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कल्पवृक्ष : औषधीय गुणों से भरपूर, दर्शन मात्र से पूर्ण होती हैं मन की इच्छाएं

नई दिल्‍ली : ‘कल्पवृक्ष’ को देवलोक का वृक्ष माना जाता है। इसे कल्पद्रुप, कल्पतरु, सुरतरु देवतरु तथा कल्पलता जैसे नामों से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी एक था। बाद में यह इंद्रदेव को दे दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन में कर दी थी। हिंदुओं का विश्वास है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वही यह दे देता है। यही वजह है कि धरती पर इस वृक्ष को इच्‍छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष माना जाता है। इसका नाश कल्पांत तक नहीं होता। ‘तूबा’ नाम से ऐसे ही एक पेड़ का वर्णन इस्लामी धार्मिक साहित्य में भी मिलता है जो सदा अदन (मुसलमानों के स्वर्ग का उपवन) में फूलता फलता रहता है। सिद्ध, नाथ और संत कल्पलता या कल्पवल्लरी संज्ञा ‘उन्मनी’ को देते हैं क्योंकि उनके मतानुसार सहजावस्था या कैवल्य की प्राप्ति के लिए उन्मनी ही एकमात्र साधन है जो न केवल सभी कामनाओं को पूरी करने वाली है बल्कि स्वयं अविनश्वर भी है और जिसे मिल जाती हैं, उसे भी अविनश्वर बना देती है।

