब मामला रिश्वत यानी घूस यानी भ्रष्टाचार का है तो कोई क्या करे, क्या कहे? आखिर किसी से कहते भी नहीं बनता और चुप रहते भी नहीं बनता, तो फिर? क्या कहें – यही न कि हे भ्रष्टाचार, हे घूस, हे रिश्वत-

मिलो न तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आँख चुराएं, हमें क्या हो गया है
तुम्ही से दिल का हाल छुपाएँ, तुम्ही को हाल बताएं, हमें क्या हो गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)

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