भारत में अपनी मिसाइलों का परीक्षण क्यों करना चाहता है जापान? टाइप-25 से ड्रोन सिस्टम तक, जानिए क्या है पूरी योजना

नई दिल्ली: जापान अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के लिए भारत में मिसाइल परीक्षण की संभावनाएं तलाश रहा है। जापानी ग्राउंड सेल्फ-डिफेंस फोर्स (GSDF) के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मसायोशी अराई के मुताबिक, जापानी अधिकारियों की एक टीम भारत भेजी गई थी। इस दौरे का उद्देश्य यह पता लगाना था कि टाइप-25 एंटी-शिप मिसाइल जैसी लंबी दूरी के हथियारों का परीक्षण भारतीय परीक्षण स्थलों पर किस तरह किया जा सकता है।
इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 1,000 किलोमीटर बताई गई है। जापान में घनी आबादी और सीमित परीक्षण क्षेत्रों के कारण इतनी लंबी दूरी की मिसाइल का पूरा परीक्षण करना चुनौतीपूर्ण है। इसी वजह से जापान विदेशों में उपलब्ध सैन्य परीक्षण सुविधाओं का इस्तेमाल करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है। अधिकारियों ने इस महीने की शुरुआत में भारत के कई संभावित स्थलों का निरीक्षण किया और करीब एक सप्ताह तक परीक्षण से जुड़ी संभावनाओं का आकलन किया। चर्चा में छोटे हमलावर ड्रोन के परीक्षण का विकल्प भी शामिल रहा।
टाइप-25 मिसाइल का परीक्षण जापान के लिए क्यों मुश्किल?
टाइप-25 एंटी-शिप मिसाइल जापान की समुद्री रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की योजना का अहम हिस्सा है। लंबी दूरी तक मार करने वाली इस मिसाइल का प्रभावी परीक्षण करने के लिए बड़े, सुरक्षित और पर्याप्त दूरी वाले क्षेत्र की जरूरत होती है। जापान में घनी आबादी और सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों के कारण ऐसे परीक्षण करना आसान नहीं है।
जनरल मसायोशी अराई के अनुसार, जापान अपने घरेलू परीक्षण और प्रशिक्षण वातावरण को बेहतर बनाने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर विदेशी परीक्षण स्थलों के इस्तेमाल की संभावनाएं भी तलाश रहा है। भारत के विशाल भूभाग और उपलब्ध परीक्षण सुविधाओं के कारण यहां लंबी दूरी के हथियारों के परीक्षण का विकल्प उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, भारत में जापानी मिसाइलों के परीक्षण को लेकर अंतिम फैसला और किसी औपचारिक समझौते की स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है। फिलहाल अधिकारियों का ध्यान संभावित स्थलों की उपयुक्तता और परीक्षण संबंधी जरूरतों का आकलन करने पर है।
मिसाइलों के साथ छोटे हमलावर ड्रोन पर भी नजर
जापान की योजना केवल लंबी दूरी की मिसाइलों तक सीमित नहीं है। वह बिना चालक वाले हवाई, सतही और पानी के भीतर चलने वाले वाहनों की मदद से अपनी तटीय रक्षा व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है। इसके लिए सिंक्रोनाइज्ड, हाइब्रिड, इंटीग्रेटेड एंड एनहांस्ड लिटोरल डिफेंस यानी SHIELD प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
इस व्यवस्था में निगरानी करने वाले और हमला करने में सक्षम ड्रोन शामिल हो सकते हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी से हमला करने वाली स्टैंडऑफ मिसाइलों के साथ तालमेल बनाकर किया जा सकता है। इसका उद्देश्य तटीय क्षेत्रों की निगरानी और रक्षा के लिए कई तरह की तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करना है।
जापान में छोटे हमलावर ड्रोन का परीक्षण भी कुछ व्यावहारिक चुनौतियों से जुड़ा है। ड्रोन के संचालन के दौरान रेडियो फ्रीक्वेंसी के इस्तेमाल से नागरिक संचार सेवाओं, टेलीविजन प्रसारण और स्मार्टफोन नेटवर्क पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा सुरक्षा नियमों और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय की जरूरत भी होती है।
