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होर्मुज बंद होने पर भी क्या नहीं रुकेगी दुनिया की तेल सप्लाई? जानिए खाड़ी देशों का नया प्लान, कैसे खत्म हो सकती है स्ट्रेट की रणनीतिक पकड़

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद किए जाने के बाद दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। सवाल यह है कि अगर होर्मुज लंबे समय तक बंद रहता है तो क्या वैश्विक तेल सप्लाई रुक जाएगी? इसका जवाब पूरी तरह ‘हां’ नहीं है। दरअसल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और इराक जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश ऐसे वैकल्पिक मार्ग तैयार कर रहे हैं, जिनके जरिए होर्मुज को बाईपास कर कच्चे तेल का निर्यात जारी रखा जा सके।

क्या है होर्मुज जलडमरूमध्य और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला संकरा समुद्री मार्ग है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा कॉरिडोर में इसकी गिनती होती है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलएनजी इसी रास्ते एशिया, यूरोप और अन्य देशों तक पहुंचता है। शांतिपूर्ण परिस्थितियों में वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता रहा है। यही वजह है कि यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और तेल कीमतों को प्रभावित करता है।

होर्मुज बंद होने पर क्यों बढ़ जाती है चिंता?

यदि इस जलमार्ग पर आवाजाही बाधित होती है तो सबसे पहले तेल निर्यात करने वाले देशों की सप्लाई चेन प्रभावित होती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता घट सकती है और कीमतों में तेजी आ सकती है। खासकर एशियाई देशों पर इसका अधिक असर पड़ता है, क्योंकि उनकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा होता है।

खाड़ी देशों ने क्यों शुरू किया वैकल्पिक रास्तों पर काम?

लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों को देखते हुए खाड़ी देशों ने अपनी तेल आपूर्ति को केवल होर्मुज पर निर्भर नहीं रहने देने की रणनीति अपनाई है। उद्देश्य यह है कि यदि किसी कारण यह समुद्री मार्ग बंद हो जाए तो भी निर्यात प्रभावित न हो और वैश्विक ग्राहकों तक तेल पहुंचता रहे।

सऊदी अरब कैसे करेगा होर्मुज को बाईपास?

सऊदी अरब के पास पहले से पूर्वी तेल क्षेत्रों को पश्चिमी तट स्थित लाल सागर के यानबू बंदरगाह से जोड़ने वाली ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन मौजूद है। 1980 के दशक में विकसित यह नेटवर्क तेल को अबकैक प्रोसेसिंग प्लांट से सीधे यानबू तक पहुंचाता है। वहां से तेल टैंकरों के जरिए या तो लाल सागर होते हुए स्वेज नहर की दिशा में या दक्षिणी समुद्री मार्गों से आगे भेजा जाता है। इससे होर्मुज पर निर्भरता काफी कम हो जाती है।

यूएई किस रणनीति पर आगे बढ़ रहा है?

संयुक्त अरब अमीरात फुजैराह तक अपने पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। फुजैराह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित महत्वपूर्ण निर्यात केंद्र है। इसके अलावा अबू धाबी की सरकारी तेल कंपनी लगभग 300 किलोमीटर लंबी नई पाइपलाइन का निर्माण भी कर रही है। करीब तीन अरब डॉलर की लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य फुजैराह तक प्रतिदिन अतिरिक्त 12 लाख बैरल से अधिक तेल पहुंचाने की क्षमता विकसित करना है। परियोजना का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है और इसे 2027 के दौरान पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इराक ने भी बदली निर्यात रणनीति

इराक भी तेल निर्यात के लिए नए विकल्प विकसित कर रहा है। प्रस्तावित परियोजनाओं के तहत बसरा से तुर्की के सेहान बंदरगाह तक पाइपलाइन विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है। इसकी एक शाखा सीरिया के बनियास बंदरगाह तक भी प्रस्तावित है, जहां से भूमध्य सागर के रास्ते तेल निर्यात किया जा सकेगा। इसके अलावा बसरा से जॉर्डन के अकाबा बंदरगाह तक पाइपलाइन परियोजना को भी आगे बढ़ाने पर चर्चा जारी है।

क्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी होर्मुज की अहमियत?

विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में होर्मुज की रणनीतिक भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। हालांकि, यदि वैकल्पिक पाइपलाइन परियोजनाएं तय समय पर पूरी हो जाती हैं तो वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होर्मुज के बिना भी जारी रखा जा सकेगा। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के जरिए प्रतिदिन कई मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल वैकल्पिक मार्गों से भेजा जा सकेगा, जिससे किसी संभावित अवरोध का असर काफी हद तक कम हो जाएगा।

क्या नए रास्ते पूरी तरह सुरक्षित हैं?

वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह विकसित होने के बावजूद जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होते। लाल सागर क्षेत्र, बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और कुछ पाइपलाइन नेटवर्क पहले भी हमलों का निशाना बन चुके हैं। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि होर्मुज का विकल्प तैयार करना जरूरी है, लेकिन इन नए मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

भारत और दुनिया पर क्या पड़ेगा असर?

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसमें खाड़ी देशों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में यदि वैकल्पिक निर्यात मार्ग मजबूत होते हैं तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर रह सकती है। इससे लंबे समय तक होर्मुज में तनाव रहने की स्थिति में भी तेल उपलब्धता पर दबाव अपेक्षाकृत कम होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता घटाने में मदद मिल सकती है।

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