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नटराज के पैरों तले दबा अपस्मार कौन? शिव की इस मुद्रा में छिपा है अज्ञान और अहंकार पर विजय का गहरा संदेश

नई दिल्ली: भगवान शिव का नटराज स्वरूप सनातन परंपरा में बेहद रहस्यमयी और प्रतीकात्मक माना जाता है। नृत्य के अधिपति के रूप में शिव की यह छवि सिर्फ कला का स्वरूप नहीं है, बल्कि इसमें सृष्टि, समय, ऊर्जा, ज्ञान और चेतना से जुड़े कई गहरे संदेश समाहित हैं। नटराज की प्रतिमा में दिखाई देने वाला हर प्रतीक अपने भीतर एक खास अर्थ रखता है।

नटराज रूप को ब्रह्मांड की निरंतर गति और सृष्टि के चक्र का प्रतीक माना जाता है। इस स्वरूप में उत्पत्ति, स्थिति और संहार यानी निर्माण, संरक्षण और विनाश की प्रक्रिया को दर्शाया गया है। यही वजह है कि नटराज की प्रतिमा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। आधुनिक विज्ञान और भौतिकी में ब्रह्मांड की निरंतर गति की अवधारणा से भी इस प्रतीकात्मक रूप को जोड़ा जाता है। स्विट्जरलैंड के जिनेवा स्थित CERN संस्थान के परिसर में स्थापित नटराज की विशाल प्रतिमा इसका चर्चित उदाहरण है।

पैरों के नीचे दबा अपस्मार क्या दर्शाता है?

नटराज की प्रतिमा में सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक शिव के पैरों के नीचे दिखाई देने वाली बौनी आकृति है। इसे अपस्मार या मुइलका कहा जाता है। हिंदू पौराणिक परंपरा में अपस्मार को अज्ञान, अहंकार, मूर्खता और मानसिक जड़ता का प्रतीक माना गया है।

शिव का अपस्मार को अपने पैर के नीचे दबाए रखना इस बात का संकेत माना जाता है कि ज्ञान और चेतना को अज्ञान तथा अहंकार पर नियंत्रण रखना चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका संदेश है कि जब तक इंसान अपने भीतर मौजूद अज्ञान और अहंकार पर विजय नहीं पाता, तब तक उसके लिए सच्चे ज्ञान और आत्मबोध की ओर बढ़ना मुश्किल है।

नटराज के इस प्रतीक में जीवन के संतुलन का संदेश भी छिपा है। बाहरी उपलब्धियों और लगातार आगे बढ़ने की होड़ के बीच व्यक्ति के लिए विवेक, ज्ञान और चेतना को महत्व देना जरूरी है।

अग्नि का घेरा बताता है समय और सृष्टि का चक्र

नटराज के चारों ओर बना प्रभामंडल या अग्नि का घेरा सृष्टि के भौतिक चक्र, समय की निरंतर गति और जन्म-मृत्यु के चक्र का प्रतीक माना जाता है। यह इस विचार को सामने रखता है कि ब्रह्मांड में परिवर्तन लगातार होता रहता है और कोई भी चीज हमेशा के लिए स्थायी नहीं है।

डमरू में छिपा है सृष्टि के आरंभ का नाद

नटराज के दाहिने ऊपरी हाथ में डमरू दिखाई देता है। इसे सृष्टि की पहली ध्वनि, नाद या ब्रह्मांडीय स्पंदन का प्रतीक माना जाता है। डमरू सृष्टि के आरंभ और समय की शुरुआत की ओर संकेत करता है।

हाथ में मौजूद अग्नि विनाश का प्रतीक

शिव के बाएं ऊपरी हाथ में अग्नि दिखाई देती है। इसे सृष्टि के अंत और प्रलय का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह सृष्टि का आरंभ होता है, उसी तरह एक समय उसका समापन भी होता है। नटराज की मुद्रा इसी निरंतर चलने वाले चक्र को दर्शाती है।

अभय मुद्रा देती है निर्भय रहने का संदेश

नटराज की प्रतिमा में शिव का एक हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। इसे भय से मुक्ति और सुरक्षा के आश्वासन का प्रतीक माना जाता है। इसका आध्यात्मिक संदेश है कि धर्म और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति को भयभीत होने की जरूरत नहीं है।

नटराज का स्वरूप केवल भगवान शिव के तांडव नृत्य का चित्रण नहीं करता। इसमें सृष्टि की गति, समय का चक्र, ऊर्जा, विनाश और ज्ञान-अज्ञान के बीच संघर्ष जैसे कई दार्शनिक संदेश एक साथ दिखाई देते हैं। पैरों के नीचे दबा अपस्मार खास तौर पर यह संदेश देता है कि ज्ञान और चेतना के प्रकाश में अज्ञान तथा अहंकार को नियंत्रित करना आत्मबोध की दिशा में पहला कदम है।

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