रुद्रप्रयाग/केदारनाथ। विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल की सुबह 8 बजे वैदिक मंत्रोच्चार और विधिवत पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयकारों के बीच 8वीं सिखलाई रेजीमेंट के बैंड की मधुर धुनों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। इसी के साथ केदारनाथ धाम में इस वर्ष की धार्मिक गतिविधियों की शुरुआत हो गई।
केदारनाथ धाम में सीमित पुजारियों को ही मिलता है पूजा का अधिकार
केदारनाथ धाम में पूजा-अर्चना का दायित्व केवल कुछ विशेष पुजारियों के पास ही रहता है। वर्तमान में यहां पांच पुजारी नियुक्त हैं, जो रोटेशन प्रणाली के तहत पूजा कार्य संभालते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है और इसे अत्यंत पवित्र धार्मिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से ही क्यों आते हैं पुजारी?
केदारनाथ धाम के पुजारी मुख्य रूप से दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के वीर शैव लिंगायत समुदाय से आते हैं। जंगम लिंगायत परिवारों द्वारा इस धाम में पूजा करने की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, यह जिम्मेदारी पीढ़ियों से इसी समुदाय को सौंपी जाती रही है।
आदि शंकराचार्य से जुड़ा धार्मिक इतिहास
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार 8वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप विकसित कराया था, जबकि मूल मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया माना जाता है। इसके बाद से ही यहां पूजा की एक निश्चित परंपरा विकसित हुई, जो आज भी जारी है।
पुराने पुजारियों से वर्तमान व्यवस्था तक की परंपरा
वर्ष 1974 से पहले सिद्धलिंग जी, निरंजन जी, नित्यानंद जी और राजलिंग पुजारी द्वारा पूजा संपन्न कराई जाती थी। इनके बाद गुरुलिंग पुजारी और फिर राजशेखर लिंग पुजारी ने यह जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में ये सभी सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अलग-अलग स्थानों पर निवास कर रहे हैं।
कैसे होती है पुजारियों की नियुक्ति?
केदारनाथ, मद्महेश्वर, काशी विश्वनाथ (गुप्तकाशी) और ओंकारेश्वर मंदिर (ऊखीमठ) में पुजारियों की नियुक्ति एक विशेष प्रक्रिया के तहत होती है। पहले उन्हें रावल के शिष्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके बाद रावल की संस्तुति पर बदरी-केदार मंदिर समिति उनकी नियुक्ति करती है।
पुजारियों को छह महीने तक धाम में निरंतर पूजा करने का संकल्प लेना होता है और इस दौरान वे अवकाश भी नहीं ले सकते। हर वर्ष महाशिवरात्रि पर रावल द्वारा नई नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी की जाती है और पुजारियों को पगड़ी पहनाकर औपचारिक रूप से जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
पहले दिन उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
कपाट खुलते ही पहले दिन लगभग 38 हजार श्रद्धालुओं ने बाबा केदार के दर्शन किए। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय मानी जा रही है। मंदिर परिसर में भंडारे का भी आयोजन किया गया, जहां श्रद्धालुओं को प्रसाद और भोजन उपलब्ध कराया गया।
केदारनाथ यात्रा से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ
केदारनाथ यात्रा से हर वर्ष 30 से 40 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। होटल, परिवहन, घोड़ा-खच्चर, डंडी-कंडी और हेलीकॉप्टर सेवाओं से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। साथ ही अन्य राज्यों और नेपाल से भी लोग रोजगार के लिए यहां आते हैं।




