48 वर्षों के बाद आज संकष्टी चतुर्थी पर बन रहा यह दुर्लभ संयोग, इस विधि से करें पूजन

हमारे हिंदू धर्म समय समय पर देश भर में अलग अलग समय पर कई ढेर सारे त्यौहार मनाए जाते हैं, ऐसे में हर त्यौहार का अपना एक अलग महत्व और एक अलग विशेषता होती है। इन्हीं त्योहारों में से एक आज हम आपको एक त्योहार की विशेषता बताने जा रहे हैं, जो इस महीने की 24 जनवरी यानी की आज संकष्टी चतुर्थी जिसे सकट चौथ के नाम से भी जाना जाता है के तौर पर मनाई जा रही है। आपको बता दे कि सकंष्टी चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश जी की पूजा की जाती है, इस दिन इनकी पूजा करने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है और आपके सारे कष्ट भी दूर हो जाते है।
इस दिन को सारे लोग वक्रतुंडी चतुर्थी के नाम से जानते है। कई लोग इसे माघी चौथ और तिलकुटा चौथ नाम से भी जानते हैं। लोगो की यह मान्यता है कि इस दिन गणेश जी का विधि विधान से पूजा करने से संतान की आयु में वृद्धि होती है। इस व्रत को अर्घ्य देकर ही खोला जाता है। इस दिन सारी स्त्रियां निर्जल व्रत रखती हैं। इस दिन तिल का प्रसाद ग्रहण करना काफी शुभ माना गया है और साथ ही दूर्वा, शमी, बेलपत्र और गुड़ के बने तिल के लड्डू चढ़ाने से शुभ फल मिलते है। यह व्रत रखने वाले स्त्रियों को फलों का ही सेवन भी करना चाहिए।
चलिए आपको बताते है कि यह पूजा आपको कैसे करनी चाहिए। क्या है वो सही विधियां जिससे आप शुभ फल पा सकते है। इस व्रत में स्त्रियों को सबसे पहले सुबह स्नान कर साफ-सुथरे कपड़े धारण कर लेने चाहिए और पूजा के लिए चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को स्थापित कर पूजा करनी चाहिए। अब पूजा करने के दौरान व्रत का संकल्प लें और फिर भगवान को जल, लड्डू, पान व धूप आदि अर्पित करें। इसी के दौरान आप ओम गं गणपतये नम: मंत्र का जाप भी करें।
इसके बाद आपको चौथ की कहानी सुनने के बाद एक कटोरी में तिलकुट और रुपए रख कर सास या घर के बड़ों के पैर छूकर उन्हें दे। इसके बाद हाथ में जल और तिलकुट लेकर चंद्रमा को अर्ध्य दें और प्रणाम करके संतान की लंबी आयु की कामना करें।पूजन समाप्त हो जाने के बाद लड्डू प्रसाद स्वरुप ग्रहण कर सकते है। आपकी जानकारी के लिए बता दें की यह व्रत निराहार रखा जाता है और रात में चंद्रमा या तारों के दर्शन करके अर्ध्य देकर व्रत खोला जाता है। आपको बता दे कि पूजा का समय शाम में 9 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगा। चंद्रमा का उदय होते ही व्रत रखने वाले भक्त पूजा शुरू कर सकते है।



