कित्तूर की रानी चेन्नम्मा की जयंती पर उनसे जुड़ी ख़ास बातें

नई दिल्ली ( दस्तक विशेष) : कित्तूर की अदम्य वीरांगना रानी चेन्नम्मा एक ऐसा ही देदीप्यमान ध्रुवतारा हैं, जिनका नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह गाथा केवल एक छोटे से भूभाग की रक्षा के लिए लड़े गए युद्ध का विवरण नहीं, बल्कि अखंड नारी-तेज और चट्टानी संकल्प का महाकाव्य है। 1824 में, 1857 के महासंग्राम से लगभग तीन दशक पहले, रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों को चुनौती देकर अपने राज्य की संप्रभुता की रक्षा का बीड़ा उठाया। उस दौर में कंपनी सैन्य शक्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप के सहारे भारतीय रियासतों पर अपना प्रभुत्व बढ़ा रही थी।
रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1778 को वर्तमान कर्नाटक के बेलगावी जिले के काकती गांव में हुआ था। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ, जब दक्षिण भारत का राजनीतिक परिदृश्य अनेक क्षेत्रीय शक्तियों, मराठा प्रभाव, मैसूर राज्य और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच बदलते संबंधों से प्रभावित था। स्थानीय शासकों के सामने अपनी सत्ता और क्षेत्रीय स्वतंत्रता बनाए रखने की चुनौती लगातार बढ़ रही थी। चेन्नम्मा का बचपन ग्रामीण परिवेश और कन्नड़ सांस्कृतिक परंपराओं के बीच बीता। उनके व्यक्तित्व के विकास में उस समय की वीरता, आत्मसम्मान और सामाजिक मूल्यों की परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान रहा। ऐतिहासिक विवरणों में उनके घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कला के प्रशिक्षण का उल्लेख मिलता है।

उत्तराधिकार का संकट : राज्य की संप्रभुता का प्रश्न
रानी चेन्नम्मा के संघर्ष का तत्कालीन कारण कित्तूर के उत्तराधिकार से जुड़ा विवाद था। उनके पुत्र की मृत्यु के बाद राज्य के भविष्य को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हुई। ऐसी परिस्थिति में शिवलिंगप्पा को उत्तराधिकारी के रूप में अपनाया गया। रानी का पक्ष था कि राज्य की परंपराओं और अधिकारों के अनुसार उत्तराधिकारी निर्धारित करने का निर्णय कित्तूर का अपना मामला है। लेकिन अंग्रेजी कंपनी के अधिकारियों ने इस उत्तराधिकार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कित्तूर के शासन और उत्तराधिकारी के प्रश्न पर अपना हस्तक्षेप बढ़ाया। इस असहमति ने रानी और कंपनी के बीच राजनीतिक तनाव को गहरा कर दिया। यहां एक ऐतिहासिक तथ्य को स्पष्ट करना आवश्यक है। रानी चेन्नम्मा का संघर्ष 1824 में हुआ था, जबकि अंग्रेजों की चर्चित ‘व्यपगत नीति’ यानी Doctrine of Lapse को लॉर्ड डलहौजी ने 1848 के बाद व्यवस्थित रूप से अपनाया। इसलिए चेन्नम्मा के संघर्ष को डलहौजी की नीति का प्रत्यक्ष परिणाम कहना कालक्रम की दृष्टि से सही नहीं होगा। हालांकि दोनों प्रसंगों में भारतीय रियासतों के उत्तराधिकार और स्वतंत्रता पर अंग्रेजी हस्तक्षेप का व्यापक संदर्भ अवश्य दिखाई देता है। रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों के दबाव के आगे झुकने के बजाय अपने निर्णय पर दृढ़ता दिखाई। उन्होंने राज्य की परंपराओं, अधिकारों और स्वतंत्र शासन व्यवस्था की रक्षा को सर्वोपरि रखा। इसी असहमति ने आगे चलकर सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण कर लिया।

