शिक्षक पात्रता परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट में फिर पहुंचा मामला, 2005-09 में नियुक्त शिक्षकों को राहत की उम्मीद

भोपाल: शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर विविध आवेदन दायर किया गया है। यह आवेदन कर्मचारी चयन मंडल की ओर से आवेदन प्रक्रिया शुरू किए जाने और परीक्षा की तारीख घोषित होने के बीच दाखिल किया गया है। आवेदन में 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को राहत देने की मांग उठाई गई है।
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगौर के मुताबिक राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण मुद्दा मौखिक रूप से उठाया गया था, लेकिन वही आधार पुनर्विचार याचिका में उतनी मजबूती और विस्तार के साथ लिखित रूप में दर्ज नहीं हो सका।
डीके सिंगौर का कहना है कि न्यायालय में मौखिक रूप से रखी गई दलील और याचिका में विधिवत दर्ज कानूनी आधार का प्रभाव अलग-अलग होता है। उनके अनुसार सरकार प्रतिवादी के तौर पर कानून, प्रशासनिक व्यवस्था और अपने निर्णयों की सीमा के भीतर ही अपना पक्ष रख सकती है।
एसोसिएशन के मुताबिक प्रभावित शिक्षक अपने व्यक्तिगत अधिकारों, नियुक्ति की परिस्थितियों, वर्षों की सेवा, अर्जित अधिकारों और नौकरी पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव को सीधे और व्यापक तरीके से न्यायालय के सामने रख सकते हैं। यह विविध आवेदन 30 अगस्त को नई दिल्ली में शिक्षकों के देशव्यापी प्रदर्शन के बीच दाखिल किया गया।
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने शिक्षकों के अधिकारों को बनाया आधार
एसोसिएशन का कहना है कि मध्यप्रदेश शासन की पुनर्विचार याचिका और उसके द्वारा दाखिल विविध आवेदन में अंतर है। दोनों का उद्देश्य कुछ हद तक समान नजर आ सकता है, लेकिन प्रभावित शिक्षकों की स्थिति, नियुक्ति की वैधानिकता, नियुक्ति के समय हासिल पात्रता और बाद में लागू शिक्षक पात्रता परीक्षा के प्रावधानों के प्रभाव जैसे मुद्दों को शिक्षकों के नजरिए से विस्तार से उठाया गया है।
डीके सिंगौर के अनुसार एसोसिएशन शिक्षक पात्रता परीक्षा का विरोध नहीं कर रहा है। उसका कहना है कि उन शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, जिन्होंने नियुक्ति के समय लागू वैधानिक व्यवस्था के तहत पात्रता हासिल की और उसके आधार पर नियुक्त होकर वर्षों तक शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं।
एसोसिएशन ने सवाल उठाया है कि बाद में लागू की गई पात्रता व्यवस्था को उन शिक्षकों पर किस सीमा तक प्रभावी किया जा सकता है, जिनकी नियुक्ति उस समय लागू नियमों के तहत हुई थी। एसोसिएशन के अनुसार यही इस पूरे विवाद का प्रमुख कानूनी प्रश्न है।
एसोसिएशन का कहना है कि जिन शिक्षकों ने उस समय लागू व्यवस्था के तहत पात्रता प्राप्त कर नियुक्ति हासिल की और वर्षों तक अपने दायित्वों का निर्वहन किया, उनके मामलों को बाद में लागू पात्रता व्यवस्था के संदर्भ में अलग दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है।
एसोसिएशन के मुताबिक जनजातीय कार्य विभाग और शिक्षा विभाग के करीब 70 हजार शिक्षक इस कानूनी प्रयास से लाभान्वित हो सकते हैं, यदि सर्वोच्च न्यायालय प्रभावित शिक्षकों के पक्ष में उचित राहत प्रदान करता है।



