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 ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ पर ‘सुप्रीम’ रोक, क्या है यह योजना ?

दस्तक ब्यूरो, देहरादून। आज सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राजनीति से जुड़ा बड़ा फैसला सुनाया, जिसमें ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ पर तत्काल रोक लगाने का आदेश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को इलेक्टोरल बॉन्ड का पूरा डाटा निर्वाचन आयोग को देने को कहा है, जिसे निर्वाचन आयोग को 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा।

 दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया कि इलेक्टोरल बॉन्ड के तहत चंदा देने वाले लोगों का नाम सार्वजनिक करना ‘निजता के अधिकार’ का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता को यह जानने का अधिकार है कि वह जिस पार्टी को वोट दे रहा है, उसकी आय का साधन क्या है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को संविधान की मूल भावन के अनुरूप नहीं माना है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को केंद्र सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को मिली ‘संजीवनी’ ?

 वहीं, कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने में जुट गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को विपक्ष आगामी लोकसभा चुनाव के लिए संजीवनी मान रहा है। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मोदी सरकार उद्योगपतियों से अधिक मात्रा में चंदा ले रही है, इसके बाद सरकार उन उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाती है।

क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड योजना  ?

मोदी सरकार ने वर्ष 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लागू की। इलेक्टोरल बॉन्ड को राजनीतिक पार्टियों के आय का मुख्य स्रोत माना जाता है। इसे चुनावी बॉन्ड के नाम से भी जानते हैं। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 29(ए) के अतर्गत पंजीकृत राजनीतिक पार्टी या पिछले लोकसभा, विधानसभा चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी चुनावी बॉन्ड प्राप्त कर सकती हैं। इसके लिए एसबीआई से इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदना होता है और फिर राजनीतिक पार्टी इसे भुना सकती हैं। इस चुनावी चंदे को पूरी तरह से वैध माना गया है। सरकार का तर्क है कि इस योजना से कालाधन के प्रवाह को रोका जा सकेगा।

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