उत्तर प्रदेशलखनऊ

भारतीय वैज्ञानिक के शोध ने 2014 में ही आगाह किया- पृथ्वी की धीमी गति से विनाशकारी तबाही

प्रो0 भरत राज सिंह

अभी-अभी कुछ दिन पूर्व अमेरिकी रिसर्चर ने जो लॉजिकल सोसाइटी आफ अमेरिका की एनुअल रिसर्च के एक आकड़े को पेश करते हुए दावा किया है, कि साल 2018 में उष्णकटिबन्धीय इलाको में विनाशकारी भूकम्प की निरन्तरता से नकारा नही जा सकता है। यहॉ तक इनकी औसतन 50-60 प्रतिशत भूकम्प के आने की संख्या में बढ़ोत्तरी हो सकती है। आकड़ो से यह भी पता चलता है कि सन् 1900 के बाद 7 या उससे अधिक तीब्रता वाले भूकम्प की स्थिति के सापेक्ष 2000 तक 15 (प्रन्द्रह) से 20 (बीस) बड़े भूकम्प आने की संख्या पहुॅच चुकी है। रिसर्च में यह भी जिक्र किया गया है कि यह स्थिति पृथ्वी में उसके परिक्रमण गति (रोटेशन) में हल्की कमी के कारण हो सकती है। सामान्य तौर पर पृथ्वी का सूर्य की परिक्रमा के दौरान 24 घण्टे अपनी धुरी पर एक चक्कर काटती है और इसी बीच में चन्द्रमा का बीच में आ जाने से पृथ्वी पर ज्वारीय प्रभाव से समय-समय परिक्रमण गति धीमी हो जाती है।
पिछले वर्ष दिसम्बर 2016 में भी कनाडा की अल्बर्टा युनिवर्सिटी के भौतिकी के प्रोफेसर व शोधकर्ता मैथ्यूडर्बो में भी डवेरी ने भी यह बात कही थी कि समुद्र के जल स्तर में बढोत्तरी जो ग्लेशियर के पिघलने से लगातार हो रही है, पृथ्वी के घूर्णन गाति में बदलाव पैदा कर रहा है, और गाति धीमी हो रही है, उनका भी यह कहना था कि इससे चन्द्रमा के गुरूत्वीय आकर्षण भी पृथ्वी के घूर्णन को कम करने में अपनी भूमिका निभाता है। उनका कहना था कि 21वीं शदी के अन्त तक 1.7 मिली सेकेण्ड तक एक दिन में गाति धीमी होने के अनुमान है।

यह गर्व की बात है कि अपने देश के वरिष्ठ पर्यावरणविद् व वैज्ञानिक, डॉ0 भरत राज सिंह जो वर्तमान महानिदेशक, स्कूल ऑफ मैनेजमेन्ट साइन्सेज, लखनऊ में कार्यरत हैं और डॉ0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय में शोधकर्ता हैं, जोकि पहले ही आगाह कर चुके है कि पृथ्वी के घूर्णनगति में परिवर्तन से शदी के अन्त तक धरती को डगमगाने से कोई रोक नही सकता है, यह उन्होने अपने ग्लोबल वार्मिंग काजेज इम्पैक्ट एण्ड रेमेडीज में अंकित किया है। प्रो0 सिंह का कहना है कि इसका मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग से उत्तरी ध्रुव पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है और ग्लेशियर सिकुड रहे है। पिघलने की इस गति से 2040 तक उत्तरी ध्रुव पर नाम मात्र की बर्फ बचेगी। विगत दस वर्ष से अप्रैल 2013 तक आर्कटिक क्षेत्र में बर्फीली चट्टानें दस लाख टन प्रतिवर्ष की दर से पिघल रही है। सदी के अंत तक समुद्र तल में 3.5 से 13 फुट की बढ़ोत्तरी की संभावना है। इससे ध्रुव के ग्लेशियर व बर्फीली चट्टानों की मध्य रेखा पर समुद्र के पानी का 397 अरब टन से 1450 अरब टन में वृद्धि होगी। इससे पृथ्वी के घुमाव कोण (23.43 डिग्री) भी परिवर्तित हो जाएगा। समुद्र की सतह बढ़ने से चन्द्रमा के गुणत्तीय आकर्षण से पृथ्वी के घूर्णन गति अधिक धीमी हो जाएगी। और पृथ्वी के कोण व घूमने की गति में परिवर्तन से होने वाली तबाही को कोई नहीं रोक सकता।

प्रो0 भरत राज सिंह का कहना है कि अमेरिका में सैंडी नामक तूफान ने जमकर उत्पात मचाया। न्यूयार्क शहर का एक तिहाई हिस्सा समुद्र में समा गया। इसकी आशंका उन्होंने मई 2014 में प्रकाशित हुई पुस्तक में पहले ही व्यक्त कर दिया था। तब से अमेरिका, कनाडा, व इंग्लैंड में हर साल भीषण बर्फबारी हो रही है। आने वाले समय में यूएसए, इंग्लैंड आदि देशों के कुछ प्रमुख तटीय शहर समुद्र में समा सकते है। इसके साथ ही उत्तरी-पश्चिमी सीमाओं पर बहुतायत में बर्फबारी होगी। नए ग्लेशियर का निर्माण होगा। उत्तरी ध्रुव के बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघलेंगे। विशाल हिमखण्ड टूटकर अटलांटिक महासागर में बहते हुए प्रमुख तटीय शहरो से टकराएंगे। उन्होंने बताया कि देश में समुद्री तटों पर भीषण बारिश व हिमालय से सटे प्रदेशों में बर्फबारी व भीषण ठंड का प्रकोप बढ़ गया है जबकि उत्तर प्रदेश व बिहार में सूखे पड़ने की संभावना बढ़ती जा रही है। उनके इस शोध को, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा आदि देशों के शोधकर्ता विवेचना कर आगे बढ़ा रहे है।
(लेखक वरिष्ठ पर्यावरणविद् एवं स्कूल ऑफ मैनेजमेन्ट साइन्सेज, लखनऊ में महानिदेशक (तकनीकी) हैं)

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