ईरान का सस्ता तेल भारत के लिए अवसर? अमेरिकी राहत के बाद बढ़ी हलचल, खरीदारों की तलाश में करोड़ों बैरल कच्चा तेल

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में आई नरमी का असर अब वैश्विक तेल बाजार में साफ दिखाई देने लगा है। दोनों देशों के बीच शांति वार्ता आगे बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री गतिविधियां सामान्य होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी दर्ज की गई है। इसी बीच अमेरिका द्वारा ईरान को दी गई अस्थायी राहत ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर दी हैं।
अमेरिका ने ईरान को 21 अगस्त 2026 तक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की सीमित अनुमति दी है। करीब आठ वर्षों बाद मिली इस राहत के बाद ईरान वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में जुट गया है। इसके लिए भारतीय, जापानी और दक्षिण कोरियाई रिफाइनरियों से संपर्क साधा जा रहा है, ताकि लंबे समय से समुद्र में खड़े तेल टैंकरों के लिए खरीदार तलाशे जा सकें।
समुद्र में फंसे हैं 6.8 करोड़ बैरल तेल
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 22 जून तक समुद्र में लगभग 6.8 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल और कंडेनसेट मौजूद था। इनमें से करीब 85 फीसदी खेपों का कोई तय गंतव्य नहीं है। ऐसे में ईरान नए बाजारों की तलाश में है और भारत उसकी प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है।
भारतीय तटों के करीब मौजूद इन टैंकरों से आपूर्ति करना अपेक्षाकृत आसान और कम लागत वाला विकल्प साबित हो सकता है, जिससे भारतीय कंपनियों को सस्ता तेल मिलने की संभावना बनती है।
दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में शामिल है ईरान
करीब 209 अरब बैरल के अनुमानित तेल भंडार के साथ ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में गिना जाता है। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते उसका निर्यात लंबे समय तक सीमित बाजारों, खासकर चीन, पर निर्भर रहा। अब प्रतिबंधों में मिली ढील के बाद तेहरान अपने निर्यात नेटवर्क का विस्तार करने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए फिलहाल आसान नहीं फैसला
हालांकि भारत के लिए ईरानी तेल की खरीद तुरंत बढ़ाना आसान नहीं माना जा रहा। होर्मुज संकट के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की व्यवस्था कर ली थी। रूस से लगातार तेल आयात जारी है, जबकि अमेरिका और वेनेजुएला से भी पर्याप्त आपूर्ति हो रही है।
ऐसे में भारतीय कंपनियों को फिलहाल अपने मौजूदा आपूर्ति स्रोतों में बड़ा बदलाव करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है।
60 दिन की राहत से बनी हुई है अनिश्चितता
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राहत केवल 60 दिनों के लिए है, जिससे खरीदारों के बीच अनिश्चितता बनी हुई है। इसके अलावा यूरोपीय संघ और ब्रिटेन अभी भी ईरानी तेल पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इसके कारण बीमा, वित्तीय लेनदेन और शिपिंग से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ रही हैं।
कई अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह ऐसे जहाजों को स्वीकार करने में भी हिचकिचा रहे हैं, जो प्रतिबंधों के दौरान कथित तौर पर ‘डार्क फ्लीट’ नेटवर्क का हिस्सा रहे हैं।
आकर्षक छूट मिलने पर बदल सकती है तस्वीर
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि चीन के अलावा अन्य देशों द्वारा ईरानी तेल की खरीद में फिलहाल बड़े उछाल की संभावना कम दिखाई देती है। अधिकांश रिफाइनरियां दो से तीन महीने पहले ही अपनी आयात योजनाएं तय कर चुकी हैं और अगस्त तक की जरूरतों के लिए अनुबंध पहले से किए जा चुके हैं।
हालांकि यदि ईरान प्रतिस्पर्धी कीमतों और अतिरिक्त छूट की पेशकश करता है, तो भारतीय कंपनियां इस अवसर का लाभ उठाने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल करोड़ों बैरल कच्चे तेल से भरे ईरानी टैंकर खरीदारों की तलाश में समुद्र में इंतजार कर रहे हैं।



