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अयातुल्ला खामेनेई के बाद ईरान की सत्ता किसके हाथ? जानिए कैसे चुना जाता है नया सर्वोच्च नेता और कौन-कौन हैं संभावित दावेदार

दस्तक ब्यूरो: ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की संभावित उत्तराधिकार प्रक्रिया को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सर्वोच्च नेता के पद पर अचानक बदलाव होता है तो यह ईरान की राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था के लिए बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि ईरान की शासन प्रणाली ऐसी बनाई गई है कि किसी एक व्यक्ति के हटने से पूरी व्यवस्था तुरंत अस्थिर न हो।

ईरान में सर्वोच्च नेता का पद बेहद शक्तिशाली माना जाता है। इस पद के पास धार्मिक वैधता, सशस्त्र बलों की कमान और देश के अंतिम राजनीतिक फैसलों का अधिकार होता है। इसलिए इस पद पर होने वाला कोई भी बदलाव देश की राजनीति और नीति-निर्माण पर सीधा असर डालता है।

अंतरिम तौर पर बनाई गई तीन सदस्यीय नेतृत्व परिषद

अयातुल्ला खामेनेई के बाद व्यवस्था को बनाए रखने के लिए शीर्ष अधिकारियों ने एक तीन सदस्यीय नेतृत्व परिषद गठित की है। इस परिषद में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, मुख्य न्यायाधीश गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई और संरक्षक परिषद के सदस्य अलीरेज़ा अराफी शामिल हैं।

यह परिषद तब तक सर्वोच्च नेता की जिम्मेदारियों का निर्वहन करेगी, जब तक नए सर्वोच्च नेता का चयन नहीं हो जाता। संरक्षक परिषद स्वयं एक शक्तिशाली निकाय है जिसमें 12 सदस्य होते हैं। यह संस्था चुनावी उम्मीदवारों की निगरानी करती है और संसद द्वारा पारित कानूनों को वीटो करने का अधिकार भी रखती है।

अगले सर्वोच्च नेता का चयन कैसे होता है

ईरान में सर्वोच्च नेता का चयन ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ नामक संस्था करती है। इसमें 88 निर्वाचित मौलवी शामिल होते हैं और यही संस्था नए सर्वोच्च नेता के चयन का अंतिम निर्णय लेती है।

इसके साथ ही मध्य ईरान का धार्मिक शहर कोम भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोम को ईरान का प्रमुख धार्मिक केंद्र माना जाता है और यहां स्थित हौज़ा इल्मिया कोम दुनिया के सबसे बड़े शिया मदरसों में से एक है। यहां हजारों मौलवियों और धार्मिक विद्वानों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस कारण कोम शहर को ईरान के धार्मिक और वैचारिक ढांचे का केंद्र भी माना जाता है।

‘वेलायत-ए फकीह’ सिद्धांत से मिलती है सर्वोच्च शक्ति

ईरान की शासन व्यवस्था का आधार ‘वेलायत-ए फकीह’ सिद्धांत है, जिसे अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी ने प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के तहत सर्वोच्च नेता धार्मिक और राजनीतिक दोनों सत्ता के शीर्ष पर होता है।

सर्वोच्च नेता के पास सेना, न्यायपालिका, सरकारी मीडिया और कई अहम संस्थाओं पर अंतिम अधिकार होता है। राष्ट्रपति और संसद भी इसी ढांचे के भीतर काम करते हैं।

कौन हो सकता है खामेनेई का उत्तराधिकारी

ईरान में सर्वोच्च नेता के संभावित उत्तराधिकारियों को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। इनमें मोज्तबा खामेनेई, अलीरेज़ा अराफी, मोहम्मद मेहदी मीरबाघेरी, गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई और हसन खोमैनी शामिल बताए जा रहे हैं।

मोज्तबा खामेनेई वर्तमान सर्वोच्च नेता के दूसरे बेटे हैं और ईरान के प्रशासनिक तंत्र तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स में उनके प्रभाव की चर्चा होती रही है। अलीरेज़ा अराफी धार्मिक प्रतिष्ठानों में प्रभावशाली माने जाते हैं, हालांकि उन्हें राजनीतिक रूप से व्यापक समर्थन मिलने को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

मोहम्मद मेहदी मीरबाघेरी असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य हैं और पश्चिमी नीतियों के कड़े आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। वहीं गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई वर्तमान में ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख हैं।

उत्तराधिकार की चर्चाओं में हसन खोमैनी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। वह ईरान की इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी के पोते हैं और तेहरान में अपने दादा के मकबरे के संरक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं।


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