
दुधवा के आकाश में प्रकृति के स्वच्छता-दूत
गिद्ध मिथक बनाम तथ्य
–रमेश कुमार
लखीमपुर खीरी : दुधवा में शनिवार, 5 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रत्येक वर्ष सितम्बर महीने के प्रथम शनिवार को मनाया जाता है। इस वर्ष दुधवा में मनाए जा रहे इस दिवस के अवसर पर दुधवा के आसपास पलिया क्षेत्रांतर्गत कई विद्यालयों के छात्र छात्राओं के साथ विभिन्न जागरूकता प्रतियोगिताओं, गिद्ध जागरूकता विषयक व्याख्यान, प्रस्तुतिकरण, प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किए जाने का आयोजन प्रावधानित है। इस वर्ष इस दिवस की विषय-वस्तु गिद्ध : मिथक बनाम तथ्य रखी गई है। हम यह जानते हैं कि प्रकृति में कुछ जीव ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य उनकी भूमिका को समझे बिना ही नकारात्मक दृष्टि से देखने लगता है। गिद्ध भी उन्हीं जीवों में शामिल हैं। किसी मृत पशु के शव पर झुंड में उतरते गिद्धों को देखकर सामान्यतः मन में घृणा, अशुभता या मृत्यु का विचार उत्पन्न हो सकता है, लेकिन पारिस्थितिकी की दृष्टि से यही दृश्य प्रकृति की अत्यंत महत्वपूर्ण सफाई व्यवस्था का हिस्सा है।
गिद्ध मृत जीवों को शीघ्रता से खाकर ऐसे जैविक पदार्थों को पर्यावरण से हटाते हैं, जो लंबे समय तक पड़े रहने पर रोगाणुओं, दुर्गंध और आवारा कुत्तों जैसे अन्य शवभक्षी जीवों की संख्या बढ़ाने में योगदान कर सकते हैं। इसीलिए गिद्धों को प्रकृति के ‘स्वच्छता-दूत’, ‘प्राकृतिक शव-निस्तारक’ और ‘पारिस्थितिक स्वास्थ्य के प्रहरी’ कहना अतिशयोक्ति नहीं है। गिद्ध सामान्य अर्थ में ऐसे बड़े शिकारी पक्षी हैं जिनकी प्रमुख विशेषता मृत जीवों के मांस पर निर्भर रहना है। अधिकांश गिद्धों का सिर और गर्दन अपेक्षाकृत कम पंखों वाले या नग्न होते हैं। शव के भीतर भोजन करते समय यह विशेषता उनके सिर को पंखों पर मांस और रक्त लगने से बचाने में सहायक होती है।
दुनिया में वर्तमान में 23 जीवित गिद्ध प्रजातियां मानी जाती हैं। इन्हें दो प्रमुख समूहों में रखा जाता है। पहला पुरानी दुनिया के गिद्ध यूरोप, एशिया और अफ्रीका में पाए जाते हैं। दूसरा नई दुनिया के गिद्ध उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका में पाए जाते हैं। दोनों समूहों के गिद्धों का विकास एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से हुआ है। समान भोजन और जीवन-शैली के कारण उनमें कई समान शारीरिक विशेषताएँ विकसित हुईं—इसे समानांतर/अभिसारी विकास का अच्छा उदाहरण माना जाता है। गिद्धों की दुनिया केवल भारत या एशिया तक सीमित नहीं है। अफ्रीका के विशाल सवाना से लेकर हिमालय की ऊंचाइयों और अमेरिका के एंडीज पर्वतों तक इनका विस्तार है।

पुरानी दुनिया के गिद्ध
एशिया, यूरोप और अफ्रीका में पाए जाने वाले गिद्धों में कई महत्वपूर्ण वंश शामिल हैं, जैसे-Neophron— Egyptian Vulture,-Sarcogyps— Red-headed Vulture, Aegypius— Cinereous Vulture, Gypaetus— Bearded Vulture, Torgos— Lappet-faced Vulture, Trigonoceps— White-headed Vulture, Necrosyrtes— Hooded Vulture आदि।
नई दुनिया के गिद्ध
अमेरिका में पाए जाने वाले प्रमुख गिद्धों में Turkey Vulture,, Black Vulture, Lesser Yellow-headed Vulture, Greater Yellow-headed Vulture, King Vulture, Andean Condor, California Condor शामिल हैं। California Condor और Andean Condor को सामान्य बोलचाल में गिद्धों की दुनिया का हिस्सा माना जाता है और वे आकार की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली पक्षी हैं।
