MP में UCC लागू करने की तैयारी पूरी! शादी, तलाक, लिव-इन और संपत्ति के नियम बदलेंगे, जानिए ड्राफ्ट बिल की बड़ी बातें

भोपाल: मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता के ड्राफ्ट बिल को मंजूरी दे दी है। सोमवार को इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया गया। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार उपलब्ध कराना है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश भी उन राज्यों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जहां यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।
यूसीसी को लेकर लंबे समय से देशभर में चर्चा होती रही है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि समान नागरिक संहिता क्या है, संविधान इस पर क्या कहता है, इसका इतिहास क्या रहा है, मध्य प्रदेश में इसकी तैयारी कैसे हुई, ड्राफ्ट बिल में कौन-कौन से प्रावधान शामिल किए गए हैं और इसे लागू करने के पीछे सरकार का क्या तर्क है।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि किसी भी नागरिक के लिए धर्म या जाति के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानून न हों। इसके लागू होने के बाद विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू होगा।
यह विषय कई दशकों से राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से इसे अपने प्रमुख एजेंडे में शामिल करती रही है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी यूसीसी लागू करने का वादा किया गया था। अब भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने की दिशा में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं और मध्य प्रदेश में ड्राफ्ट बिल को मंजूरी इसी क्रम का हिस्सा माना जा रहा है।
संविधान में क्या है प्रावधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया गया है। इसमें राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार दिया गया है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना और विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के बीच समानता एवं सामंजस्य स्थापित करना है।
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी समान नागरिक संहिता को आवश्यक बताया था, हालांकि उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए इसे प्रारंभिक दौर में स्वैच्छिक रखने की बात कही थी। संविधान निर्माण के दौरान मसौदे के अनुच्छेद 35 को बाद में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 के रूप में शामिल किया गया।
यूसीसी का इतिहास क्या है?
समान नागरिक संहिता की अवधारणा औपनिवेशिक भारत के समय सामने आई थी। वर्ष 1835 में ब्रिटिश सरकार की एक रिपोर्ट में अपराध, साक्ष्य और अनुबंध संबंधी कानूनों में एकरूपता लाने की आवश्यकता पर बल दिया गया था। हालांकि उस समय हिंदू और मुस्लिम पर्सनल लॉ को इस प्रक्रिया से अलग रखने की सिफारिश की गई थी।
इसके बाद वर्ष 1941 में हिंदू कानूनों के संहिताकरण के लिए बी. एन. राव समिति का गठन किया गया। समिति ने महिलाओं को समान अधिकार देने, विवाह और उत्तराधिकार संबंधी कानूनों में सुधार तथा हिंदुओं के लिए एक समान नागरिक व्यवस्था की सिफारिश की थी।
मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू करने की तैयारी कैसे हुई?
राज्य सरकार के अनुसार फिलहाल विवाह, विवाह-विच्छेद, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, लिव-इन संबंध और अन्य पारिवारिक मामलों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। इन्हीं कानूनों का व्यापक अध्ययन कर एक समान, संतुलित और व्यावहारिक कानूनी व्यवस्था तैयार करने की आवश्यकता महसूस की गई।
इसी उद्देश्य से 27 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित की गई। समिति में शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया गया।
समिति ने राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन किया। साथ ही उत्तराखंड और गुजरात में अपनाए गए मॉडल का परीक्षण किया। आम नागरिकों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की गईं। महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा, समानता और संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सिफारिशें तैयार की गईं। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण, उनसे जुड़े अधिकारों और दायित्वों पर भी विचार किया गया। साथ ही प्रस्तावित कानून के कानूनी, प्रशासनिक और क्रियान्वयन संबंधी पहलुओं का अध्ययन कर समिति को 60 दिनों के भीतर ड्राफ्ट बिल और विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपने की जिम्मेदारी दी गई।
जनता से सुझाव लेने की प्रक्रिया
राज्य सरकार ने जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 22 मई 2026 को एक वेब पोर्टल शुरू किया। इस अभियान के दौरान लगभग 3.49 करोड़ एसएमएस भेजे गए। वेब पोर्टल के माध्यम से 9,58,675 सुझाव प्राप्त हुए। इसके अलावा जिला और राज्य स्तर पर 50 से अधिक जनपरामर्श बैठकें आयोजित की गईं, जिनसे 10,134 से अधिक सुझाव मिले।
जनपरामर्श में क्या सामने आया?
सरकार के जारी आंकड़ों के अनुसार 93.54 प्रतिशत लोगों ने प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। 92.20 प्रतिशत लोगों का मत था कि सभी समुदायों में महिला और पुरुष के लिए समान कानून होना चाहिए। 91.32 प्रतिशत लोगों ने भेदभावपूर्ण तलाक कानून समाप्त करने का समर्थन किया। 92.66 प्रतिशत लोगों ने महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति में समान अधिकार देने की बात कही। 90.96 प्रतिशत लोगों ने माना कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से कानूनी जटिलताएं बढ़ती हैं, जबकि 86.78 प्रतिशत लोगों ने कहा कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किए बिना समान नागरिक संहिता लागू की जा सकती है।
ड्राफ्ट बिल में शामिल प्रमुख प्रावधान
ड्राफ्ट बिल में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। पहले विवाह के कानूनी रूप से समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह नहीं किया जा सकेगा। केवल मौखिक रूप से तलाक कह देने से विवाह समाप्त नहीं माना जाएगा और तलाक तभी प्रभावी होगा जब कानूनी प्रक्रिया पूरी होगी।
ड्राफ्ट के अनुसार महिलाओं और पुरुषों को उत्तराधिकार में समान अधिकार मिलेंगे। जिन कानूनों में महिलाओं के अधिकार सीमित थे, वहां भाई और बहनों को समान अधिकार दिए जाएंगे। विवाह का पंजीकरण पंचायत से लेकर नगरीय निकाय तक अनिवार्य होगा। एक जीवनसाथी के रहते दूसरा विवाह करने की अनुमति नहीं होगी। न्यायालय के बाहर विवाह विच्छेद को मान्यता नहीं मिलेगी। पुत्र और पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त होंगे तथा महिलाओं को संपत्ति में वही अधिकार मिलेंगे जो पुरुषों को प्राप्त हैं।
सरकार का कहना है कि यह कानून सभी धर्मों का सम्मान करता है और किसी भी धर्म के प्रति भेदभाव नहीं करता। महिलाओं की गरिमा, सम्मान और सशक्तिकरण को इस कानून का प्रमुख उद्देश्य बताया गया है। अनुसूचित जनजातियों और संरक्षित रूढ़िगत समूहों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। साथ ही धार्मिक समारोह, परंपराएं और अनुष्ठान पहले की तरह जारी रहेंगे।