अक्टूबर 1824 में कित्तूर और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच राजनीतिक विवाद युद्ध में बदल गया। कंपनी के अधिकारी कित्तूर पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे, जबकि रानी चेन्नम्मा राज्य की स्वतंत्रता को किसी भी कीमत पर बचाने के लिए तैयार थीं। युद्ध की परिस्थितियों में रानी ने सैनिकों का नेतृत्व किया और अंग्रेजी सेना का सामना करने का निर्णय लिया। यह कदम उस समय के राजनीतिक वातावरण में असाधारण था। एक महिला शासक का सैन्य मोर्चे पर नेतृत्व करना और एक शक्तिशाली औपनिवेशिक कंपनी को चुनौती देना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण था। कित्तूर के सैनिकों ने साहस और रणनीतिक कौशल के साथ अंग्रेजी सेना का सामना किया। युद्ध के दौरान अंग्रेजों को भारी चुनौती मिली। कंपनी के अधिकारी सेंट जॉन थैकरे की मृत्यु इस संघर्ष की एक प्रमुख घटना थी। अंग्रेजी सेना को मिली इस पराजय ने कंपनी के अधिकारियों को यह एहसास कराया कि कित्तूर को आसानी से अधीन नहीं किया जा सकता। पहले युद्ध में कित्तूर की विजय ने रानी चेन्नम्मा की प्रतिष्ठा को व्यापक बनाया। उनके नेतृत्व में सैनिकों और स्थानीय लोगों ने यह दिखाया कि संगठित प्रतिरोध के सामने औपनिवेशिक सत्ता को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इस विजय का महत्व केवल सैन्य सफलता तक सीमित नहीं था। यह भारतीय रियासतों के राजनीतिक अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए उठाए गए साहसी कदम का प्रतीक बन गई। रानी चेन्नम्मा ने यह संदेश दिया कि राज्य की स्वतंत्रता और जनता के सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करना शासक का मूल दायित्व है।
पहले युद्ध में मिली पराजय के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने कित्तूर पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने की तैयारी की। कंपनी की सैन्य शक्ति कित्तूर की तुलना में कहीं अधिक व्यापक थी। उसने अपने संसाधनों और सैनिकों को संगठित करके रियासत पर दूसरा अभियान चलाया। इस बार कित्तूर की परिस्थितियां पहले जैसी नहीं थीं। राज्य के भीतर राजनीतिक मतभेद, विश्वासघात और सैन्य दबाव ने रानी की स्थिति को कमजोर किया। अंग्रेजों ने कित्तूर की घेराबंदी की और लगातार सैन्य कार्रवाई के माध्यम से राज्य की रक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। रानी चेन्नम्मा और उनके सैनिकों ने प्रतिरोध जारी रखा, लेकिन कंपनी की विशाल सैन्य शक्ति और बदलती परिस्थितियों के सामने कित्तूर अधिक समय तक टिक नहीं सका। दिसंबर 1824 में अंग्रेजों ने कित्तूर पर कब्जा कर लिया। रानी चेन्नम्मा को गिरफ्तार कर लिया गया और राज्य की स्वतंत्र शासन व्यवस्था समाप्त हो गई। कित्तूर का पतन रानी के सैन्य संघर्ष का अंत था, लेकिन उनके साहस की कहानी का नहीं। उन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए जिस दृढ़ता का परिचय दिया, वह पराजय के बाद भी उनके व्यक्तित्व की पहचान बनी रही। इतिहास में कुछ संघर्ष परिणाम से नहीं, बल्कि उस उद्देश्य और साहस से याद किए जाते हैं, जिसके लिए वे लड़े गए हों। कित्तूर की लड़ाई इसी श्रेणी में आती है।

कित्तूर पर अंग्रेजों का कब्जा होने के बाद रानी चेन्नम्मा को बेलहोंगल किले में कैद रखा गया। एक समय राज्य की सत्ता संभालने वाली रानी अब औपनिवेशिक शासन की बंदी थीं। उनके जीवन का यह अंतिम चरण राजनीतिक पराजय और व्यक्तिगत पीड़ा से भरा था। 21 फरवरी 1829 को बेलहोंगल में उनका निधन हो गया। इस प्रकार एक ऐसी वीरांगना की जीवन यात्रा समाप्त हुई, जिसने अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष किया था। उनकी मृत्यु के बाद भी कित्तूर और आसपास के क्षेत्रों में प्रतिरोध की भावना समाप्त नहीं हुई। उनके संघर्ष से प्रेरित होकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष और स्वतंत्रता की चेतना आगे भी बनी रही। कित्तूर के सेनानायक संगोली रायन्ना ने बाद के वर्षों में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। रानी चेन्नम्मा और रायन्ना की स्मृतियां स्थानीय जनमानस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, हालांकि उनके संघर्ष के अलग-अलग चरणों और ऐतिहासिक भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
रानी चेन्नम्मा के जीवन और संघर्ष का मूल्यांकन केवल एक रियासत की सैन्य पराजय या विजय के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका प्रतिरोध उस दौर में सामने आया, जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय राज्यों के राजनीतिक अधिकारों को सीमित करने में लगी थी। उन्होंने अपने राज्य की स्वायत्तता और उत्तराधिकार के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उनकी वीरता का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला नेतृत्व है। उन्होंने उस समय सैन्य और राजनीतिक जिम्मेदारियां संभालीं, जब सार्वजनिक सत्ता के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी। उनका नेतृत्व इस धारणा को चुनौती देता है कि युद्ध, राजनीति और राज्य संचालन केवल पुरुषों के क्षेत्र हैं। हालांकि रानी चेन्नम्मा का संघर्ष आधुनिक अर्थों में पूरे भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र कराने का संगठित आंदोलन नहीं था। वह मुख्य रूप से कित्तूर की संप्रभुता, राजपरिवार के अधिकारों और अंग्रेजी हस्तक्षेप के विरोध से जुड़ा था। फिर भी उनके प्रतिरोध को भारतीय औपनिवेशिक विरोध के व्यापक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्होंने अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों में स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष किया, जिसने बाद के प्रतिरोधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने में सहायता की। 1857 के व्यापक विद्रोह से कई दशक पहले रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजी कंपनी की सत्ता को चुनौती दी थी। इस दृष्टि से उनका संघर्ष भारतीय इतिहास में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध शुरुआती सशस्त्र प्रतिरोधों में से एक है। उनकी कहानी यह भी बताती है कि अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष और संघर्ष केवल कुछ बड़े केंद्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और रियासतों में अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार विकसित हो रहा था।



