
नई दिल्ली, 28 अगस्त। नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा का असर कैलास मानसरोवर यात्रा पर भी पड़ा है। हादसे में कई भारतीय श्रद्धालुओं के प्रभावित होने की खबरों के बीच एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तीर्थस्थल या तीर्थयात्रा के दौरान हो जाए तो हिंदू धर्मशास्त्र और पुराण इसे किस दृष्टि से देखते हैं? क्या किसी पुण्यभूमि में प्राण त्यागने मात्र से मोक्ष प्राप्त हो जाता है?
धार्मिक परंपरा में तीर्थ को केवल दर्शन या यात्रा का स्थान नहीं माना गया है। ‘तीर्थ’ का भाव उस स्थान या साधना से जुड़ा है, जिसके माध्यम से मनुष्य सांसारिक बंधनों से पार जाने का प्रयास करता है। नदियों के किनारे बसे पवित्र स्थल, देवस्थान, पर्वत और प्राचीन धार्मिक नगर इसी वजह से तीर्थ माने गए हैं।
सिर्फ तीर्थ में मृत्यु को मोक्ष का आधार नहीं माना गया
शास्त्रीय परंपरा में तीर्थ में मृत्यु को विशेष पुण्य से जोड़ने वाली कई मान्यताएं मिलती हैं। लेकिन इसके साथ व्यक्ति के कर्म, जीवन के संस्कार और अंतिम समय के चित्त को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय में ईश्वर के स्मरण की महत्ता बताते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति अंत समय में ईश्वर का स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह परम स्वरूप को प्राप्त होता है।
इसके अगले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य अंतिम समय में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। यानी जीवनभर जिस भाव और संस्कार से उसका चित्त प्रभावित रहा है, उसका असर अंतिम समय में भी दिखाई देता है।
इससे यह समझ आता है कि गीता में मुक्ति का आधार केवल मृत्यु का स्थान नहीं है। अंतिम समय में मनुष्य का चित्त किस स्थिति में है, वह किसका स्मरण कर रहा है और उसका जीवन किस प्रकार के कर्मों से जुड़ा रहा है, इन सभी बातों को महत्व दिया गया है।
तीर्थ का वातावरण क्यों माना जाता है विशेष?
तीर्थयात्रा के दौरान व्यक्ति कुछ समय के लिए सामान्य सांसारिक जीवन से दूर होता है। पूजा, मंत्र-जप, स्नान, दान, दर्शन और साधना जैसी गतिविधियां उसके मन को आध्यात्मिक दिशा में ले जाती हैं।
इसी कारण धार्मिक दृष्टि से तीर्थयात्रा को केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं माना गया। इसे मन और चित्त को ईश्वर की ओर ले जाने वाली साधना के रूप में देखा गया है।
काशी को क्यों कहा जाता है ‘अविमुक्त क्षेत्र’?
तीर्थ में मृत्यु और मोक्ष की चर्चा हो तो काशी का नाम प्रमुखता से सामने आता है। काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में काशी की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
लोकमान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले व्यक्ति को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसी धार्मिक विश्वास के कारण सदियों से लोग जीवन के अंतिम समय में काशी में रहने की इच्छा रखते रहे हैं।
इतिहास में ‘करवत काशी’ जैसी कठोर प्रथाओं का भी उल्लेख मिलता है, जिनमें कुछ लोग मोक्ष की इच्छा से अपने प्राण तक त्याग देते थे। हालांकि आधुनिक दृष्टि से ऐसी प्रथाओं को धार्मिक आस्था के नाम पर आत्मघाती कृत्य माना जाता है।
केदार यात्रा के दौरान मृत्यु और शिवलोक की कथा
स्कंदपुराण में तीर्थयात्रा से जुड़ी एक कथा मिलती है, जिसमें साधक वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ का उल्लेख है। दोनों हिमालय में केदार की तीर्थयात्रा पर जाते हैं। इसी यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पर हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, उनका चित्त शुद्ध था और वे तीर्थयात्रा पर थे। इसलिए शिवगण उन्हें दिव्य विमान से कैलास ले गए। इस कथा में तीर्थयात्रा के दौरान देह त्याग को शिवलोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है।
गरुड़ पुराण में भी मिलता है तीर्थ में मृत्यु का उल्लेख
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में मृत्यु के बाद जीव की गति से जुड़े विभिन्न प्रसंग मिलते हैं। इसमें काशी में मृत्यु, धर्म की रक्षा के लिए प्राण त्यागने, योग करते हुए शरीर छोड़ने तथा पवित्र जल या पुण्य तीर्थभूमि में मृत्यु जैसे प्रसंगों का उल्लेख किया गया है।
इन प्रसंगों में पुण्यात्माओं की आगे की गति से संबंधित मार्ग का वर्णन मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपरा में पवित्र स्थान पर मृत्यु को सामान्य मृत्यु से अलग धार्मिक अर्थ दिया गया है।
महाभारत में भी कर्म को दिया गया विशेष महत्व
महाभारत में पांडवों की अंतिम यात्रा का प्रसंग कर्म के महत्व को स्पष्ट करता है। हिमालय की ओर अंतिम यात्रा के दौरान द्रौपदी और चारों भाई एक-एक करके गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन में रहे अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं।
इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में व्यक्ति की अंतिम गति केवल उस स्थान से तय नहीं होती, जहां उसकी मृत्यु हुई है। उसके कर्म और जीवन के संस्कार भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
प्रयाग और अयोध्या में देहत्याग की भी विशेष मान्यता
पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उससे जुड़े तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है। गंगा और यमुना से जुड़े तीर्थों में स्नान, तप और देहत्याग को विशेष धार्मिक फल से जोड़ा गया है। कुछ वर्णनों में पवित्र यमुना तट के तीर्थों में मृत्यु को पुनर्जन्म से मुक्ति की मान्यता से जोड़ा गया है।
इसी प्रकार स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को ‘स्वर्गद्वार’ से जोड़ा गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
तीर्थयात्रा को पर्यटन नहीं, साधना क्यों माना गया?
भारतीय परंपरा में तीर्थ का भाव ही संसार के बंधनों से पार जाने के प्रयास से जुड़ा है। पुराणों में तीर्थयात्रा के साथ स्नान, संयम, उपवास, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्ति से दूरी जैसे नियम बताए गए हैं।
इसी वजह से धार्मिक दृष्टि से तीर्थयात्रा को केवल पर्यटन नहीं माना गया। यह धार्मिक संकल्प के साथ की जाने वाली साधना है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के मन और आचरण को आध्यात्मिक दिशा देना है।
मोक्ष की मान्यता में स्थान के साथ कर्म और चित्त भी महत्वपूर्ण
तीर्थ में मृत्यु को लेकर मोक्ष की मान्यता का अर्थ यह नहीं है कि किसी पवित्र स्थान पर किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होते ही उसे निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त हो जाता है। शास्त्रीय दृष्टि में तीर्थ का महत्व जरूर है, लेकिन व्यक्ति के कर्म, जीवनभर के संस्कार और अंतिम समय की मानसिक अवस्था को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
यानी तीर्थ को ऐसी पुण्यभूमि माना गया है, जहां मनुष्य ईश्वर-स्मरण, वैराग्य और साधना के माध्यम से अपने चित्त को आध्यात्मिक दिशा दे सकता है। इसी संदर्भ में पुण्यभूमि में प्राण त्यागने को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति की धार्मिक मान्यता से जोड़ा गया है।