भारत में वर्तमान में गिद्धों की नौ प्रजातियां दर्ज हैं। इनमें कुछ स्थायी निवासी हैं तो कुछ प्रवासी अथवा शीतकालीन आगंतुक हैं। भारत सरकार के अनुसार देश में नौ प्रजातियों का रिकॉर्ड उपलब्ध है। सफेद-पीठ वाला/ओरिएंटल व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध -Gyps bengalensis, भारतीय/लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध-Gyps indicus, पतली चोंच वाला गिद्ध-Gyps tenuirostris, हिमालयी ग्रिफॉन-Gyps himalayensis, मुख्यतः शीतकालीन आगंतुक, यूरेशियन ग्रिफॉन, शीतकालीन आगंतुक, लाल सिर वाला/किंग गिद्ध-Sarcogyps calvus, मिस्र का गिद्ध-Neophron percnopterus, सिनेरियस गिद्ध-Aegypius monachus शीतकालीन दाढ़ी वाला गिद्ध/लैमर्गायर-Gypaetus barbatus
हिमालयी क्षेत्र में भारत की नौ प्रजातियों में से सफेद-पीठ वाला, भारतीय और पतली चोंच वाला गिद्ध विशेष रूप से संकटग्रस्त हैं। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के गांवों, कस्बों और जंगलों के ऊपर गिद्धों के बड़े-बड़े झुंड सामान्य दृश्य थे। विशेषकर Gyps वंश के गिद्धों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें भारतीय परिदृश्य के सबसे सामान्य बड़े शवभक्षी पक्षियों में गिना जाता था लेकिन 1990 के दशक में इनके सामने ऐसा संकट आया जिसने पूरी दुनिया के संरक्षण वैज्ञानिकों को चिंतित कर दिया। पशुओं के उपचार में प्रयुक्त होने वाली डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) गिद्धों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई। उपचार के बाद जब ऐसे पशु मरते थे और उनके शव गिद्ध खाते थे, तो दवा का अवशेष गिद्धों के शरीर में पहुँच जाता था। इसके परिणामस्वरूप गुर्दे की विफलता और visceral gout जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई और बड़ी संख्या में गिद्ध मरने लगे।

भारत ने वर्ष 2006 में पशु-चिकित्सकीय उपयोग के लिए डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगाया। इसके साथ ही BNHS तथा अन्य संस्थाओं ने गिद्ध संरक्षण, सुरक्षित दवाओं और संरक्षण प्रजनन कार्यक्रमों पर काम तेज किया। गिद्धों के विषय में आम जनमानस में अनेक मिथक विद्यमान हैं। पहला मिथक है गिद्ध अशुभ पक्षी है, जबकि गिद्ध अशुभ नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वच्छता कर्मी है। जिस शव को मनुष्य गंदगी और संक्रमण का संभावित स्रोत मानता है, गिद्ध उसी शव को पारिस्थितिकी तंत्र से हटाने का काम करता है। गिद्ध का किसी शव को खाना मृत्यु का कारण नहीं है; वह मृत्यु के बाद प्रकृति की सफाई प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरा मिथक है गिद्ध रोग फैलाते हैं, जबकि स्वस्थ गिद्धों की पारिस्थितिक भूमिका इसके विपरीत है। गिद्ध शवों को तेजी से हटाकर खुले वातावरण में सड़ते जैविक पदार्थ की मात्रा कम करते हैं। उनके अत्यधिक अम्लीय पाचन तंत्र के कारण वे ऐसे सड़े-गले मांस को भी पचा सकते हैं जिसे अधिकांश अन्य जीव आसानी से नहीं खा सकते। अर्थात् गिद्ध रोग के वाहक मात्र नहीं, बल्कि कई परिस्थितियों में रोग-जोखिम कम करने वाली प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
