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‘लालू’ राज में भारतीय रेल थी बेपटरी, ऊपर से नीचे तक था गड़बड़झाला

नई दिल्ली: भारतीय रेलवे को बुलंदियों तक पहुंचाने का दावा करने वाले राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव इन दिनों सियासी तूफान में फंसे हुए हैं। लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के सिलसिले में रांची में अदालत के सामने पेश होते हैं, जज से कहते हैं कि हुजूर मैं राजनीतिक शख्स हूं और मुझे बहुत से काम करने होते हैं। लेकिन इन सबके बीच वर्ष 2006 का एक मामला उनके परिवार के  लिए भारी पड़ रहा है। 

रांची और पुरी में रेलवे के जिन होटलों को प्राइवेट हाथ में बेचा गया, वो सवालों के घेरे में हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस टेंडर पैनल ने सौदों पर अंतिम मुहर लगाई थी, उनके सदस्यों का कहना है कि अब उन्हें कुछ भी याद नहीं है। इस पूरे मामले को तफ्सील से समझने से पहले ये जरूरी है कि जाना जाए कि आखिर वो कौन से होटल थे, टेंडर पैनल में सदस्य कौन थे और किनके हाथों में रेलवे के होटलों को सुपुर्द किया गया था।

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'लालू' राज में भारतीय रेल थी बेपटरी, ऊपर से नीचे तक था गड़बड़झालाटेंडर पैनल के सदस्य

बी के अग्रवाल- भारतीय रेलवे में वरिष्ठ पद पर तैनात। 2006 में टेंडर कमेटी के सदस्य थे।

विवेक अस्थाना- 2014 में भारतीय रेलवे से रिटायर हो चुके हैं।

राकेश गोगिया- रेलवे के किसी विभाग से संबंध नहीं, फिलहाल प्राइवेट सेक्टर में तैनात ।

जिन होटलों पर है विवाद

बीएनआर- रांची

बीएनआर- पुरी

इन दोनों होटलों के लिए सुजाता होटल्स ने टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया था।

बी के अग्रवाल का क्या है कहना

अग्रवाल का कहना है कि लंबा अरसा बीत चुका है, उन्हें कुछ भी याद नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि अगर आपके सामने सभी दस्तावेजों को लाया जाए तो क्या वो सब कुछ बता पाएंगे। लेकिन अग्रवाल ने कहा कि फिर भी याद करना मुश्किल होगा कि उस समय क्या बातचीत हुई होगी। 2006 में जब टेंडर दिए जाने की प्रक्रिया चल रही थी, उस वक्त अग्रवाल (मेकैनिकल सर्विस ऑफिसर) आइआरसीटीसी के टूरिज्म सर्विस में ग्रुप मैनेजर थे। फिलहाल वो रेलवे के वर्कशॉप माडर्नाइजेशन विंग के प्रमुख हैं।

विवेका अस्थाना ने क्या कहा ?

2006 में विवेक अस्थाना (रेलवे ट्रैफिक ऑफिसर) आइआरसीटीसी (ऑपरेशंस) के ग्रुप मैनेजर थे। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों के बीत जाने के बाद उनको कुछ याद नहीं है। उस वक्त हर दिन टेंडर खोले जाते थे, बावजूद उसके वो कैटरिंग सेवा में थे और उनके विभाग का कोई लेना देना नहीं था। वो सिर्फ टेंडर कमेटी के हिस्सा थे।

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जानकार की राय

 दिल्ली हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील शशांक शुद्धि ने कहा कि दस्तावेजी साक्ष्यों के सामने मुंहजबानी बातों का कोई अर्थ नहीं है। अगर किसी शख्स ने किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया है तो जांच में उसकी मिलाम की जाती है। लिहाजा कोई भी आरोपी ये कहकर नहीं बच सकता है कि उसे कुछ पता ही नहीं था। 

जब मुकर गए गोगिया

टेंडर कमेटी के तीसरे सदस्य गोगिया 2006 में आइआरसीटीसी के साथ ज्वांइट जनरल मैनेजर (फाइनेंस) और कंपनी सेक्रेटरी के रूप में जुड़े हुए थे। 2008 में जब पहली बार टेंडर को लेकर सवाल उठे उस वक्त उनके हस्ताक्षर वाले नोट मीडिया को जारी हुए, जिसमें ये जिक्र था कि सुजाता होटल्स को टेंडर देने में किसी तरह की अनियमितता नहीं बती गई थी। लेकिन जब गोगिया से ये पूछा गया कि उस नोट पर आप के हस्ताक्षर थे तो उन्होंने कहा कि आप लोग किस नोट की बात कर रहे हैं। उन्होंने किसी तरह का नोट जारी नहीं किया था। वो उनका जॉब नहीं था। 2010 में गोगिया आइआरसीटीसी को छोड़ चुके थे।

भ्रष्टाचार के घेरे में लालू परिवार

सीबीआइ ने अपनी जांच में उन सभी लोगों को शामिल किया है जो सीधे तौर पर आइआरसीटीसी की टेंडर प्रक्रिया से जुड़े हुए थे। पिछले महीने सीबीआइ द्वारा दर्ज की गई एफआइआर में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और उनके बेटे तेजस्वी यादव का नाम शामिल है। एफआइआर में जिक्र है कि पटना में पॉश इलाके में जमीन हासिल करने के बदले में लालू यादव ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए दो टेंडरों का आवंटन नियमों के खिलाफ किया। पिछले गुरुवार को प्रवर्तन निदेशालय ने टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितता के लिए लालू और उनके परिवार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया था।

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दस्तावेजों से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक पुरी होटल के लिए सिर्फ सुजाता होटल्स ही सफल दावेदार रही। दरअसल सुजाता होटल्स के अलावा फाइनेंसियल ग्राउंड पर दूसरा कोई मुकाबले में नहीं था। रिकॉर्ड के मुताबिक टेंडर कमेटी ने जिक्र किया कि सुजाता होटल्स के मुकाबले सिर्फ होटल केसरी था। लेकिन फाइनेंसियल राउंड में होटल केसरी का दावा कमजोर पड़ गया।

रांची होटल के लिए टेंडर समिति ने फाइनेंसियल राउंड में दीनानाथ होटल के मुकाबले सुजाता होटल के दावे को स्वीकार किया। टेंडर कमेटी ने दोनों होटलों के संबंध में अपनी रिपोर्ट आइआरसीटीसी के मैनेजिंग डॉयरेक्टर पी के गोयल को 23 दिसंबर 2006 को सौंपी और उसी दिन टेंडर को हरी झंडी मिल गई। गौरतलब है कि सीबीआइ की एफआइआर में पीके गोयल का नाम भी शामिल है।

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