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किराएदार बनकर रचा 18 करोड़ का खेल! जीजा-साले ने विधवा महिला के फ्लैट हड़पकर लिया करोड़ों का लोन, 10 साल बाद खुली परतें

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के विवेक विहार इलाके से धोखाधड़ी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने संपत्ति मालिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि दो शातिर ठगों ने एक विधवा महिला के फ्लैट किराए पर लिए, फिर फर्जी दस्तावेज तैयार कर संपत्ति अपने नाम करा ली और उसके आधार पर करीब 18 करोड़ रुपये का बैंक लोन हासिल कर लिया। मामले की जांच कर रही आर्थिक अपराध शाखा ने इस प्रकरण में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि मुख्य साजिशकर्ता अब भी फरार बताया जा रहा है।

किराएदार बनकर हासिल की संपत्ति की पूरी जानकारी

जानकारी के अनुसार मामला जून 2012 का है। विवेक विहार निवासी 55 वर्षीय उषा रानी सेठी ने हाल ही में खरीदे गए अपने फ्लैट किराए पर देने के लिए उपलब्ध कराए थे। इसी दौरान सचिन और संजय नाम के दो व्यक्ति उनके संपर्क में आए और तत्काल फ्लैट किराए पर लेने की इच्छा जताई।

सचिन ने खुद को एक मेटल ट्रेडिंग कंपनी का मालिक बताया, जबकि संजय को अपना सहयोगी बताया। इसके बाद दूसरी मंजिल का फ्लैट 47 हजार रुपये मासिक किराए पर और तीसरी मंजिल का फ्लैट 17 हजार रुपये मासिक किराए पर लिया गया। दोनों किरायेदारी समझौते विधिवत पंजीकृत भी कराए गए। कुछ समय बाद दोनों फ्लैट खाली कर चले गए।

एक साल बाद सामने आया चौंकाने वाला सच

अप्रैल 2013 में अचानक दो वकील उषा रानी के घर पहुंचे और उन्हें बताया कि उनके फ्लैट के नाम पर बैंक से लिया गया ऋण बकाया है। यह जानकारी सुनकर महिला हैरान रह गईं। उन्होंने तुरंत पुलिस से संपर्क किया और मामले की जांच शुरू हुई।

शुरुआती तौर पर मामला 70 लाख रुपये के ऋण का लगा, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर खुलासा हुआ कि विभिन्न कंपनियों के माध्यम से करीब 18 करोड़ रुपये का लोन और ओवरड्राफ्ट हासिल किया गया था।

फर्जी पहचान बनाकर कराया गया संपत्ति हस्तांतरण

जांच में सामने आया कि आरोपियों ने बेहद सुनियोजित तरीके से पूरी साजिश को अंजाम दिया। पुलिस के अनुसार आरोपियों ने उषा रानी सेठी नाम की ही एक अन्य महिला के दस्तावेज जुटाए और एक अज्ञात महिला को वास्तविक मालिक बनाकर प्रस्तुत किया।

बताया गया कि संबंधित महिला को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय भेजा गया, जहां उसने संपत्ति संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए और तस्वीरें भी खिंचवाईं। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों और कथित जाली हस्ताक्षरों के जरिए फ्लैट का मालिकाना हक आरोपी सचिन के नाम स्थानांतरित करा लिया गया।

संपत्ति अपने नाम होते ही लिया 18 करोड़ का ऋण

मालिकाना हक हासिल करने के बाद सचिन और उसके जीजा संजीव दीक्षित ने अपनी कंपनी के नाम पर बैंक से करोड़ों रुपये का ऋण और ओवरड्राफ्ट प्राप्त किया। जांच एजेंसियों के मुताबिक यह राशि कई कथित फर्जी कंपनियों के खातों में स्थानांतरित की गई और बाद में नकदी के रूप में निकाल ली गई।

10 साल बाद फिर खुली जांच की फाइल

जब मामला लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रहा, तब आर्थिक अपराध शाखा ने पुराने दस्तावेजों और रिकॉर्ड की दोबारा जांच शुरू की। इसी दौरान संजीव दीक्षित की भूमिका सामने आई।

जांच में पता चला कि संजीव दीक्षित के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। वह पूर्व में भी धोखाधड़ी के मामलों में जांच एजेंसियों के रडार पर रह चुका है। बताया जाता है कि एक मामले में गिरफ्तारी के बाद वह पुलिस हिरासत से फरार भी हो गया था।

जेल से दोबारा गिरफ्तार, मुख्य आरोपी अब भी फरार

आर्थिक अपराध शाखा ने 25 जून को कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद संजीव दीक्षित को इस मामले में दोबारा गिरफ्तार कर लिया। वह पहले से जेल में बंद था। वहीं इस पूरे कथित षड्यंत्र का मुख्य आरोपी सचिन अभी भी फरार है। पुलिस उसकी तलाश में लगातार छापेमारी कर रही है और मामले की जांच जारी है।

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