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पिथौरागढ़ की इस रहस्यमयी गुफा में पूजित हैं ‘आदि गणेश’, जानें भगवान के मूल मस्तक से जुड़ी प्राचीन मान्यता

नई दिल्ली: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट के पास स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा धार्मिक आस्था और प्राकृतिक संरचनाओं के कारण विशेष महत्व रखती है। इस गुफा से जुड़ी कई मान्यताएं हिंदू धार्मिक परंपराओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ी हैं। इन्हीं में भगवान गणेश के मूल मानव मस्तक से संबंधित मान्यता भी प्रमुख है।

गणेश जी के मूल मस्तक से जुड़ी है मान्यता

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने बालक गणेश को द्वार की रक्षा के लिए नियुक्त किया था। जब भगवान शिव वहां पहुंचे तो गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इसके बाद भगवान शिव और गणेश के बीच संघर्ष हुआ और क्रोधित होकर महादेव ने त्रिशूल से गणेश का मस्तक उनके धड़ से अलग कर दिया।

कथा के अनुसार, माता पार्वती के आग्रह के बाद भगवान शिव ने गणेश के धड़ पर हाथी का सिर लगाया और उन्हें नया जीवन प्रदान किया। इसी पौराणिक कथा से जुड़ी धार्मिक मान्यता है कि गणेश जी का मूल मानव मस्तक धरती पर एक विशेष स्थान पर सुरक्षित है और पाताल भुवनेश्वर गुफा को उसी स्थान से जोड़ा जाता है।

गुफा में ‘आदि गणेश’ के रूप में पूजी जाती है शिला

गुफा के भीतर एक विशेष शिला को आदि गणेश के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यह शिला भगवान गणेश के कटे हुए मूल मस्तक का प्रतीक है। इसी आस्था के चलते देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।

प्राकृतिक शिलाओं में दिखते हैं देवी-देवताओं के स्वरूप

पाताल भुवनेश्वर की धार्मिक विशेषता केवल गणेश जी से जुड़ी मान्यता तक सीमित नहीं है। गुफा के अंदर मौजूद प्राकृतिक शिलाओं और अलग-अलग संरचनाओं को भी विभिन्न देवी-देवताओं के स्वरूप से जोड़ा जाता है। गुफा की बनावट और प्राकृतिक आकृतियां इसके धार्मिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

आदि गणेश पर लगातार गिरती हैं पानी की बूंदें

आदि गणेश से जुड़ी शिला के ऊपर एक प्राकृतिक संरचना को 108 पंखुड़ियों वाले ब्रह्मकमल के रूप में देखा जाता है। इस संरचना से पानी की बूंदें लगातार नीचे गिरती रहती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ये बूंदें गणेश जी के मस्तक स्वरूप मानी जाने वाली शिला पर गिरती हैं, जिससे उनका लगातार प्राकृतिक अभिषेक होता रहता है।

भगवान शिव से भी जुड़ी है गुफा की मान्यता

श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास भी प्रचलित है कि भगवान शिव स्वयं इस स्थान पर विराजमान रहते हैं और गणेश जी के मूल मस्तक की रक्षा करते हैं। इसी वजह से पाताल भुवनेश्वर को भगवान शिव और गणेश की संयुक्त आस्था से जुड़े पवित्र स्थल के रूप में देखा जाता है।

आदि शंकराचार्य से भी जुड़ी है गुफा की परंपरा

पाताल भुवनेश्वर की खोज को लेकर धार्मिक परंपराओं में आदि शंकराचार्य का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि उत्तराखंड की यात्रा के दौरान उन्होंने इस गुफा और यहां मौजूद धार्मिक महत्व वाली संरचनाओं को पहचाना था। इसके बाद इस स्थान पर पूजा-अर्चना की परंपरा को विशेष महत्व मिला।

धार्मिक मान्यता है, ऐतिहासिक तथ्य नहीं

भगवान गणेश के मूल मानव मस्तक के पाताल भुवनेश्वर गुफा में मौजूद होने की बात धार्मिक मान्यता और पौराणिक परंपरा पर आधारित है। इसे ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। इसके बावजूद गुफा श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बनी हुई है। यहां की प्राकृतिक संरचनाएं, लगातार गिरती पानी की बूंदें और इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं इसे उत्तराखंड के प्रमुख आस्था स्थलों में विशेष पहचान देती हैं।

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