एक थप्पड़ ने छीन ली हीरोइन की पहचान, फिर बनीं ऐसी ‘मंथरा’ कि घर-घर में हो गईं अमर

नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं, जिनका संघर्ष उनकी सफलता से भी बड़ा बन गया। ऐसी ही एक कहानी है दिग्गज अभिनेत्री ललिता पवार की, जिन्होंने एक दर्दनाक हादसे के बाद अपनी जिंदगी को नए सिरे से गढ़ा और अभिनय की दुनिया में अमिट छाप छोड़ दी।
एक दौर था जब ललिता पवार हिंदी फिल्मों की खूबसूरत और लोकप्रिय नायिकाओं में गिनी जाती थीं। लेकिन वर्ष 1942 में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई घटना ने उनके करियर की दिशा पूरी तरह बदल दी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और बाद में ऐसे किरदार निभाए कि दर्शक उन्हें कभी भूल नहीं सके।
शूटिंग के दौरान हुआ था दर्दनाक हादसा
वर्ष 1942 में फिल्म ‘जंग-ए-आजादी’ की शूटिंग चल रही थी। इस फिल्म में ललिता पवार मुख्य भूमिका में थीं और उनके साथ अभिनेता भगवान दादा काम कर रहे थे।
एक दृश्य में भगवान दादा को ललिता पवार को थप्पड़ मारना था। बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान थप्पड़ इतनी जोर से लगा कि वह जमीन पर गिर पड़ीं। उनकी हालत बिगड़ने पर तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने चेहरे की नस प्रभावित होने की जानकारी दी।
चेहरे पर पड़ा लकवे का असर, बदल गई जिंदगी
इलाज के दौरान स्थिति और गंभीर हो गई। लंबे समय तक अस्पताल में रहने के बाद जब वह सामान्य जीवन में लौटीं तो उनके चेहरे के बाईं ओर लकवे का प्रभाव दिखाई देने लगा। उनकी एक आंख सिकुड़ गई और चेहरे की बनावट भी बदल गई।
उस समय फिल्म उद्योग में नायिकाओं के लिए सुंदरता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था। ऐसे में इस हादसे ने उनके मुख्य अभिनेत्री बनने के सफर को लगभग रोक दिया।
हार नहीं मानी, चरित्र भूमिकाओं से बनाई नई पहचान
करीब तीन साल तक इलाज और संघर्ष के बाद ललिता पवार ने फिल्मों में वापसी की। हालांकि अब उन्हें नायिका के किरदार नहीं मिल रहे थे, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय खुद को नए किरदारों के अनुरूप ढाल लिया।
उन्होंने मां, बहन, चाची और सास जैसी भूमिकाएं निभानी शुरू कीं। धीरे-धीरे उनकी अभिनय क्षमता और प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें अलग पहचान दिला दी।
खलनायिका और सास के किरदारों में बनीं बेजोड़
समय के साथ उनकी सिकुड़ी हुई आंख और सख्त चेहरे के भाव नकारात्मक किरदारों के लिए उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए। देखते ही देखते वह हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित खलनायिकाओं और सास के किरदारों का पर्याय बन गईं।
उनकी सबसे यादगार भूमिका टीवी धारावाहिक रामायण में निभाया गया ‘मंथरा’ का किरदार रहा। इस भूमिका ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई और आज भी लोग उन्हें इसी किरदार के लिए याद करते हैं।
700 से ज्यादा फिल्मों में किया अभिनय
व्यक्तिगत जीवन में भी ललिता पवार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने आत्मविश्वास और काम के प्रति समर्पण को कभी कम नहीं होने दिया।
अपने लंबे करियर में उन्होंने हिंदी, मराठी और गुजराती भाषाओं की 700 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। अभिनय जगत में उनके योगदान को देखते हुए उनके नाम सबसे लंबे अभिनय करियर का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया।
संघर्ष की मिसाल बन गईं ललिता पवार
24 फरवरी 1998 को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद ललिता पवार का निधन हो गया। हालांकि वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, साहस और अभिनय आज भी प्रेरणा देता है।
उनकी कहानी यह संदेश देती है कि जीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी मुश्किल भी इंसान की मंजिल नहीं रोक सकती, यदि उसके भीतर आगे बढ़ने का हौसला और खुद को फिर से स्थापित करने का जज्बा मौजूद हो।