ऐसे में विदेशों में बड़े परीक्षण क्षेत्रों का इस्तेमाल जापान के लिए एक विकल्प बन सकता है। भारत में संभावित परीक्षण स्थलों का निरीक्षण इसी व्यापक जरूरत से जुड़ा माना जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में भी परीक्षण सुविधाएं तलाश रहा जापान
भारत के अलावा जापान ऑस्ट्रेलिया में भी मिसाइल परीक्षण की सुविधाओं तक बेहतर पहुंच हासिल करने की कोशिश कर रहा है। अगस्त में जापान के रक्षा मंत्री शिन्जिरो कोइजुमी और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के बीच हुई बैठक में जापानी सैन्य बलों को ऑस्ट्रेलियाई परीक्षण क्षेत्रों तक पहुंच देने के मुद्दे पर चर्चा हुई थी।
जापान ने 2023 में ऑस्ट्रेलिया में सैन्य अभ्यास के दौरान पहली बार एंटी-शिप मिसाइल दागी थी। इसके बाद पिछले साल भी वहां अधिक जटिल मिसाइल प्रक्षेपण किया गया था। जापान की ओर से हाइपरसोनिक सहित लंबी दूरी की मिसाइलों के परीक्षण के लिए ऑस्ट्रेलिया में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई है।
ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग का उद्देश्य जापान को ऐसे परीक्षण क्षेत्र उपलब्ध कराना है, जहां लंबी दूरी के हथियारों की क्षमताओं का ज्यादा व्यापक आकलन किया जा सके। भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ संभावित सहयोग जापान की रक्षा तैयारियों में बाहरी संसाधनों की भूमिका को भी दर्शाता है।
चीन और उत्तर कोरिया की गतिविधियों के बीच रक्षा तैयारियां तेज
जापान अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने के लिए ऐसे समय में प्रयास कर रहा है, जब पूर्वी एशिया में सुरक्षा चुनौतियां उसके लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के बीच जापान लंबी दूरी के हथियारों और आधुनिक ड्रोन प्रणालियों पर ध्यान दे रहा है।
जापान की रक्षा रणनीति में लंबी दूरी की मिसाइलों को संभावित खतरों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के एक माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। इसके साथ ही निगरानी, टोही और मानवरहित प्रणालियों को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
इन हथियारों का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए केवल उनका निर्माण पर्याप्त नहीं है। उनकी मारक क्षमता, सटीकता, संचालन और विभिन्न परिस्थितियों में प्रदर्शन का परीक्षण भी जरूरी है। जापान के घरेलू क्षेत्रों में मौजूद सीमाओं के कारण विदेशी परीक्षण स्थलों तक पहुंच उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत-जापान रक्षा सहयोग को मिल सकता है नया आयाम
भारत में जापानी मिसाइलों और ड्रोन प्रणालियों के परीक्षण की संभावनाएं दोनों देशों के रक्षा सहयोग के लिए एक नया अवसर बन सकती हैं। हालांकि, इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए परीक्षण स्थलों की उपलब्धता, सुरक्षा नियमों, तकनीकी जरूरतों और द्विपक्षीय सहमति जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा।
यदि योजना को मंजूरी मिलती है, तो जापान को लंबी दूरी की मिसाइलों और आधुनिक मानवरहित प्रणालियों के परीक्षण के लिए अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं। भारत के लिए भी यह रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का अवसर हो सकता है।
फिलहाल इस मामले में अंतिम निर्णय और संभावित समझौते की शर्तों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और जापान परीक्षण सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर किस तरह की व्यवस्था पर सहमत होते हैं। फिलहाल जापानी अधिकारियों का भारत दौरा इस बात का संकेत है कि टोक्यो अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है।