तीसरा मिथक है गिद्ध केवल मरे हुए जानवरों का मांस खाने वाले ‘बेकार’ पक्षी हैं जबकि यही उनका सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक योगदान है। यदि किसी बड़े पशु का शव खुले वातावरण में पड़ा रहे तो वह—सड़ने लगेगा, दुर्गंध उत्पन्न करेगा, सूक्ष्मजीवों के लिए माध्यम बनेगा, अन्य शवभक्षी जीवों को आकर्षित करेगा, और मानव-बस्तियों के आसपास स्वच्छता संबंधी समस्याएँ बढ़ा सकता है। गिद्ध इस जैविक पदार्थ को बहुत कम समय में प्राकृतिक खाद्य-श्रृंखला में वापस ले जाते हैं। गिद्धों की ‘सफाई व्यवस्था’ भी अत्यंत वैज्ञानिक है। सभी गिद्ध एक ही प्रकार से शव नहीं खाते। विभिन्न प्रजातियों की चोंच, गर्दन और शरीर की संरचना उन्हें शव के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचने में सक्षम बनाती है। कुछ गिद्ध त्वचा और कठोर ऊतक खोलने में अधिक सक्षम होते हैं, जबकि अन्य अपेक्षाकृत नरम ऊतकों पर निर्भर रहते हैं।
इस प्रकार कई प्रजातियां एक ही शव पर एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर सकती हैं। यह प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है जिसमें—एक शव → अनेक शवभक्षी प्रजातियाँ → पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता है। उत्तर प्रदेश का दुधवा टाइगर रिजर्व तराई पारिस्थितिकी तंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ के विस्तृत साल वन, घासभूमियाँ, जलस्रोत, आर्द्र क्षेत्र और समृद्ध वन्यजीव समुदाय गिद्धों के लिए भी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराते हैं। दुधवा की विशेषता यह है कि यहां केवल स्थानीय निवासी गिद्ध ही नहीं, बल्कि प्रवासी/शीतकालीन गिद्ध भी दिखाई देते हैं।

2024 का महत्वपूर्ण सर्वेक्षण
वर्ष 2024 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान एवं उसके बफर क्षेत्र में किए गए एक क्षेत्रीय सर्वेक्षण में 300 से अधिक गिद्ध देखे गए। विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह रही कि भारत में दर्ज नौ प्रजातियों में से आठ प्रजातियाँ दुधवा और उसके बफर क्षेत्र में दर्ज की गईं। यूरेशियन ग्रिफॉन — Gyps fulvus, हिमालयी ग्रिफॉन — Gyps himalayensis, सफेद-पीठ वाला गिद्ध — Gyps bengalensis, सिनेरियस गिद्ध — Aegypius monachus, लाल सिर वाला गिद्ध — Sarcogyps calvus, मिस्र का गिद्ध — Neophron percnopterus, पतली चोंच वाला गिद्ध — Gyps tenuirostris, भारतीय गिद्ध — Gyps indicus यह तथ्य दुधवा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की नौ में से आठ प्रजातियों का एक ही परिदृश्य में मिलना इसकी पारिस्थितिक विविधता का महत्वपूर्ण संकेत है।
2024 के सर्वेक्षण के दौरान अलग-अलग स्थानों पर बड़ी संख्या में गिद्ध देखे गए। फर्सहिया क्षेत्र में 265, बेला खुर्द, बेला कलां एवं मझगई क्षेत्र में 75, तथा शारदा नदी के निकट रेलवे लाइन के आसपास 19 गिद्ध दर्ज किए गए थे। ये पक्षी मुख्यतः पशु शवों पर भोजन करते देखे गए। यह केवल पक्षियों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं था। यह दुधवा के जंगलों की उस प्राकृतिक क्षमता का संकेत था जिसमें शवभक्षी पक्षियों की पूरी पारिस्थितिक श्रृंखला अभी भी मौजूद है।
गिद्धों का संरक्षण केवल जंगल के भीतर नहीं किया जा सकता; उनके भोजन-स्रोत और जंगल से जुड़े आसपास के परिदृश्य को भी सुरक्षित रखना होगा। यदि किसी विषैले पदार्थ से मारा गया पशु या कुत्ता गिद्ध के भोजन में बदल जाता है, तो विषाक्तता खाद्य-श्रृंखला के माध्यम से गिद्ध तक पहुँच सकती है। एक गिद्ध की मृत्यु केवल एक पक्षी की मृत्यु नहीं। गिद्ध अपेक्षाकृत लंबे समय तक जीवित रहने वाले और धीमी गति से प्रजनन करने वाले पक्षी हैं। इसलिए किसी वयस्क गिद्ध की मृत्यु की भरपाई तेजी से नहीं होती। यही कारण है कि—एक ओर गिद्धों की संख्या बढ़ाने का प्रयास और दूसरी ओर विषाक्त शवों की उपलब्धता—दोनों एक साथ नहीं चल सकते। गिद्ध संरक्षण के लिए आवश्यक है कि—पशु चिकित्सा में गिद्ध-सुरक्षित दवाओं का प्रयोग हो, विषैले चारे का प्रयोग न हो, मृत पशुओं के शवों में विषाक्त पदार्थ न पहुँचें, कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग पर निगरानी हो, गिद्धों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहें, प्रमुख भोजन क्षेत्रों और विश्राम स्थलों की पहचान की जाए, गिद्धों के घोंसले एवं रोस्टिंग साइट सुरक्षित रखे जाएँ।