पौराणिक धारणा है कि समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक कल्पवृक्ष को देवगण स्वर्ग ले गए थे और यह बाद मेंं इंद्र के नंदन वन की शोभा बना था। पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने तपोबल से इसे स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था। अर्जुन ने अपने बाण से पाताल तक छिद्र कर इसे रोपित कर दिया था। देखने में कल्पवृक्ष काफी विशालकाय होता है। इसका तना काफी मोटा होता है। देखने में यह बरगद के वृक्ष के समान होता है। अगस्त माह में इसमें सफेद फूल आते हैं जो सूखने के उपरांत सुनहरे रंग के हो जाते हैं। इसके फूल कमल के फूल में मौजूद असंख्य कलियों जैसे होते हैं। इसका फल नारियल की तरह होता है जो वृक्ष की पतली टहनी के सहारे नीचे लटकता रहता है।
नहीं गिरते पत्ते फिर भी पतझड़ी वृक्ष : पीपल की तरह कम पानी में ही यह वृक्ष फलता फूलता है। सदा बहार रहने वाले इस कल्पवृक्ष की पत्तियां कम हीं गिरती हैं। हालांकि इसके बावजूद इसको पतझड़ी वृक्ष कहा गया है। इसकी औसत जीवन अवधि दो हजार साल के आसपास मानी जाती है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इसका दर्शन करने मात्र से ही जीवन से परेशानियों का नाश हो जाता है। इसको पहचानने वाले लोग कल्पवृक्ष का दर्शन करना अपना सौभाग्य समझते हैं और इसकी पूजा करते हैं।
स्वर्ग का विशेष वृक्ष : पुराणों में कल्पवृक्ष को स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष भी कहा गया है। इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा होती है। ओलिएसी कुल के इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ओलिया कस्पीडाटा है। यह यूरोप के फ्रांस व इटली में काफी पाया जाता है। इसके अलावा यह दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। भारत में इसका वानस्पतिक नाम बंबोकेसी है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1775 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडनसोनिया टेटा रखा गया। इसे बाओबाब भी कहते हैं। इसके पत्ते कुछ-कुछ आम के पत्तों की तरह होते हैं यह वृक्ष लगभग 70 फुट ऊंचा होता है और इसके तने का व्यास 35 फुट तक हो सकता है। अभी तक करीब 150 फीट तक इसके तने का घेरा नापा गया है। इस वृक्ष की औसत जीवन अवधि 2500-3000 साल है। कार्बन डेटिंग के जरिए सबसे पुराने फर्स्ट टाइमर की उम्र 6,000 साल आंकी गई है।
कहां पर है ये वृक्ष : भारत में रांची, अल्मोड़ा, काशी, नर्मदा किनारे, कर्नाटक और यूपी आदि कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर ही यह वृक्ष पाया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार परिजात ही कल्पवृक्ष है। यह वृक्ष उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के बोरोलिया में आज भी विद्यमान है। कार्बन डेटिंग से वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र 5,000 वर्ष से भी अधिक की बताई है। इसके अलावा ग्वालियर के पास कोलारस में भी एक कल्पवृक्ष है जिसकी आयु 2,000 वर्ष से अधिक की बताई जाती है। ऐसा ही एक वृक्ष राजस्थान में अजमेर के पास मांगलियावास में है और दूसरा पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के आश्रम में मौजूद है। इसके अलावा इष्टिकापुरी यानी इटावा में भी इसके दो पेड़ हैं। इटावा के अलावा बाराबंकी के रामनगर रेंज व ललितपुर के एसएसपी आवास में भी कल्पवृक्ष मौजूद है। शहर के प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी के परिसर में पहला कल्पवृक्ष प्रवेश द्वार पर ही है। जबकि दूसरा डीएफओ के आवास में मौजूद है। आजादी से पहले इन वृक्षों की स्थापना यहां पर की गई थी। आसपास के रहने वाले लोग यहां पर नियमित तौर पर पूजा पाठ करने के लिए आते हैं और मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। समुद्र मंथन से निकला था कल्पवृक्ष वन विभाग परिसर में विभाग द्वारा जो शिला पट्टिका लगाई गई है उसमें कल्पवृक्ष के महत्व का उल्लेख किया गया है।
औषध गुणों से भरपूर : औषध गुणों के कारण भी इस वृक्ष की पूजा की जाती है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन ‘सी’ होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं। इसकी पत्ती को धोकर सूखी या पानी में उबालकर खाया जा सकता है। पेड़ की छाल, फल और फूल का उपयोग औषधि तैयार करने के लिए किया जाता है। इस वृक्ष की 3 से 5 पत्तियों का सेवन करने से हमारे दैनिक पोषण की जरूरत पूरी हो जाती है। शरीर को जितने भी तरह के सप्लीमेंट की जरूरत होती है इसकी 5 पत्तियों से उसकी पूर्ति हो जाती है। इसकी पत्तियां उम्र बढ़ाने में सहायक होती हैं, क्योंकि इसके पत्ते एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं। यह कब्ज और एसिडिटी में सबसे कारगर है। इसके पत्तों में एलर्जी, दमा, मलेरिया को समाप्त करने की शक्ति है। गुर्दे के रोगियों के लिए भी इसकी पत्तियों व फूलों का रस लाभदायक सिद्ध हुआ है। इसके बीजों का तेल हृदय रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसके तेल में एचडीएल (हाईडेंसिटी कोलेस्ट्रॉल) होता है। इसके फलों में भरपूर रेशा (फाइबर) होता है। मानव जीवन के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व इसमें मौजूद रहते हैं। पुष्टिकर तत्वों से भरपूर इसकी पत्तियों से शरबत बनाया जाता है और इसके फल से मिठाइयां भी बनाई जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हमारे शरीर में आवश्यक 8 अमीनो एसिड में से 6 इस वृक्ष में पाए जाते हैं।
पर्यावरण के लिए लाभदायक : एक तरफ जहां ये वृक्ष्‍ा अपने औषधीय गुणों की वजह से जाना जाता है वहीं ये पर्यावरण के लिहाज से भी काफी लाभदायक है। यह वृक्ष जहां भी बहुतायत में पाया जाता है, वहां सूखा नहीं पड़ता। यह रोगाणुओं का डटकर मुकाबला करता है। इस वृक्ष की खासियत यह है कि कीट-पतंगों को यह अपने पास फटकने नहीं देता और दूर-दूर तक वायु के प्रदूषण को समाप्त कर देता है। इस मामले में इसमें तुलसी जैसे गुण हैं। पानी के भंडारण के लिए इसे काम में लिया जा सकता है, क्योंकि यह अंदर से (वयस्क पेड़) खोखला हो जाता है, लेकिन मजबूत रहता है जिसमें 1 लाख लीटर से ज्यादा पानी की स्टोरिंग केपेसिटी होती है। इसकी छाल से रंगरेज की रंजक (डाई) भी बनाई जा सकती है। चीजों को सोलिड बनाने के लिए भी इस वृक्ष का इस्तेमाल किया जाता है।

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