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फरक्का संधि पर बिहार में सियासी संग्राम, जदयू-राजद आमने-सामने; 1996 के समझौते को लेकर छिड़ी जुबानी जंग

पटना: बांग्लादेश के साथ भारत की फरक्का जल संधि को लेकर बिहार की राजनीति में एक बार फिर विवाद तेज हो गया है। जदयू और राजद इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। जदयू संधि के नवीनीकरण के खिलाफ है और पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा तथा उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी लगातार इसे बिहार और देश के हितों से जोड़कर उठा रहे हैं। जदयू का कहना है कि मौजूदा संधि बिहार के हित में नहीं है। साथ ही पार्टी ने राजद पर आरोप लगाया है कि सत्ता में रहने के दौरान लालू प्रसाद इस मुद्दे पर चुप रहे।

लालू प्रसाद के बयान से बढ़ा विवाद
सियासी तकरार तब और तेज हो गई जब लालू प्रसाद ने शनिवार को बयान जारी कर नीतीश कुमार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने संसद में इस विषय पर कभी एक शब्द नहीं बोला। लालू प्रसाद के मुताबिक, राजद ने संसद से लेकर राज्य तक हर मंच पर फरक्का बांध का विरोध किया है, क्योंकि पार्टी ने पहले ही इससे बिहार को होने वाले नुकसान और संभावित खतरे को पहचान लिया था।

उन्होंने जदयू नेताओं पर भी तीखा हमला बोला और कहा कि नीतीश कुमार के साथ खड़े लोग इस मुद्दे के इतिहास और भूगोल से परिचित नहीं हैं। लालू प्रसाद ने जल संसाधन विभाग, गंगा में पानी की उपलब्धता में कमी, बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय संधि के प्रभाव और तत्कालीन राज्य सरकार के प्रयासों का अध्ययन करने की बात कही। उन्होंने तत्कालीन सिंचाई मंत्री जगदा भाई के केंद्र सरकार के साथ किए गए पत्राचार का भी उल्लेख किया।

राजद ने पूछा- 12 साल से केंद्र और राज्य में सरकार, अब तक क्या किया
राजद के वरिष्ठ नेता आलोक मेहता ने रविवार को जदयू के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि फरक्का का मुद्दा आज का नहीं है और राजद शुरुआत से ही इसका विरोध करता रहा है। उन्होंने केंद्र और राज्य में पिछले 12 साल से सरकार में रहने वालों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इतने लंबे समय में उन्होंने इस मामले में क्या कदम उठाए।

आलोक मेहता ने कहा कि अगर एनडीए सरकार ने इस मामले में ठोस पहल की होती तो बिहार में बाढ़ की समस्या का समाधान निकाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि राजद ने शुरू से फरक्का संधि का विरोध किया है और बिहार के हित में आगे भी इसका विरोध जारी रहेगा।

बिहार के लिए क्यों अहम है गंगा के पानी का मुद्दा
इस विवाद के बीच गंगा के पानी के इस्तेमाल और उसके बंटवारे का मुद्दा भी सामने आया है। बिहार में यह मांग वर्ष 1995 से उठती रही है कि गंगा के पानी के बंटवारे में राज्य का हिस्सा तय किया जाए। आरोप है कि उत्तर प्रदेश में गंगा के पानी का इस्तेमाल विभिन्न परियोजनाओं में किया जाता है, जबकि बिहार में इस पर रोक जैसी स्थिति बन जाती है।

वर्ष 2012 में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल ने चौसा से फरक्का तक गंगा का हवाई सर्वेक्षण किया था। उस समय गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर आगे कार्रवाई की बात कही गई थी। इसके बाद कई बार पत्राचार हुआ, लेकिन अब तक इस मामले में कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।

बिहार में गंगा बक्सर जिले के चौसा से भागलपुर के कहलगांव तक बहती है। गंगा में जमा गाद और बाढ़ के कारण इस क्षेत्र की बस्तियां प्रभावित होती हैं।

क्या है 1996 की फरक्का जल संधि
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि पर 12 दिसंबर 1996 को हस्ताक्षर हुए थे। इसे फरक्का संधि के नाम से भी जाना जाता है। इस समझौते को लेकर बिहार में लंबे समय से आपत्तियां उठती रही हैं।

विवाद का एक प्रमुख पहलू फरक्का बैराज में गाद जमा होने और उसके कारण बरसात के दौरान बाढ़ की स्थिति से जुड़ा है। दूसरी ओर, गर्मी के मौसम में बांग्लादेश को अतिरिक्त पानी दिए जाने से बिहार में जल संकट की स्थिति पैदा होने का दावा किया जाता है। यह भी कहा गया है कि कोसी और गंडक का पानी गंगा के रास्ते बांग्लादेश तक पहुंचता है और बिहार में उसका अपेक्षित उपयोग नहीं हो पाता।

संधि के नवीनीकरण पर भाजपा ने भी रखी बात
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने कहा कि फरक्का का मुद्दा सिर्फ पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, संधि के नवीनीकरण के समय बिहार की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों को मजबूती से सामने रखना जरूरी है।

वहीं, जदयू की ओर से राजद पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि 1996 में जब फरक्का संधि हुई थी, तब लालू प्रसाद केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रभावशाली नेता थे और बिहार के मुख्यमंत्री भी थे। जदयू का सवाल है कि उस समय संधि के विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई गई।

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