दुधवा में आठ गिद्ध प्रजातियों की उपस्थिति अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसे स्थायी संरक्षण परिणाम में बदलने के लिए दुधवा से जुड़े पूरे तराई परिदृश्य को ध्यान में रखना होगा। बाघ, तेंदुआ और अन्य बड़े मांसाहारी वन्यजीव जब किसी शिकार को खाते हैं तो उसके अवशेष जंगल में रह जाते हैं। इन अवशेषों पर कौए, सियार, जंगली कुत्ते, गिद्ध और अनेक छोटे जीव निर्भर हो सकते हैं। अर्थात्—बाघ जंगल का शिकारी है, जबकि गिद्ध मृत्यु के बाद उसी पारिस्थितिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाला सफाईकर्मी। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन दोनों मिलकर खाद्य-जाल को पूर्ण बनाते हैं। मनुष्य ने कचरे को संसाधित करने के लिए रीसाइक्लिंग प्लांट बनाए हैं। प्रकृति ने यह व्यवस्था करोड़ों वर्षों पहले ही बना दी थी। इस दृष्टि से गिद्ध मृत्यु और जीवन के बीच की कड़ी हैं। वे मृत्यु को समाप्ति नहीं बनने देते, वे उसे नए जीवन के लिए पोषक तत्वों में बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाते हैं।
गिद्ध प्रकृति का शायद सबसे बड़ा नैतिक पाठ भी हैं। मनुष्य जिसे ‘गंदा’ समझकर दूर हट जाता है, गिद्ध उसी कार्य को बिना किसी भेदभाव के पूरा करता है। वह न फूल चाहता है, न फल, न मनुष्य की प्रशंसा, न किसी पुरस्कार की अपेक्षा। उसका कार्य है—जो प्रकृति के लिए अनुपयोगी दिखाई देता है, उसे पुनः प्रकृति के चक्र में लौटा देना। इसीलिए गिद्धों को केवल ‘शवभक्षी पक्षी’ कह देना उनके अस्तित्व को बहुत छोटा कर देना होगा। वे—स्वच्छता के प्रहरी हैं।पारिस्थितिक संतुलन के प्रहरी हैं।जैविक पुनर्चक्रण के प्रहरी हैं। और स्वस्थ पर्यावरण के संकेतक भी हैं। मिथक को बदलना होगा। गिद्ध को अशुभ मानने की हमारी धारणा प्रकृति के वास्तविक विज्ञान से मेल नहीं खाती। जिस दिन किसी क्षेत्र के आकाश से गिद्ध अचानक गायब होने लगें, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि अब वहाँ ‘अशुभ पक्षी’ कम हो गए हैं। हमें चिंतित होकर यह पूछना चाहिए—हमारे पर्यावरण में ऐसा क्या बदल गया है कि प्रकृति का सबसे कुशल शव-सफाईकर्मी वहाँ दिखाई नहीं दे रहा?
भारत ने डाइक्लोफेनाक संकट के बाद गिद्ध संरक्षण में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और संरक्षण प्रजनन कार्यक्रमों ने आशा जगाई है। गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्रों में हजारों की संख्या में संरक्षण प्रयास जारी हैं और गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा पर भी काम हो रहा है। दुधवा में आठ गिद्ध प्रजातियों की उपस्थिति और सैकड़ों गिद्धों का रिकॉर्ड एक आशाजनक संकेत है; इसलिए आज आवश्यकता केवल गिद्धों को बचाने की नहीं, बल्कि गिद्धों के लिए सुरक्षित पूरा पारिस्थितिक परिदृश्य बनाने की है। और शायद गिद्धों के बारे में सबसे सुंदर सत्य यही है— जिस पक्षी को हमने सदियों तक मृत्यु का प्रतीक समझा, वह वास्तव में प्रकृति के जीवन-चक्र को निरंतर चलाए रखने वाला प्रहरी है। गिद्ध मृत्यु के साथी नहीं, मृत्यु के बाद प्रकृति में जीवन की पुनर्स्थापना के दूत हैं।



