MP में UCC पर बड़ा कदम: शादी, तलाक, लिव-इन और संपत्ति के नियम बदलेंगे, जानिए ड्राफ्ट बिल की हर बड़ी बात

भोपाल: मध्य प्रदेश सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के ड्राफ्ट बिल को मंजूरी देकर इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश कर दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों को धर्म और जाति से परे समान कानूनी अधिकार उपलब्ध कराना है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश उन राज्यों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जहां यूसीसी लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी का अर्थ है कि विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे जैसे पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हो। इसमें धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रावधान होता है।
यह विषय लंबे समय से देश की राजनीति और कानूनी विमर्श का हिस्सा रहा है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से यूसीसी को अपने प्रमुख एजेंडों में शामिल करती रही है और इसे अपने चुनावी घोषणापत्रों में भी स्थान देती रही है।
संविधान में यूसीसी का क्या प्रावधान है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत किया गया है। इसमें कहा गया है कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। इसका उद्देश्य धर्म आधारित भेदभाव को समाप्त करना और सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने यूसीसी को आवश्यक बताया था, लेकिन प्रारंभिक चरण में इसे स्वैच्छिक रखने की बात भी कही थी। संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 35 के रूप में मौजूद यह प्रावधान बाद में अनुच्छेद 44 के रूप में शामिल किया गया।
यूसीसी का इतिहास क्या है?
समान नागरिक संहिता की अवधारणा ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ी हुई है। वर्ष 1835 में ब्रिटिश सरकार की एक रिपोर्ट में भारतीय कानूनों में एकरूपता लाने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, उस समय हिंदू और मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों को इससे अलग रखा गया था।
इसके बाद वर्ष 1941 में गठित बी.एन. राव समिति ने हिंदू कानूनों के संहिताकरण की सिफारिश की। समिति ने महिलाओं को समान अधिकार देने और विवाह व उत्तराधिकार संबंधी मामलों में एक समान व्यवस्था की वकालत की थी।
मध्य प्रदेश में यूसीसी की तैयारी कैसे हुई?
राज्य सरकार के अनुसार फिलहाल विवाह, विवाह-विच्छेद, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, लिव-इन संबंध और अन्य पारिवारिक मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। इन्हें एक समान, संतुलित और व्यावहारिक कानूनी ढांचे में लाने के उद्देश्य से 27 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
समिति में विधि विशेषज्ञ, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। समिति ने विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन करने के साथ उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों के मॉडल का भी परीक्षण किया। इसके अलावा आम नागरिकों, धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सुझाव एवं आपत्तियां भी आमंत्रित की गईं।
समिति ने महिलाओं और बच्चों के अधिकारों, समानता, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण, उनसे जुड़े अधिकारों और प्रस्तावित कानून के प्रशासनिक एवं कानूनी पहलुओं का अध्ययन किया। सरकार को 60 दिनों के भीतर ड्राफ्ट बिल और विस्तृत रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी समिति को दी गई थी।
जनभागीदारी के लिए बड़े स्तर पर परामर्श
सरकार ने 22 मई 2026 को सुझाव लेने के लिए एक वेब पोर्टल शुरू किया। इस अभियान के दौरान करीब 3.49 करोड़ एसएमएस भेजे गए। पोर्टल पर 9,58,675 सुझाव प्राप्त हुए, जबकि जिला और राज्य स्तर पर आयोजित 50 से अधिक जनपरामर्श बैठकों के माध्यम से 10,134 से अधिक सुझाव मिले।
जनपरामर्श में क्या सामने आया?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 93.54 प्रतिशत लोगों ने प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। 92.20 प्रतिशत लोगों ने सभी समुदायों में महिला और पुरुष के लिए समान कानून की आवश्यकता बताई। 91.32 प्रतिशत लोगों ने भेदभावपूर्ण तलाक कानून समाप्त करने का समर्थन किया, जबकि 92.66 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने की बात कही। वहीं 90.96 प्रतिशत लोगों का मानना था कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से कानूनी जटिलताएं बढ़ती हैं और 86.78 प्रतिशत लोगों ने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किए बिना यूसीसी लागू किए जाने का समर्थन किया।
ड्राफ्ट बिल में क्या होंगे नए नियम?
प्रस्तावित ड्राफ्ट बिल में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और लिव-इन संबंधों को लेकर कई अहम प्रावधान शामिल किए गए हैं। पहले विवाह के कानूनी रूप से समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह नहीं किया जा सकेगा। केवल मौखिक रूप से तलाक कह देने से विवाह समाप्त नहीं माना जाएगा, बल्कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तलाक प्रभावी होगा।
विवाह का पंजीकरण पंचायत से लेकर नगरीय निकाय स्तर तक अनिवार्य होगा। न्यायालय के बाहर विवाह विच्छेद को कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी। पुत्र और पुत्रियों को उत्तराधिकार में समान अधिकार प्राप्त होंगे तथा महिलाओं को संपत्ति में वही अधिकार मिलेंगे जो पुरुषों को प्राप्त हैं। जिन कानूनों में महिलाओं के अधिकार सीमित थे, वहां भाई और बहनों को समान अधिकार देने का प्रावधान किया गया है।
अनुसूचित जनजातियों को रखा गया दायरे से बाहर
सरकार के अनुसार प्रस्तावित कानून सभी धर्मों का सम्मान करता है और किसी भी धार्मिक परंपरा या अनुष्ठान में हस्तक्षेप नहीं करेगा। धार्मिक रीति-रिवाज पहले की तरह जारी रहेंगे। वहीं अनुसूचित जनजातियों और संरक्षित रूढ़िगत समूहों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि महिलाओं की गरिमा, समानता और नारी सशक्तिकरण इस कानून के प्रमुख उद्देश्य हैं।



