उत्तर प्रदेशराजनीति

UP चुनाव से पहले आरक्षण पर सवर्णों का आक्रोश, दिल्ली में आंदोलन तेज; भाजपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ सवर्णों का आंदोलन तेज होता नजर आ रहा है। रविवार को राजधानी दिल्ली में सैकड़ों प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस से जंतर-मंतर तक मार्च करते दिखाई दिए। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। आंदोलन के बढ़ने की स्थिति में इसका असर भाजपा के सवर्ण मतदाता आधार पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगों पर विचार करने के संकेत दिए हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार हुई सक्रिय
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने शनिवार को कहा कि जंतर-मंतर पर आरक्षण सुधार आंदोलन कर रहे छात्रों और युवाओं की मांगों पर केंद्रीय नेतृत्व गंभीरता से विचार करेगा। उन्होंने नई दिल्ली में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हर्ष दुबे के साथ संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही।

उपमुख्यमंत्री ने छात्र प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों को अगले दो दिनों में केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा जाएगा। इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री के साथ प्रतिनिधिमंडल की बैठक कराने की बात भी कही गई।

हर्ष दुबे, मृत्युंजय पाठक और शिवा शर्मा समेत प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के दौरान ब्रजेश पाठक ने कहा कि जंतर-मंतर पर शुक्रवार को हुए धरना-प्रदर्शन से संबंधित पत्र उन्हें मिला है और इसे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा दिया गया है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय नेतृत्व ने आंदोलन कर रहे युवाओं की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की बात कही है।

जाति जनगणना के बाद बढ़ी सियासी चिंता
जाति जनगणना के फैसले को लेकर भाजपा के कुछ नेताओं के बीच भी सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की चर्चा है। रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के एक सांसद ने आशंका जताई कि सवर्णों के बीच यह डर है कि जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद खासतौर पर अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को बढ़ाने की मांग और तेज हो सकती है।

इस बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर भी आरक्षण का मुद्दा चर्चा में है। राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाह ने बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की मांग उठाई है।

उपेंद्र कुशवाह ने 65 फीसदी आरक्षण की मांग उठाई
उपेंद्र कुशवाह ने कहा कि उनकी पार्टी ने राजगीर में आयोजित तीन दिवसीय संगठनात्मक सम्मेलन ‘विमर्श शिविर 2026’ में पिछड़े वर्गों के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रस्ताव पारित किया है।

उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के कार्यकाल में जातीय सर्वेक्षण के बाद आरक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन पटना हाई कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा का हवाला देते हुए इसे रद्द कर दिया था।

चिराग बोले- आरक्षण की समीक्षा भी मंजूर नहीं
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण की समीक्षा का विरोध किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि आरक्षण की समीक्षा भी स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए तैयार है।

चिराग पासवान ने यह भी रेखांकित किया कि सरकार सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए पहले ही 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर चुकी है।

वहीं, केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने शनिवार को आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताया। उन्होंने आरक्षण खत्म करने की मांग को असंवैधानिक करार दिया। पटना में संवाददाता सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ लोग आरक्षण समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, जबकि कुछ अन्य लोगों ने इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान भी चलाया है।

विपक्ष ने भी आरक्षण के मुद्दे को बनाया हथियार
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम देश के हित में नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के मुताबिक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान इन समुदायों के सदियों से चले आ रहे भेदभाव और वंचना को दूर करने के उद्देश्य से किया गया था।

क्या चाहते हैं प्रदर्शनकारी
रविवार को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन कर रहे लोगों के हाथों में अलग-अलग मांगों वाली तख्तियां थीं। प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण और सरकारी सहायता के लिए पात्रता तय करते समय आर्थिक स्थिति को प्रमुख आधार बनाने की मांग की। उनका कहना था कि सरकारी मदद जाति से अलग आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक पहुंचनी चाहिए।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में क्रीमी लेयर का नियम लागू करना और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करना शामिल है। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़ी नीतियों में बदलाव की मांग भी उठाई।

प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के ढांचे और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि शिक्षा और रोजगार के अवसरों को प्रभावित करने वाली नीतियों की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि उनका विरोध आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि आरक्षण में सुधार को लेकर है। उनका कहना था कि सभी समुदायों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और उनकी चिंताओं को भी सुना जाना चाहिए।

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